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विधानसभा चुनावों के नतीजे साबित करते हैं कि अब न तो मोदी मैजिक का असर रहा और न ही अमित शाह का शिल्प काम आया। राजस्थान और मध्य प्रदेश में तो यह स्थिति रही कि जहां-जहां अमित शाह ने खुद टिकट  बांटे वहां-वहां पार्टी की करारी हार हुई। मोदी और शाह तक सिमटी भाजपा के लिए अब आगामी लोकसभा चुनाव की दृष्टि से आत्म मंथन की जरूरत है। कांग्रेस के लिए भी चुनौती है कि बदलाव की जो बयार उसके पक्ष में चल पड़ी है, वह उसका कितना लाभ उठा पाती है
पां च राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजां को अगर अगले साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के साथ जोड़कर देखा जा रहा है तो इसमें कोई हैरानी वाली बात नहीं। आश्चर्य इस बात का भी नहीं होना चाहिए कि इन नतीजों में भाजपा को मिली पराजय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की नाकामयाबी माना जा रहा है। हैरत इस बात की भी क्योंकर हो कि इसे आगामी लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है? यह सब इसलिए कि 2014 से ही हर चुनाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़ दिया गया। इसे मोदी मैजिक का नाम दिया गया।
ज्यादा समय नहीं बीता जब विधानसभा चुनाव में मिली सफलता से गदगद प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली के केंद्रीय भाजपा कार्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को ‘जीत का शिल्पकार’ कहा था। अब ‘मोदी मैजिक’ और ‘जीत के शिल्पकार’ का शीराजा खर बिखता सा लग रहा है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, और छत्तीसगढ़ में सत्ता छिन जाने के बाद भाजपा के भीतर भी सरगोशियां शुरू हो गयी हैं। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने मध्य प्रदेश के इंदौर और भोपाल सरीखे जिन शहरों में सारे टिकट तय किए थे, वहां भाजपा को करारी हार मिली। इतना ही नहीं राजस्थान में जहां-जहां वसुंधरा को धूल चटाने के लिए मोदी-शाह ने जोर लगाया वहां महरानी ने अपना किला बचा लिया। लेकिन जिन 42 सीटों पर अमित शाह ने दिल्ली में बैठकर टिकट बांटे थे उनमें से 32 पर भाजपा को पराजय का मुंह देखना पड़ा। छत्तीसगढ़ में मोदी के प्रिय अडानी के कई प्रोजेक्ट फंसे हुए थे। उन्होंने भाजपा के पक्ष में पैसा पानी की तरह बहाया मगर वहां की जनता रमन शासन से ज्यादा खफा थी। उसने अपनी नाराजगी को वोटों के जरिए जाहिर की।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व में इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी की है। मोदी के सुनामी कहे जाने वाले व्यक्तित्व के मुकाबिल राहुल गांधी तनकर खड़े हुए। कांग्रेस की इस जीत से बड़े संकेत जनता के बीच गए हैं। पहला यह कि चाणक्य कहे जाने वाले  अमित शाह की चतुराई और कौशल के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू भी शायद अब टूटने लगा है। संगठन और पार्टी के अन्य बड़े तथा काबिल नेताओं को नजरअंदाज कर सिर्फ और सिर्फ मोदी तक सिमट जाने वाली भाजपा के लिए आगे की राह मुश्किलों से भरी होगी। पिछले चुनावों में मोदी के चेहरे को भाजपा और भाजपा की जीत का प्रतीक बना दिया गया था। उस प्रतीक पर इन मौजूदा चुनावी नतीजों ने चोट किया है। दूसरे इस जीत से लोगों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के प्रति भरोसा बढ़ा है। देश की जनता में यह संदेश गया है कि पप्पू कहकर अब तक खारिज किया जाने वाला राहुल इतना भी नक्कारा नहीं है। वह सीधे प्रधानमंत्री पर आक्रमण कर सकता है। उनके सामने चुनौती पेश कर सकता है और महाभारत में मात देने में सक्षम है।
