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मोदी के विरोध में गठबंधन एक मज़बूरी

लगातार मिल रही हार और बीजेपी के बढ़ते कद ने सारे विपक्ष को एक कर दिया है। लेकिन विपक्ष के खात्‍में से आईसीयू में गए लोकतंत्र के लिए यह कोई संजीवनी है या नहीं इस पर चर्चा आजकल बहुत आम है। राजनीतिक पंडित इस बात का विश्‍लेषण अपनी अपनी तरह से कर रहे हैं। लेकिन इस विषय को लेकर जिस बिन्‍दु पर चर्चा होनी चाहिए वो यह है कि मोदी मैजिक  से घबरा अपने राजनीतिक अस्तित्‍व को बचाने के लिए हाथ मिला रहे ये दल देश को एक मजबूत सरकार दे पाएंगे?

मजबूत विपक्ष स्‍वस्‍थ लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी होता है। यह सरकार को निरंकुश होने से और देश को सरकार के तानाशाही फैसलों से बचाए रहता है। लेकिन 2014 में जिस तरह से मोदी लहर आई उसने संसद से विपक्ष को लगभग खत्‍म ही कर दिया। 543 सीटों वाली संसद में भाजपा और उसके सहयोगी दल को 336 सीटें मिली, जिसमें अकेली भाजपा ने ही 282 सीटें जीतीं। मोदी की इस लहर ने भाजपा को तो मजबूत किया लेकिन लोकतंत्र को कमजोर कर दिया।

इसके बाद भी भाजपा नहीं थमी और एक के बाद एक प्रदेशों में भी अपनी जीत दर्ज कर राज्‍य सभा में भी खुद को मजबूत कर लिया। ऐसे में विपक्ष ने भाजपा को रोकने के लिए महागठबंधन की राह अपनाई। लेकिन गठबंधन का इतिहास हमारे देश में इतना अच्‍छा नहीं है कि देश की जनता को उससे कुछ उम्‍मीद हो, खास कर ऐसे गठबंधन से जिसके पास न तो कोई नेता है और न ही काम करने का कोई एजेंडा।

देश में प्रदेश और केंद्र के स्‍तर में कई बार गठबंधन वाली सरकार बनाने की कोशिश की गई है लेकिन ‘एनडीए’ के पांच साल और ‘यूपीए’ के 10 साल के अलावा कहीं भी गठबंधन सही तरह से स्थिर रूप में काम नहीं कर सका है। गठबंधन सरकार बनाने की सबसे पहली कोशिश 1953 में मैसूर रियासत (वर्तमान में कर्नाटक) में हुई थी। लेकिन यह भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई।

इसके बाद गठबंधन का जो सबसे बडा उदाहरण है वो जनता पार्टी बनाकर इंदिरा गांधी को सत्‍ता से बाहर करने का है। इस गठबंधन में तो जो नेता थे वो किसी भी प्रकार से लालच से दूर थे और सब के सब जमीनी नेता थे इसके बाद भी इनके बीच अहमं और सम्‍मान की दीवार ने जनता पार्टी और उसकी सरकार दोनों को बिखरा कर रख दिया।

ऐसा नहीं है कि देश के पास गठबंधन सरकार के पूरे कार्यकाल के उदाहरण नहीं है लेकिन वो दौर, वैसे नेता और उस स्‍तर की सहनशीलता आज कहीं भी दिखाई नहीं देती।

पहली बार गठबंधन सरकार को पांच साल तक चलाने का कारनमा अटल बिहारी बाजपायी ने कर दिखाया था। 11वीं लोकसभा की 13 दिन की सरकार से सबक लेकर 12वीं लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। इस गठबंधन को एनडीए का नाम दिया गया। हालांकि अटल लग लफ सरकार भी 13 महीने में ही गिर गई। इसके अगले चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार गठबंधन की सरकार पुरे पांच साल चलाई। इस प्रयोग के सफल होने के पीछे अटल बिहारी बाजपायी का करिश्‍माई नेतृत्‍व था। जिनके लिए कहा जाता है कि अपनी पार्टी तो दूर उनके विरोधी भी उनकी बात को टालने की हिम्‍मत नहीं कर पाते थे।

