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बुलंद हौसलों के साथ

बहुत संभावना है कि पूर्वांचल, बुंदेलखंड, पश्चिमांचल और अवध क्षेत्र के लिए चार कार्यकारी अध्यक्षों के साथ-साथ पार्टी अपने अनुवांशिक संगठनों में भी नए चहेते की नियुक्ति कर संगठन को पूरी तरह सक्रिय करे। पार्टी सूत्रों का यह भी दावा है कि ऐसे छोटे दलों के नेतृत्व से भी संपर्क किया जा रहा है जो सपा-बसपा के हालिए गठबंधन में शामिल नहीं किए गए हैं। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष शिवपाल यादव कांग्रेस संग गठबंधन के लिए अपनी इच्छा सार्वजनिक रूप से जाहिर कर चुके हैं तो अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेताओं संग भी कांग्रेस की बातचीत का दौर शुरू होने की खबर है
आ जादी के बाद से ही उत्तर प्रदेश की ख्याति देश की राजनीति को दशा और दिशा देने की रही है। सबसे अधिक प्रधानमंत्री मुल्क को देने वाले प्रदेश की हनक हालांकि नब्बे के पूर्वाध से कुछ कम होती चली गई। 2014 के आम चुनावों में भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने में उत्तर प्रदेश के विशेष योगदान के चलते एक बार फिर प्रदेश का महत्व राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित हो चला है। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती का कथन कि ‘उत्तर प्रदेश तय करेगा देश का अगला पीएम’ इस दृष्टि से ना केवल प्रासंगिक, बल्कि केंद्र में अगली सरकार बनाने के लिए संघर्ष कर रहे कांग्रेस अध्यक्ष को एक बड़ी चुनौती भी है। सपा-बसपा ने उत्तर प्रदेश में गठबंधन कर जहां भाजपा भीतर खलबली मचाने का काम किया है, कांग्रेस को इस गठबंधन में इग्नौर कर अखिलेश और मायावती ने सीधे राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकता के प्रयासों पर भी कुठराघात कर डाला है। स्पष्ट है, सपा-बसपा कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में इस योग्य भी नहीं समझती कि वह अपने परंपरागत वोट बैंक को गठबंधन में शिफ्ट करा सके। 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने सपा से गठबंधन कर 105 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। इसमें से मात्र 9 ही अपनी जीत दर्ज करा सके। सपा ने 298 सीटों पर चुनाव लड़ा और कुल 42 सीट पर विजय हासिल कर पाई। बसपा का तो पूरे प्रदेश में सबसे खराब प्रदर्शन रहा मायावती के केवल 15 उम्मीदवार ही चुने गए। यदि 2012 के विधानसभा चुनावों में मिले वोटों को आधार बनाया जाए तो कांग्रेस के खाते में मात्र 59 सीटें आनी चाहिए थी। ये वे सीटें हैं जिन पर कांग्रेस उम्मीदवार या तो जीते थे या फिर दूसरे स्थान पर रहे थे। लेकिन कांग्रेस ने इन चुनावों में केवल 32 ऐसी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए जबकि 82 उम्मीदवार उन विधानसभा सीटों पर सपा संग गठबंधन कर उतारे जहां उसका जनाधार बेहद कमजोर था। नतीजा इस गठबंधन की करारी हार के रूप में सामने आया। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे 2014 के लोकसभा चुनावों से पूरी तरह प्रभावित रहे। सपा हालांकि इन चुनावों में मात्र 45 सीटें जीत सकी लेकिन उसका मत प्रतिशत स्थिर  रहा। दूसरी तरफ कांग्रेस का मत प्रतिशत सिकुड़ गया। अखिलेश यादव और मायावती का कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के गठबंधन से बाहर रखने के पीछे एक बड़ा कारण कांग्रेस के परंपरागत वोटों का सपा प्रत्याशियों को 2017 के विधानसभा चुनावों में ट्रांसफर ना हो पाना है। एक अन्य बड़ा कारण मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सपा-बसपा को कांग्रेस नेतृत्व द्वारा हाशिए में रखना भी रहा है। ऐसे हालातों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का उत्तर प्रदेश में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा ऊपरी तौर पर भले ही मजबूरी में लिया गया फैसला नजर आता है और राजनीतिक विश्लेषक इसे कांग्रेस के हित में उठाया कदम आंक रहे हैं। कांग्रेस सूत्रों का दावा है कि पूरे उत्तर प्रदेश में आज भी कांग्रेस का 12 प्रतिशत ऐसा वोट बैंक है जो किन्हीं भी परिस्थिति में पार्टी को छोड़ता नहीं है। जानकारों की माने तो कांग्रेस अध्यक्ष स्वयं उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को पुर्नजीवित करने का बीड़ा उठा चुके हैं। उत्तर प्रदेश को कांग्रेस जल्द ही नया अध्यक्ष और चार कार्यकारी अध्यक्ष बना सकती है। बहुत संभावना है कि पूर्वांचल, बुंदेलखंड, पश्चिमांचल और अवध क्षेत्र के लिए चार कार्यकारी अध्यक्षों के साथ- साथ पार्टी अपने अनुवांशिक संगठनों में भी नए चहेते की नियुक्ति कर संगठन को पूरी तरह सक्रिय करे। पार्टी सूत्रों का यह भी दावा है कि ऐसे छोटे दलों के नेतृत्व से भी संपर्क किया जा रहा है जो सपा-बसपा द्वारा हालिए किए गए गठबंधन में शामिल नहीं किए गए हैं। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष शिवपाल यादव कांग्रेस संग गठबंधन के लिए अपनी इच्छा सार्वजनिक रूप से जाहिर कर चुके है तो अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेताओं संग भी कांग्रेस की बातचीत का दौर शुरू होने की खबर है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हालिया संपन्न तीन राज्यों में मिली चुनावी जीत से उत्साहित कांग्रेस अध्यक्ष का उत्तर प्रदेश में अपने दम पर चुनाव लड़ने की घोषणा राज्य में हाशिए पर जा चुकी पार्टी को नया जीवनदान देने समान है। पिछले तीन दशक से राजनीतिक उपेक्षा से हताश-निराश कांग्रेसियों में राहुल गांधी के इस निर्णय के बाद उत्साह का संचार तो हुआ ही है। कई ऐसे पुराने कांग्रेसी दिग्गज जो कठिन समय में पार्टी का दामन छोड़ अन्य दलों की शरण में चले गए थे, अब कांग्रेस में वापसी के लिए उत्सुक बताए जा रहे हैं। आजादी के बाद बारह में से दस प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से रहे हैं। इनमें से पांच कांग्रेस से रहे हैं। जाहिर है कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में मजबूत जनाधार रहा है जो बदलते समीकरणों के चलते उससे खिसक गया। यदि वाकई राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में पार्टी संगठन को दुरस्त करने का बीड़ा उठा रहे हैं तो 2019 के आम चुनावों में पार्टी वर्तमान लोकसभा की दो सीटों से बेहतर प्रदर्शन राज्य में कर सकती है।

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