सपा-बसपा को लगता है कि कांग्रेस के पास अब न तो दलित वोट रहे और न ही अल्पसंख्यक। ऐसे में उन छोटे दलों को गठबंधन का हिस्सा बनाना ज्यादा बेहतर होगा जो पासा पलटने की क्षमता रखते हैं
जैसे-जैसे आम चुनाव नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक दलों में हलचल तेज हो रही है। सबसे ज्यादा हलचल उत्तर प्रदेश में है। आखिरकार दिल्ली की कुर्सी उत्तरप्रदेश से होकर ही गुजरती है। गोरखपुर, फूलपुर के बाद कैराना का प्रयोग सफल होने के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बीच गठबंधन यहां तय माना जा रहा है। इस गठबंधन में और कौन- कौन से दल शामिल होंगे, इस पर चर्चा शुरू है। मगर बीच-बीच में बसपा सुप्रीमो मायावती का बयान गठबंधन को खतरे में डाल देता है जिसके चलते गठबंधन को लेकर कई तरह की आशंकाएं और सवाल भी उठ रहे हैं।
गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में बसपा ने सपा और रालोद के उम्मीदवार को अपना समर्थन दिया था। ये तीनों सीटें विपक्ष ने जीती, पर जब राज्यसभा में बसपा के उम्मीदवार को जिताने की बात आई तो सपा इसमें नाकाम रही। उसके बाद ही सवाल उठा कि सपा-बसपा गठबंधन से ज्यादा फायदा सपा को होगा या फिर बसपा को। हालांकि लोक सभा चुनाव और राज्य सभा चुनाव में काफी अंतर होता है। लेकिन ये सवाल अब 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के संदर्भ में भी पूछा जा रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कुमार कहते हैं कि गठबंधन से फायदा किसे ज्यादा होगा, इससे ज्यादा अहम सवाल ये है कि नुकसान किसे होगा। वह कहते हैं, ‘पिछले लोक सभा चुनाव में तो सपा का कोर मतदाता यानी यादव वर्ग भी बीजेपी की ओर चला गया था, लेकिन मायावती का मतदाता कहीं और नहीं जाता और उसने हर चुनाव में ये साबित भी किया है। फायदा अभी कई बातों पर निर्भर रहेगा। मसलन, सीटों का बंटवारा कैसे होता है, किस सीट पर कौन सा कैंडिडेट है, कांग्रेस भी महागठबंधन में आती है या नहीं। मगर एक बात तो तय है कि बीजेपी को उससे नुकसान ही होगा।’
दरअसल, बीएसपी के समर्पित मतदाताओं की वजह से ऐसा कहा जाता है कि वह अपने वोट किसी भी पार्टी या किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में ट्रांसफर करा सकती है। लेकिन दूसरी ओर समाजवादी पार्टी पर यही बात लागू नहीं होती। प्रदीप कुमार कहते हैं कि सपा का सबसे बड़ा समर्थक वर्ग पिछले साल सपा से ही दूर चला गया था, जबकि बसपा के साथ ऐसा नहीं हुआ। बसपा को सीटें भले ही कम मिलीं, लेकिन उसके वोट प्रतिशत में कोई कमी नहीं आई। जानकारों के मुताबिक गठबंधन से निश्चित तौर पर दोनों दलों को फायदा होगा और बीजेपी के सामने अपने गढ़ कहे जाने वाले इलाकों में भी मुश्किल हो सकती है।
पहले सवाल यह पूछा जा रहा था कि गठबंधन के बाद दोनों दलों के कार्यकर्ता एक साथ आ पाएंगे या नहीं? लेकिन इस सवाल का जवाब काफी हद तक लोकसभा उपचुनाव के बाद मिल गया जब गोरखपुर और फूलपुर में बसपा के सहयोग से सपा ने जीत दर्ज की। कई कार्यकर्ताओं का कहना था कि उनका मकसद बीजेपी को हराना है और इसके लिए उन्हें किसी से गठबंधन की जरूरत पड़ेगी तो पार्टी को करना चाहिए। वहीं गेस्ट हाउस कांड जैसी घटना को भी लगभग भूलकर मायावती का समाजवादी पार्टी से गठबंधन करना काफी मायने रखता है।