2004 में ‘एनडीए’ की तर्ज पर कांग्रेस ने ‘यूपीए’ का गठन किया। यह गठबंधन ऐसे दलों का था जो भाजपा को साम्‍प्रदायिक पार्टी समझते थे और उसके विरोधी थे। 2004 में ‘शाइनिंग इंडिया’ एक फ्लॉप शो साबित हुआ और कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली ‘यूपीए’ ने जीत हांसिल की।

ऐसा लगने लगा कि देश में अब केंद्र के स्‍तर पर‘टू पार्टी पॉलिटिक्‍स’ जैसी स्थिति आ गई है और भारतीय राजनीति में यह गठबंधन का दौर बहुत लंबा चलेगा। ‘यूपीए’ ने लगातार दो बार चुनाव जीते और दस साल सरकार चला ली। लेकिन सरकार चला लेने के लिए उसने जो-जो समझौते किए उससे देश का बहुत नुकसान हुआ।

देश में एक से एक बड़े घोटाले हुए जिस पर देश के प्रधानमं‍त्री ने गठबंधन के धर्म को निभाते हुए अपने आंख, कान और मुंह बंद रखे। इस दौरान घटक दलों ने खूब मनमानी की।

लेकिन ‘यूपीए’ के दस साल खत्‍म होने के बाद जनता यह जान चुकी थी कि गठबंधन एक ऐसा मंथन है जो लोकतंत्र के लिए भले ही अमृत लेकर आए लेकिन देश के लिए यह विष पात्र लेकर ही आता है क्‍योंकि गठबंधन सरकार में जिम्‍मेदारी किसी की भी नहीं होती और सत्ता का दोहन सारे दल मिल जुल कर अपने अपने स्‍तर पर करते हैं। यही वो दौर था जब नरेद्र मोदी ने गुजरातियों का दिल लगातार तीन बार जीता था और अब वो खुद को केंद्र की ओर आ चुके थे। जनता को मोदी में एक मजबूत नेता दिख रहा था। यही कारण था कि जिस देश में हर जगह से गठबंधन की हवा चल रही थी वहीं अचानक मोदी लहर आ गई। यह एक तरह से जनता का उस व्‍यक्तित्‍व को आदेश था कि देश को भ्रष्‍टाचार से मुक्‍त करें और विकास की ओर ले जाएं। जनता के इस मूड की बानगी कई विधानसभा चुनावों में भी दिखी। गोवा महाराष्ट्र का चुनाव छोड़ दें तो 2014 के बाद हर जगह जनता ने एक मजबूत सरकार के पक्ष में ही मतदान किया फिर जीत चाहे भाजपा की हुई हो कांग्रेस ही हुई हो या किसी अन्‍य दल की।अरुणाचल, असम, बिहार दिल्‍ली, गुजराज, हिमाचल और उत्तराखण्ड इसके कुछ उदाहरण हैं। जहां जनता ने मजबूरी से अलग एक स्थिर और मजबूत सरकार के लिए वोट दिया।

हाल ही में हुए कर्नाटक चुनाव भी जनता कुछ ऐसा ही मूड दिखा रहे था। भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत से सिर्फ 8 सीटें दूर रह गई। कर्नाटक की जनता का मूड यहां भी स्थिर सरकार लाने का ही था तभी एक पार्टी को बहुमत के इतनी करीब पहुचा दिया। ऐसे में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने खुद से समझौता करके तीसरे नम्‍बर की पार्टी को सरकार बनाने में समर्थन देने की बात कही।

कांग्रेस के इस समर्पण ने 2019 के लिए एक नई रणनीति को तैयार कर दिया है। कांग्रेस ने कर्नाटक में शपथ ग्रहण समारोह के मंच में कई छोटे छोटे दलों को इकट्ठा करके एक तरह से शक्ति प्रदर्शन किया। कांग्रेस की 2019 की तैयारी तब और मजबूत हो गई जब कर्णाटक चनावों के बाद देशभर में हुए उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा।

