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2016 के बाद फिर से संसद में पेश होगा नागरिकता  संशोधन विधेयक 

 

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद  370 हटाने के बाद अब भारत सरकार अपना दूसरा सबसे बड़ा कदम उठाने जा रही है। सरकार नागरिकता संशोधन बिल लेकर आ रही है।आज सुबह 9.30 बजे कैबिनेट की अहम  बैठक है।यह बैठक नागरिकता बिल पर चर्चा करने के लिए बुलाई गई है, जिसमें नागरिकता संशोधन विधेयक को पास किया जा सकता है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद जल्‍द ही गृह मंत्री अमित शाह इस बिल को संसद  में पेश करेंगे। सरकार की कोशिश इस बिल को संसद के शीतकालीन सत्र  में पास करा लेने की होगी। हालांकि कई राजनीतिक दल इसका विरोध कर रहे हैं। इस ऐतिहासिक कदम की शुरुआत आज हो सकती है।

नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 में लोकसभा में पेश किया गया था, जिसके बाद 2 अगस्त 2016 को इसे संयुक्त संसदीय समिति को सौंप दिया गया था। समिति ने इस साल जनवरी में इस पर अपनी रिपोर्ट दी है।

नागरिकता अधिनियम 1955 के प्रावधानों को बदलने के लिए नागरिकता संशोधन बिल 2019 पेश किया जा रहा है।  इससे नागरिकता देने के नियमों में बदलाव होगा. इस संशोधन विधेयक से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों के लिए बगैर वैध दस्तावेजों के भी भारत की नागरिकता हासिल करने का रास्ता साफ हो जाएगा।भारत की नागरिकता हासिल करने को अभी देश में 11 साल रहना जरूरी है, लेकिन नए बिल में इस अवधि को 6 साल करने की बात कही जा रही है।  असम समेत पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों में इस बिल का विरोध हो रहा है। नागरिकता संसोधन के विरोध की वजह से बांग्लादेशियों और पाकिस्तानियों को होने वाले फायदे को बताया जा रहा है। इस बिल से उन लोगों को फायदा होगा ,जिन्हे सरकार ने ही लॉन्ग टर्म वीजा दिया हुआ है।

कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष इस बिल के विरोध में हैं।  विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार धर्म के आधार पर नागरिकता बांट रही है।बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस बिल का विरोध करने का फैसला किया है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार इस बिल के जरिए 1985 के असम अकॉर्ड का उल्लंघन कर रही है। बीजेपी के कुछ लोग भी इस बिल के विरोध में हैं। पूर्वोत्तर में एनडीए के साथी असम गण परिषद  गृह मंत्री अमित शाह से भी इस बिल का विरोध कर चुकी है।

 

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