जानकारों के मुताबिक राज्य सभा चुनाव के बाद जिस तरह से मायावती ने ताबड़तोड़ प्रेस कांफ्रेंस करके गेस्ट हाउस कांड जैसे मामले में भी अखिलेश को क्लीन चिट दी और अखिलेश ने उन्हें धन्यवाद दिया, उससे गठबंधन तो तय है। साथ ही, दोनों नेताओं की परिपक्वता भी झलकती है। हालांकि जानकारों का ये भी कहना है कि गठबंधन का बन पाना और न बन पाना अभी कई परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। आज की स्थिति में मायावती शून्य पर हैं, राज्य सभा में भी और लोकसभा में भी। दूसरी ओर विधान सभा में उनका स्कोर अब तक का सबसे कम है। उन्हें जो कुछ भी सीटें मिलेंगी, उनका फायदा ही होगा पर मायावती पर कोई भी राजनीतिक दल पूर्णः विश्वास नहीं करता। बसपा सुप्रीमो के मूड स्थायी नहीं होता। पिछले कुछ दिनों से उन्होंने  अपने बयान बदले हैं। मायावती के मूड में बदलाव के पीछे दलित आंदोलन को माना जा रहा है। दलित के सफल आंदोलन के बाद मायावती का उत्साह बढ़ा है। उन्हें उम्मीद है कि दलित का जो वोट उनसे छिटका था, वे वापस आएंगे।
सूत्रों के मुताबिक बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार एक दूसरे के संपर्क में हैं। साथ ही दोनों में से किसी ने भी किसी खास इलाके के लिए जिद नहीं की है। सपा के मुखिया अखिलेश यादव, आरएलडी और निषाद पार्टी जैसे छोटे दलों को भी इस गठबंधन में कुछ सीटें दिए जाने के हिमायती हैं। खबरें तो ये भी हैं कि भाजपा सरकार में शामिल एसबीएसपी भी इस गठबंधन में शामिल हो सकती है। इस पार्टी के मुखिया और यूपी के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर खुले तौर पर योगी सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर चुके हैं।
बताया यह भी जा रहा है कि अखिलेश यादव, उनके पिता मुलायम सिंह यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती खुद लोकसभा चुनाव मैदान में उतरेंगे। जिससे गठबंधन के समर्थकों के बीच एक सकारात्मक संदेश जाए। मायावती 2004 के बाद कोई लोकसभा चुनाव नहीं लड़ीं हैं। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी बीएसपी के साथ कांग्रेस से गठबंधन और हरियाणा में आईएनएलडी और यूपी में सपा के साथ गठबंधन ने प्रधानमंत्री बनने की मायावती की महत्वाकांक्षा को बढ़ा दिया है। बीएसपी के एक नेता ने बताया है कि इसलिए मायावती चाहती हैं कि इस गठबंधन की नींव मजबूत हो।
यूपी में महागठबंधन की चुनावी रणनीति में कांग्रेस बाहर रह सकती है। माना यह जा रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी 35 और बहुजन समाज पार्टी 40 सीटों पर लड़ सकती है। बाकी सीटें सहयोगी दलों के लिए छोड़ी जाएंगी। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस समझौते की रूपरेखा के संकेत दे दिए हैं। उन्होंने कहा कि बसपा से समझौता करने के लिए वे दो-तीन सीटों का त्याग करने के लिए भी तैयार हैं। ऐसे में तीन सीटें राष्ट्रीय लोक दल को दी जा सकती हैं। सपा सूत्रों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में बन रही विपक्षी एकता में कांग्रेस को यूं तो शामिल नहीं किया जाएगा, लेकिन राहुल गांधी और सोनिया गांधी की सीटें अमेठी और रायबरेली पर विपक्ष अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगा।