लेकिन भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए इकट्ठा हो रहे दलों को यह समझना होगा कि उपचुनाव और मुख्‍य चुनाव में जमीन आसमान का फर्क होता है। मुख्‍य चुनाव जहां सरकार बनाने के लिए होते हैं वहीं 90 प्रतिशत उपचुनाव केवल औपचारिकता मात्र होते हैं। इतने उपचुनाव हारने के बाद भी वर्तमान स्थिति में भारतीय जनता पार्टी को कहीं भी असहज करने में विपक्ष और विरोधी दल कामयाब नहीं हो पाए हैं। ऐसे में 2014 के बाद हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों का आंकलन जनता के एक अलग मूड को ही दर्शाता है। जिसमें जनता एक स्थिर और मजबूत सरकार के लिए वोट कर रही है और इस पर आखिरी मुहर मध्‍यप्रदेश और राजस्‍थान के चुनावों के नतीजे लगा ही देंगे।

खैर एक नजर इस गठबंधन के भविष्‍य पर भी डालते हैं जिसे पालने-पोसने के लिए कांग्रेस जैसी पार्टी अपनी सारी महात्‍वाकांक्षा का समर्पण करने के लिए तैयार है। इस गठबंधन का उद्देश्‍य देश के लिए कुछ करने का नहीं, बल्कि भाजपा के बढ़ते कद को रोकने का है। इस उद्देश्‍य से बना गठबंधन किस तरह से काम करेगा और इसकी वरियता में कौन कौन से देशहित के काम होंगे ये भी तय नहीं है। सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि जब कांग्रेस समर्पण के लिए तैयार है तो मायावती, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, देवगौड़ा, सीताराम येचुरी, अजीत सिंह, तेजस्‍वी यादव आदि में से कौन सा नेता ऐसा है जो बाकी सबको साथ लेकर चल सके और इस तरह की खिचड़ी में वह देश हित के काम भी करे।

क्‍या जनता इस बात पर गठबंधन को वोट देगी कि गठबंधन भाजपा को सत्‍ता से हटाना चाहती है। बेहतर होता की कांग्रेस अपनी गरिमा को बनाए रखती और वर्तमान सरकार को मुद्दों पर घेरती।ऐसी हिम्‍मत दिखाने पर अगर कांग्रेस को जीत न भी मिलती तो देश को कम से कम एक सुदृढ़,सरकार को मुद्दों पर घेरने वाला मजबूत विपक्ष ही मिल जाता और आईसीयू में पड़ा लोकतंत्र सेहतमंद होकर सरकार को निरंकुश होने से रोकता।

कांग्रेस का ये कदम दूसरे क्षेत्रिय दलों को भी प्रेरित करता जिससे वो अपना जमीनी आधार एक बार फिर हांसिल करने की ओर ताकत लगाते और जनता को भी इससे लाभ मिलता। जिस गठबंधन की तैयारी हो रही है उसका क्‍या हाल होगा इसे बिहार में चिर विरोधियों के बीच स्‍वार्थ सिद्धी और सत्ता सुख के लिए हुए गठबंधन से समझा जा सकता है। आज किस स्थिति में बिहार का गठबंधन पहुंच चुका है यह सबको पता है।

इस परिस्थिति में अगर यह मान भी लें कि 2019 का चुनाव सारे दल साथ होकर लड़ेंगे और जीत जाएंगे तो यह भी संभव है कि सरकार बनाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद का इस्‍तेमाल करने वाला भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्‍व कोई भी ऐसा मौका नहीं छोड़ेगा जिसमें वह सरकार बना सके और ऐसी स्थिति में देश और लोकतंत्र दोनों के शर्मिंदा होने की नौबत आ सकती है।

अब बात करते हैं वर्तमान गठबंधन पर और उसके संभावित भविष्‍य पर:

