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बर्बादी की कगार पर चमड़ा उद्योग

कानपुर का चमड़ा उद्योग बर्बादी की कगार पर है। यदि सरकार ने समय रहते अपनी नीतियों में परिवर्तन नहीं किया तो निश्चित तौर पर 50 हजार से अधिक परिवार रोजी-रोटी को मोहताज हो जायेंगे। यदि समय रहते सरकार के एक कैबिनेट मंत्री की चाहत पर अंकुश नहीं रखा गया तो निश्चित तौर पर 12000 करोड़ का व्यापार पर पड़ोसी देश का अधिकार हो जायेगा।
‘‘बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफी था
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा’’
मौजूदा योगी सरकार में भी अपना उल्लू सीधा करने वालों की कोई कमी नहीं है। ऐसे में यदि सरकार की नीतियां भी अपना ऊल्लू सीधा करने वालों का साथ देने लगें तो इन परिस्थितियों में ‘शौक बहराइची’ का यह शेर बरबस याद हो आता है।
गत दिवस सरकार ने कानपुर की समस्त 122 टेनरियों को बंद करने का आदेश जारी कर दिया है। फिलहाल तो ये टेनरियां तब तक बंद रहेंगी जब तक सरकार चाहेगी। हालांकि सरकार के इस आदेश में इस बात का उल्लेख किया है कि जब तक जल निगम, कानपुर सीईटीपी को दोबारा चालू नहीं करता तब तक चमड़ा उद्योग पूरी तरह से बंद रहेगा।
बताते चलें कि सीईटीपी प्लांट टेनरियों से निकलने वाले प्रदूषित पानी को शोधित करके खेतों में इस्तेमाल करने के लिए पाइप के जरिए भेजा जाता है। यह प्लांट पिछले काफी समय से खराब चल रहा है। ऐसा इसलिए कि नगर निगम, कानपुर को जो पैसा देना था वह पैसा उसने नहीं दिया जबकि टेनरियों से वसूली जाने वाली रकम नियमित रूप से वसूली जा रही है।
ऐसे में एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब टेनरियां सीईटीपी संचालन के लिए अपने हिस्से का धन नियमित रूप से जल निगम, कानपुर को दे रही हैं तो गंगा प्रदूषण के नाम पर टेनरी संचालकों और टेनरियों में काम करने वाले लाखों लोगों का रोजगार क्यों छीन रही है। कानपुर की टेनरियां जो रकम जल निगम को देती आ रही हैं वह रकम कोई छोटी रकम नहंी बल्कि 02 करोड़ के आस-पास है। ये पैसा टेनरियों से इसलिए लिया जाता है ताकि उनकी टेनरियों से निकलने वाले केमिकल युक्त पानी को शोधित करके काम में लाया जा सके। जल निगम, कानपुर के अधिकारी भी यही मानते हैं कि नगर निगम, कानपुर के हिस्से का पैसा न मिलने के कारण सीईटीपी का संचालन सुचारु रूप से किया जाना सम्भव नहीं। ऐसे में टेनरी मालिकों का यह कहना है कि नगर निगम और जल निगम की गलतियों की सजा उन्हें क्यों दी जा रही है जबकि इस मामले में अनियमितता के दोषी (जल निगम और नगर निगम) अधिकारियों को सजा दी जानी चाहिए थी। टेनरी मालिक कटाक्ष करते हैं कि यहां की स्थिति ‘धोबी से नहीं जीते तो लगे गधों के कान उमेठने’ जैसी है।
बताते चलें कि पहले इन टेनरियों को कुंभ मेले के दौरान इसलिए बंद करने के आदेश दिए गए थे ताकि धार्मिक कार्यों में किसी प्रकार का विध्न न आने पावे। लगभग नौ माह तक बंदी का दंश झेल रही इन टेनरियों में से 94 टेनरियों को अपनी क्षमता से आधे उत्पादन की शर्त के साथ अगस्त माह में शुरु करने के आदेश दिए गए थे। इनमें से 28 टेनरियां ऐसी थीं जिन्हें कुंभ के दौरान भी बंदी से छूट थी लेकिन इन टेनरियों को भी अब बंद करने के आदेश दिए गए हैं।