दरअसल, राज्य में कांग्रेस अपना आधार खो चुकी है। फूलपुर और गोरखपुर के लोकसभा उपचुनावों में अकेले लड़कर कांग्रेस के उम्मीदवारों को महज 19,353 और 18,858 वोट ही मिले। सपा और बसपा नेताओं का मानना है कि कांग्रेस के पास अब न दलित वोट हैं, न पिछड़े और न ही अल्पसंख्यक। कांग्रेस को अधिकतर वोट सवर्णों के मिल रहे हैं जो भाजपा के भी वोट बैंक हैं। यानी कांग्रेस को मिल रहा हर वोट भाजपा के खाते से ही जा रहा है। यदि कांग्रेस विपक्षी एकता में शामिल हो जाती है तो ये सवर्ण भी भाजपा में चले जाएंगे। इसीलिए सपा-बसपा को लगता है कि कांग्रेस के अलग लड़ने से ही उन्हें ज्यादा फायदा है। पिछले लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों के अलग-अलग लड़ने की वजह से भाजपा को सहयोगियों के साथ राज्य की 80 में से 73 सीटें मिली थी जबकि सपा पांच और कांग्रेस दो सीटों पर ही जीत पाई थी। बसपा के खाते में एक भी सीट नहीं आई थी। यही वजह रही कि इस बार सभी विपक्षी दल साथ मिलकर लड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
इस साल के आखिर में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं। मध्य प्रदेश में बसपा और कांग्रेस के बीच बात चल रही थी। कहा जा रहा था कि मायावती राज्य की 230 सीटों में से 50 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती थीं, लेकिन पार्टी नेता बसपा को 30 से ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं हुए। लिहाजा मायावती ने राज्य की सभी सीटों पर अकेले लड़ने का ऐलान किया है। छत्तीसगढ़ में उन्होंने अजीत जोगी की पार्टी से गठबंधन क डाला है। राजस्थान में भी कांग्रेस के कुछ नेता बसपा के साथ गठबंधन नहीं चाहते थे। लिहाजा यहां भी बसपा अकेले मैदान में उतरेगी। मध्य प्रदेश और राजस्थान में अकेले लउ़ने का एलान 3 अक्टूबर को मायावती ने कर दी।
राजनीतिक पंडितों ने संभवतः एक महत्वपूर्ण बात नजरअंदाज कर दी। लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 80 में से 73 सीटें लाकर प्रचंड बहुमत भले ही पाया हो, लेकिन बसपा ने अपना आधार वोट बैंक बचा लिया था। उत्तर प्रदेश में लगभग 20 फीसदी दलित 19 फीसदी मुसलमान और 27 .5 फीसदी पिछड़ी जातियां हैं। बसपा को भले ही एक भी लोकसभा सीट नहीं मिल पाई हो, लेकिन लगभग 20 फीसदी वोट पाने में वह कामयाब रही।
1990-91 के बाद से ही बसपा ने अपने वोट बैंक में धीरे-धीरे इजाफा किया और 1993 के बाद से लगातार 65-70 विधानसभा सीटें जीतने में वह कामयाब होती रही। 1995, 1996 और 2002 में मायावती ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। तभी उनको एहसास हुआ कि उन्हें अपना वोट बैंक दलित और मुसलमानों से इतर भी बढ़ाना पड़ेगा। तब उन्होंने सर्वजन समाज की बात की और सवर्णों को अपनी पार्टी में न सिर्फ शामिल किया, बल्कि उन्हें महत्वपूर्ण स्थान भी दिए। नतीजा 2007 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला, जब बसपा को 40.43 प्रतिशत वोट मिले। उसने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत पाया। मायावती सरकार ने अपना 5 साल का कार्यकाल भले ही पूरा कर लिया हो, लेकिन उपलब्धियों के नाम पर पूरे प्रदेश में सिर्फ अंबेडकर पार्क बनवाए गए और कांशीराम और मायावती की मूर्तियां लगाई गईं।
इसके बावजूद इसी बीच 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा को उत्तर प्रदेश की 80 में से 20 सीटें मिलीं। वोट प्रतिशत लगभग 13 फीसदी गिरा और 28 .1 फीसदी पर आ गया।  2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी। मायावती का मत प्रतिशत 26 प्रतिशत रह गया। माना गया कि सवर्ण धीरे-धीरे मायावती का साथ छोड़ रहे थे। समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान अल्पसंख्यकों ने भी बसपा का साथ छोड़कर सपा का दामन थाम लिया। नतीजा 2014 के लोकसभा चुनाव में दिखा जब बसपा एक भी सीट न जीत पाई और उसका मत प्रतिशत 19 .77 तक गिर गया। लेकिन इस साल मई में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा को भले ही 19 सीटें मिली हो उसका वोट बैंक लगभग ढाई फीसदी बढ़ गया।
