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जलवायु परिवर्तन के चलते 2050 तक विश्व की आर्थिक शक्तियां हो सकती हैं तबाह

दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव आए दिन देखने को मिलते हैं। लेकिन आने वाले दिनों में इसकी भयावहता और भी भीषण होने वाली है। शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन के आधार पर कहा है कि वर्ष 2050 तक विश्व की शक्तिशाली आर्थिक शक्तियां पूरी तरह से तबाह हो सकती हैं। अगर समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो 2050 तक दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्ययवस्थाएँ ध्वस्त हो जाने का खतरा है।

यूरो मेडिटेरियन सेंटर ऑन क्लाइमेंट चेंज (सीएमसीसी) ने अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए ये चेतावनी दी है। ये रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब ग्लासगो में कॉप26 बैठक होने वाली है।

इटली के रिसर्च सेंटर सीएमसीसी की रिपोर्ट के मुताबिक अगर समय रहते ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए कोई निर्णय नहीं लिया गया तो शक्तिशाली आर्थिक शक्तियां अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा, फ्रांस, ब्राजील, मेक्सिको, जापान, चीन और रूस पूरी तरह तबाही की कगार पर होंगी।

सीएमसीसी की वैज्ञानिक डोनाटेला स्पानो का कहना है कि हम अगर एक दूसरे के फैसले पर निर्भर रहे तो आने वाले समय में निश्चित ही सब एक साथ बर्बाद हो जाएंगे। जारी रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों में भयानक सूखा, तेज गर्मी, समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी के साथ खाद्य पदार्थों का संकट गहराने से स्थिति बेहद खराब हो जाएगी।

अर्थव्यवस्था को होगा भारी नुकसान

रिपोर्ट में अंदाजा लगाया गया है कि जी20 देशों को जलवायु परिवर्तन के कारण 2050 तक अपनी अर्थव्यवस्था के कुल उत्पादन में चार फीसदी का नुकसान उठाना पड़ेगा। इतना ही नहीं वर्ष 2010 तक तो ये नुकसान आठ फीसदी तक हो जाएगा।  वैश्विक स्तर पर 80 फीसदी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के जिम्मेदार जी20 देश हैं।

लक्ष्य, संकट और भविष्य !

दुनिया के सभी देशों का लक्ष्य है कि 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 7.5 फीसदी की कमी लाई जा सके ताकि मानव जीवन सुरक्षित हो सके ।
सूखा, गर्मी, समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी और खाद्य पदार्थों का संकट गहरा सकता है।
गर्मी और तपिश पर काबू नहीं पाया तो इससे सदी के अंत तक यूरोप में 90 हजार लोगों की मौत का खतरा मंडरा रहा है।

वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अगर गर्मी और गर्मी पर नियंत्रण नहीं हुआ तो यूरोप में इस सदी के अंत तक मानव जीवन की अपूरणीय क्षति होना तय है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्ष 2030 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 7.5 प्रतिशत की कमी करनी होगी। वरना मानव जीवन खतरे में आ जाएगा।

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विश्व होगा घातक बीमारियों की चपेट में

वैज्ञानिकों की ओर से जलवायु परिवर्तन के साथ दुनिया के खतरनाक बीमारियों की जद में आने की भी चेतावनी दी गई है। अमेरिका की 83 प्रतिशत आबादी वर्ष 2050 तक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझेगी। 92 फीसदी आबादी को डेंगू से खतरा होगा।

इससे पहले विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने वर्ष 2020 के लिए वैश्विक जलवायु परिवर्तन की समीक्षा करते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इस रिपोर्ट में ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीनहाउस गैसों के बढ़े हुए स्तर और दुनिया पर उनके प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की गई। यह रिपोर्ट एशिया में हुए जलवायु परिवर्तन में हुए बदलाव का उल्लेख करती है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण एशियाई देश प्राकृतिक आपदाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, चीन और भारत वैश्विक जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। विभिन्न प्रकार के चक्रवात, भारी वर्षा, बाढ़, सूखा इससे फसलों के साथ-साथ संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा, कई लोगों की मौत हो गई। सबसे अधिक भारत को आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, भारत 2020 में अनुमानित लगभग 65. 5 लाख करोड़ रुपये की चपेट में आ जाएगा। चीन को सबसे बड़ा झटका करीब 238 अरब डॉलर का लग सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक जापान को 83 अरब, दक्षिण कोरिया को 24 अरब, पाकिस्तान को 15 अरब, थाईलैंड को 12 अरब और बांग्लादेश को 111 अरब का नुकसान हुआ।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लूएमओ) ने कहा है कि ग्लोबल वार्मिंग ने दुनिया में प्राकृतिक आपदाएं पैदा की हैं, खासकर एशिया में। यह ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा के कारण है। कोरोना के चलते 2020 में दुनिया भर में तालाबंदी हुई, इसके बावजूद ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि हुई है। नतीजतन, वर्ष 2020 को पिछले 40 वर्षों में उच्चतम औसत तापमान वाले वर्ष के रूप में पहचाना गया है। ‘वैश्विक जलवायु परिवर्तन’ सम्मेलन से ठीक पहले विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अपनी 2020 की रिपोर्ट जारी की है।

 

 

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