यह समझना बहुत आसान है कि यह गठबंधन आनन-फानन में सिर्फ इस उद्देश्‍य से बना की भाजपा के विजय रथ को रोककर अपना राजनीतिक अस्तित्‍व बचाया जाय। फिर चाहे वो राष्‍ट्रीय पार्टी कांग्रेस हो या क्षेत्रीय पार्टी सपा और बसपा जैसे दल।

ऐसे में संगठन की शक्ति‍ से ये दल जीत भी जाते हैं तो जीतने के बाद ही इनका उद्देश्‍य पूरा हो जाएगा उसके बाद सरकार कैसे चलानी है और इस गठबंधन का नेता कौन होगा यह तय नहीं है। कर्नाटक में शपथ ग्रहण समारोह में जिस तरह से सोनिया गांधी ने मायावती को महत्‍व दिया और उनसे गले लगीं उसने भी इस संगठन के लिए अच्‍छे संकेत नहीं दिए। मायावती का इतिहास रहा है कि वह अपनी स्‍वार्थ सिद्धि के लिए उत्तर प्रदेश में दो बार गठबंधन सरकार की आहुत‍ि दे चुकी हैं। वह अपने स्‍वार्थ के लिए कितनी दृढ़ है यह राजनीति को जानने समझने वाले बहुत अच्‍छी तरह से जानते हैं। ऐसे में गठबंधन में उनका कद बड़ा कर देना किसी खतरे से कम नहीं।

इसके अलावा यह गठबंधन सामाजिक मुद्दों पर भी खामोश है। मोदी सरकार के कामों की आलोचना न करके यहां सिर्फ एक ही शोर है कि साम्‍प्रदायिक शक्तियों को रोकना है, ऐसे में जनता इस गठबंधन पर कैसे विश्‍वास करेगी यह सोचने वाली बात है। कांग्रेस का कद अब वैसा नहीं रह गया जैसा 2004 में हुआ करता था अत: अब कई पार्टियां ऐसी है जो कांग्रेस के नेतृत्‍व को अपना नेतृत्‍व मानने से इंकार भी कर सकती है।

जिस मुहाने पर और जिस सोच के साथ यह गठबंधन तैयार हो रहा है, इसका आगे बढ़ना साथ मिलकर 2019 का चुनाव लड़ना बहुत मुश्किल है। खैर अभी मध्‍यप्रदेश और राजस्‍थान में होने वाले विधानसभा चुनाव कुछ नए समीकरण जरूर लेकर आएंगे क्‍योंकि भाजपा इन दो गणों में अकेले दम पर भाजपा को टक्‍कर देने की हिमाकत शायद ही कोई करे।

जनता का मूड:

जनता का मूड भापना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन जनता ने 2014 में नरेंद्र मोदी को तूफानी जीत का तोहफा देने से पहले 15 सालों तक गठजोड की राजनीति का दंश झेला है। नरेंद्र मोदी की लहर में एक बड़ा योगदान पिछली गठबंधन सरकार का भी था जिसने गठबंधन धर्म को निभाने और सरकार को बचाए रखने के कारण अपनी आंख, नाक और कान बंद कर दिए थे। यह कड़वा सत्‍य है और इसे भारत की जनता अच्‍छी तरह से समझ चुकी है क्‍योंकि जिस तरह का मेंडेट 2014 के बाद देश ने चुनावों में दिया है उसमें कुछ एक राज्‍यों को छोड़ दे तो बाकी सभी जगह जनता ने पूर्ण बहुमत के लिए ही मतदान किया है।

यह एक साफ संदेश है कि जनता को स्थिर और अपने दम पर काम करने वाली सरकार ही चाहिए न की गठबंधन के तार जोड़ती कोई मिली जुली सरकार। इसलिए भाजपा के खिलाफ मोर्चा संभाल रहे दलों को चुनाव से पहले जनता को यह यकीन दिलाना पड़ेगा कि वह एक स्थिर और सधी हुई सरकार देने में सक्षम है।

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