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ममता के लिए मुख्यमंत्री बना रहना काफी चुनौतीपूर्ण

पश्चिम बंगाल में कुछ ही महीने  पहले संपन हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को प्रचंड  जीत हासिल हुई , लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नंदीग्राम से भाजपा के शुभेंदु अधिकारी से हार गई। बावजूद इसके ममता बनर्जी राज्य की मुख्यमंत्री हैं। उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए छह महीनों के भीतर विधानसभा का सदस्य होना जरुरी है।हालांकि उन्होंने अपने लिए एक सीट (भवानीपुर) खाली करा ली है, लेकिन वह विधानसभा की सदस्य तभी बन पाएंगी जब तय अवधि के भीतर चुनाव हो सके। कोरोना की वजह से निर्वाचन आयोग ने सभी चुनाव स्थगित किए हुए हैं। ऐसे में अगर तय समय पर उपचुनाव नहीं हुआ तो ममता बनर्जी के लिए मुख्यमंत्री बना रहना काफी चुनौतीपूर्ण है। इस सब के बचने के लिए ममता बनर्जी ने बिना चुनाव लड़े मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने का बड़ा सियासी दांव चल दिया है।

दरअसल, राज्य में विधानसभा से  विधान परिषद के गठन का बिल पारित हो गया है । ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने विधानसभा में इस प्रस्ताव को पेश किया था। इस दौरान प्रस्ताव के पक्ष में 196 विधायकों ने वोट दिए, जबकि 69 ने इसका विरोध किया। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी नंदीग्राम में  हार गई थीं। इसके बावजूद भी ममता ने बीते चार मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। संवैधानिक नियमों के मुताबिक उन्हें अगले 6 महीने में राज्य की किसी सीट से उपचुनाव में जीत हासिल करना जरूरी है।

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ममता बनर्जी ने राज्य की कमान संभालने के 14 दिनों के भीतर ही राज्य विधानसभा के उच्च सदन विधान परिषद बनाने के कैबिनेट के फैसले को मंजूरी दी थी। इसके बाद ये अटकलें लगाई जाने लगीं कि वे विधान परिषद के रास्ते अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बचा ले जाएंगी। हालांकि विधान परिषद के अलावा ममता के पास भवानीपुर से उपचुनाव लड़ने का भी विकल्प है। भवानीपुर ममता की पारंपरिक सीट रही है।

उत्तराखंड में तीरथ सिंह रावत को भी इसी आधार पर हटना पड़ा

बता दें कि यही स्थिति तीरथ सिंह रावत की भी थी। उन्हें सांसद होते हुए राज्य का CM बनाया गया था, वे विधानसभा के सदस्य नहीं थे, इसलिए पार्टी ने उनसे 2 जुलाई को इस्तीफा दिलवा दिया। उत्तराखंड विधानसभा का 5 साल का कार्यकाल 17 मार्च 2022 को पूरा हो रहा है।

यानी यहां अगले साल फरवरी 2022 में चुनाव होने हैं। ऐसे में यहां उपचुनाव नहीं हो सकते थे। इसलिए रावत के पास इस्तीफे के अलावा कोई चारा नहीं था। इस घटना के बाद यह भी आशंका जताई जाने लगी कि ममता बनर्जी को भी बंगाल में इसी आधार पर हटाया जा सकता है। हालांकि, उत्तराखंड के जैसी बंगाल में उपचुनाव को लेकर कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है। यहां उपचुनाव कराए जा सकते हैं।

केंद्र से बिल पास करवाना ममता के लिए मुश्किल

राज्य विधानसभा से विधान परिषद के गठन का बिल पारित होने के बाद ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इसे केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा। संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत पश्चिम बंगाल में विधान परिषद के गठन का अधिकार दिया गया है। विधान परिषद के निर्माण के लिए बिल को संसद के समक्ष पेश करना जरूरी होता है। साथ ही इसके लिए राष्ट्रपति की सहमति की भी आवश्यकता होती है। संसद में भाजपा बहुमत में है इसलिए ममता चाह कर भी इसे पास नहीं करवा सकेंगी।

बंगाल में हो सकती हैं 98 सीटें

 

विधान परिषद के पास विधानसभा की कुल सीटों के एक तिहाई से अधिक नहीं होना चाहिए। ऐसे में परिषद के पास अधिकतम 98 सीटें हो सकती हैं। सदस्यों में से एक  तिहाई सदस्य विधायकों द्वारा चुने जाएंगे, जबकि अन्य एक  तिहाई सदस्य नगर निकायों, जिला परिषद और अन्य स्थानीय निकायों द्वारा चुने जाएंगे। सरकार द्वारा परिषद में सदस्यों को मनोनीत करने का भी प्रावधान होगा। राज्यसभा की तरह ही इसमें भी एक सभापति और एक उपाध्यक्ष होते हैं। सदस्यों की आयु कम से कम 30 साल होनी चाहिए। उनका कार्यकाल 6 साल का होगा। राज्यपाल भी कुछ सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं।

बंगाल में 1952 में रह चुका है विधान परिषद

राज्य में इससे पहले मुख्यमंत्री डॉ. बिधान चंद्र रॉय ने 1952 में विधान परिषद का गठन किया था, जो कि वर्ष 1969 तक जारी रहा। लेकिन दूसरी संयुक्त मोर्चा सरकार ने इसे समाप्त कर दिया। बंगाल की अंतिम विधान परिषद में 75 सदस्य थे, जिनमें से नौ को राज्यपाल द्वारा मनोनीत किया गया था।

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