हालांकि जल निगम, कानपुर का दावा है कि अक्टूबर माह के अंत तक सीईटीपी दुरुस्त कर लिया जायेगा, तत्पश्चात टेनरियांे में दोबारा उत्पादन शुरु किया जा सकता है। वैसे तो जल निगम, कानपुर के अधिकारियों का यह बयान टेनरी संचालकों को राहत देने वाला है लेकिन सच तो यह है कि यूपी सरकार ने समस्त डेढ़ सौ छोटी-बड़ी टेनरियों को पूरी तरह से बंद करने की योजना बना रखी है। अंदरखाने से मिली जानकारी के अनुसार इन टेनरियों को शहर के बाहर स्थापित किया जायेगा जबकि टेनरी संचालकों का कहना है कि इस तरह की जानकारी उनके पास न तो मौखिक रूप से है और न ही लिखित रूप से। टेनरी संचालकों को भी अब इस बात का पूरा यकीन हो चला है कि देर-सबेर ही सही, योगी सरकार के रहते कानपुर की टेनरियों को समूल उजाड़ दिया जायेगा।
ज्ञात हो इस सम्बन्ध में पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सचिव द्वारा स्पष्ट रूप से हिदायत दी गयी थी कि किसी भी सूरत में टेनरियों का डिस्चार्ज गंगा नदी में न जाने पाए। इस सम्बन्ध में एनजीटी द्वारा राज्य के मुख्य सचिव को सम्बन्धित व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के आदेश जारी किए गए थे। स्थिति यह है कि जल निगम, कानपुर की लापरवाही के कारण पिछले कुछ समय से टेनरियों का केमिकल युक्त पानी सीधे गंगा में जा रहा है और सजा भुगतनी पड़ रही है टेनरी संचालकों को।
इन टेनरियों की बंदी के पीछे कुछ विशेष कारण बताए जा रहे हैं। योगी सरकार में एक कद्दावर कैबिनेट मंत्री कानपुर जनपद से जुडे़ हुए हैं। इन्हीं मंत्री महोदय के इशारे पर टेनरियों को कानपुर शहर से खदेड़े जाने की तैयारी को योगी सरकार अमली जामा पहना रही है। ऐसा इसलिए कि ये टेनरियों जिन स्थानों पर कई दशकों से स्थापित हैं वे स्थान आज की तारीख में कानपुर के पाॅश एरिया में शामिल हैं। इन टेनरियों की बेशकीमती जमीनों पर कैबिनेट मंत्री महोदय की नजरें जमी हुई हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार योजना का खाका भी खींचा जा चुका है, बस इंतजार है टेनरियों के उजड़ने तक का। टेनरियों के उजड़ने से जहां एक ओर हजारों की संख्या में परिवार रोजी-रोटी के लिए तरस जायेंगे वहीं दूसरी ओर चंद लोगों के बैंक खाते और उनकी चल-अचल सम्पत्तियों में इजाफा हो जायेगा।
अब नुकसान का भी जायजा लगा लीजिए। कानपुर की टेनरियों से तैयार किया जाने वाले चमड़े की वस्तुओं का बाजार करोड़-दो करोड़ का नहीं बल्कि पूरे 12000 करोड़ का हुआ करता था। देश ही नहीं विदेशों तक में कानपुर का चमड़ा बाजार अपनी विशेष पहचान रखता आया है। अब सरकार के फैसले के बाद से न सिर्फ 12000 करोड़ का बाजार हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश और शत्रु देश पाकिस्तान के लिए फायदेमंद होगा बल्कि 50 हजार से अधिक परिवारों के उजड़ने की आशंका भी बलवती हो गयी है।

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