मायावती का राज्यसभा से इस्तीफा देना भी उनकी रणनीति थी। दलितों के सम्मान के सवाल पर उनका इस्तीफा देना महज सांकेतिक राजनीति है। सहारनपुर दंगों में भाजपा समर्थित भीम आर्मी की सक्रियता और राम नाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाने जैसे फैसलों से उन्हें दलित वोट बैंक में भी सेंध लगती दिखाई दे रही है। उसी को अपने साथ लामबंद करने के लिए ही उन्होंने इस्तीफा दिया।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस के अलावा छोटे-छोटे दल भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। 2014 में भाजपा की जीत का एक कारण उनका विभिन्न राज्यों के छोटे दलों से गठबंधन बनाना रहा था। इसलिए उत्तर प्रदेश के छोटे दलों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यहां के छोटे दल जैसे निषाद पार्टी, पीस पार्टी, अपना दल (सोनेलाल), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) और अखिल भारतीय मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) 2019 में कई लोकसभा सीटों पर सीधे असर ना डाल पाएं लेकिन जिस तरह से प्रदेश में बात बीजेपी बनाम संयुक्त विपक्ष के बीच चुनावी मुकाबले की हो रही है, तो उसमें ये दल खुद की अहम भूमिका जताने की कोशिश में लगे हैं। ये संभावना है कि इन दलों को कोई भी गठबंधन कम सीटें दे लेकिन इनका मानना है कि चुनाव में अगर मुकाबला कड़ा रहता है तो उस स्थिति में इनके वोट ट्रांसफर से पासा किसी भी तरफ पलट सकता है।
गोरखपुर से लोकसभा के उपचुनाव जीत चुके सांसद प्रवीण निषाद ने कहा कि अभी के हालात में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, पीस पार्टी, निषाद पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल मिलकर 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। प्रवीण निषाद एसपी उम्मीदवार के तौर पर योगी आादित्यनाथ द्वारा खाली की गई गोरखपुर सीट से चुनाव जीते थे। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि निषाद पार्टी को अपना हिस्सा मिलना चाहिए और उन सीटों को हमें दिया जाना चाहिए जिन पर हमारा हक बनता है और अगर ये नहीं होता तो नतीजे कुछ और हो सकते हैं। निषाद पार्टी के उतर प्रदेश के प्रभारी का कहना है कि वे लगभग पांच से छह सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते हैं।
राज्य में छोटी पार्टियां विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनने ही कोशिश में नहीं हैं, बल्कि इनमें से कुछ बीजेपी के साथ भी हैं। ऐसी ही एक पार्टी अपना दल (सोनेलाल) है, जिनकी नेता अनुप्रिया पटेल एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं। अपना दल (एस) के प्रवक्ता अरविंद शर्मा ने बताया कि ‘बीजेपी के साथ हमारा गठबंधन 2007 से है जब हमारी पार्टी के संस्थापक सोनेलाल पटेल भी हमारे बीच थे। 2019 में भी हम बीजेपी के साथ ही गठबंधन में लड़ रहे हैं।’ अरविंद आगे कहते हैं कि ‘रणनीति क्या होगी और पूर्व शर्तें क्या होंगी हालांकि ये तय नहीं है। लेकिन हम सैद्धांतिक रूप से एक साथ हैं और हम भाजपा के भरोसेमंद सहयोगी हैं।’ अरविंद याद दिलाते हैं कि पूर्वांचल के जिन इलाकों में कुर्मी आबादी का प्रभाव है वहां पर पहले भी अपना दल ने अपने वोट बीजेपी के उम्मीदवारों के पक्ष में स्थानांतरित किए थे और उनकी जीत में मदद की थी। अरविंद शर्मा ने दावा किया कि अपना दल (एस) के पास कुर्मियों के 12 फीसदी मत हैं और वो चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे।
उत्तर प्रदेश में एक और दल आने वाले लोकसभा चुनाव में अपने कदम जमाने की कोशिश में है। ये असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम है। एआईएमआईएम विपक्षी गठबंधन के साथ मिलकर राज्य में बीजेपी से टक्कर लेना चाहती है, लेकिन वो अभी तक मिली विपक्षी पार्टियों की प्रतिक्रिया से खुश नहीं है। एआईएमआईएम के प्रवक्ता असिम वकार का कहना है कि ‘अगर विपक्ष हमारी अनदेखी करता है, तो हम जानते हैं इसका जवाब कैसे देना है और हम अकेले ही चुनाव लड़ेंगे। बिना छोटे दलों के गठबंधन के बीजेपी को 2019 में रोका नहीं जा सकता और उनकी पार्टी इसमें गेम चेंजर्स साबित होगी।’ वहीं पीस पार्टी के अध्यक्ष मोहम्मद अयूब का कहना है कि सभी उपचुनावों में, पीस पार्टी ने विपक्षी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा है और 2019 का लोकसभा चुनाव भी हम विपक्ष के साथ गठबंधन में ही लड़ेंगे।
यूपी में 201 9 के संसदीय चुनावों में एक और छोटी पार्टी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में है। वह है सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी। यह पार्टी इस वक्त बीजेपी की सहयोगी है। इसके नेता ओम प्रकाश राजभर उत्तर प्रदेश में योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। हालांकि पार्टी के प्रवक्ता अरुण राजभर कहते हैं कि वो 2019 का लोकसभा चुनाव बीजेपी के साथ तभी लडं़ेगे जब आरक्षण को लेकर उनकी शर्त को पहले पूरा किया जाता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार संजय कुमार पांडे कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में टक्कर कांटे की हो सकती है। ऐसे में छोटी पार्टियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि पांडे का ये भी कहना है कि ‘यदि महागठबंधन बनता है, तो इन छोटी पार्टियों की भूमिका कुछ हद तक कम हो जाएगी। लेकिन फिर भी इनका कुछ असर तो रहेगा ही।’ वहीं जेएनयू के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर मनींद्र नाथ ठाकुर का कहना है कि छोटे दलों की भूमिका उस स्थिति में महत्वपूर्ण होगी जब चुनाव एक तरफा ना होकर टक्कर का होगा। चुनाव का ये दौर छोटे स्तर तक प्रबंधन का है। इसलिए छोटी पार्टियां महत्वपूर्ण हो जाती हैं। अब देखना ये होगा कि किस तरह से खासकर उत्तर प्रदेश में इन छोटे दलों को बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां और राष्ट्रीय दल अपने-अपने पक्ष में कर सकते हैं, क्योंकि इनका असर बड़े राजनीतिक दल गोरखपुर और कैराना के उपचुनाव में देख चुके हैं।

2014 में उ.प्र. में लोकसभा सीटों की स्थिति

पार्टी                     सीटें             वोट शेयर (प्रति. में)
भाजपा              71                  42.6
सपा                  5                   22.3
कांग्रेस              2                   7.5
अपना दल        2                    1
बसपा               0                   19.8
1 Comment
  1. Issy 2 days ago
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    I waentd to spend a minute to thank you for this.

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