जीत के बाद राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस की। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी कभी प्रेस से मुखातिब नहीं हुए। वे हमेशा ही सवालों से बचते हैं। मुख्यमंत्री थे, तब भी एकतरफा संवाद करते थे। खैर राहुल गांधी ने विनम्रतापूर्वक अपनी बातें रखीं। उन्होंने कहा कि यह जीत कांग्रेस कार्यकर्ताओं, किसानों, युवाओं और छोटे व्यापारियों की है। उन्होंने सबसे पहले तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को उनके अच्छे कार्य की बधाई दी है। तय है वे राजनीति में इधर प्रचलित हुए मुहावरे से जुदा शैली गढ़ रहे हैं। उनकी यह शैली लोगों को पसंद आई। शायद एक ऐसे दौर में जब देश के प्रधानमंत्री बहुत बोलते हैं और उनके शब्दों में उनका दंभ प्रकट होता है, राहुल की विम्रता की यह शैली उनका एक अलग ही तरह का व्यक्तित्व बनाती है। संसद में भी राफेल पर बोलते हुए राहुल ने प्रधानमंत्री मोदी के पास खुद जाकर उनको गले लगा लिया था। मोदी से पहले देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुछ बोलते ही नहीं थे। इसलिए मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में बोलना शुरू में लोगों को अच्छा लगा, लेकिन अब इनके ज्यादा बोलने से देश की जनता भी उबने लगी है।
मौजूदा भाजपा की हार मोदी की मुश्किलें बढ़ाने वाली है। इसकी कई वजहे हैं। एक तो सीधा फंडा यह है कि इन तीनों राज्यों में लोकसभा की कुल 65 सीटों में से भाजपा को 62 पर जीत मिली थी। वह मोदी की लहर थी। मध्य प्रदेश की 29 में से 27, छत्तीसगढ़ 11 में से 10 और राजस्थान की 25 सीटों पर भाजपा का कब्जा रहा। अब अगर मौजूदा नतीजों के आधार पर आकलन करें तो यह सीटें आधी से भी कम हो जाएंगी। एक और बात है कि कांग्रेस अब नए की तलाश में है जबकि भाजपा के सहयोगी दल उससे अपना दामन झटक रहे हैं। शिव सेना के बाद अब बिहार में उपेंद्र कुशवाह ने भी दो-तीन दिन पहले राजग से अलग होने का एलान करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल  से इस्तीफा भी दे दिया।
भाजपा-कांग्रेस की हार-जीत के शोर में मिजोरम में कांग्रेस की विदाई और तेलंगाना में 119 में से 88 सीटें जीतकर चंद्रशेखर राव ने अपनी मजबूत पकड़ का सबूत दे दिया है। साथ ही मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट के हाथ लगी 26 सीटें भी क्षेत्रीय दलों का वजूद बने रहने का संकेत है। बहरहाल कांग्रेस मुक्त भारत का सुनहरा स्वप्न देखने वाले मोदी-शाह को इन नतीजों से सबक लेना चाहिए जो उनकी फितरत नहीं है। मगर उनके पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है जो आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर आत्ममंथन करें।
भाजपा के मोदी मुद्दे की भी हवा निकल गई। कट्टर हिन्दुत्व के नए प्रतीक बने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी भी नाकाम साबित हुए। ऐसे में भाजपा-कांग्रेस दोनों को ही अगले लोकसभा चुनाव के लिए अपने अनुकूल क्षेत्रीय दलों के साथ मित्रता का हाथ बढ़ाना पड़ सकता है। वैसे भी कहा जा रहा है कि मौजूदा नतीजों में राहुल की जीत से ज्यादा मोदी की हार ज्यादा अहम है। अब भाजपा को अपने तरकश से कोई नया तीर निकालना होगा जिससे वह विपक्ष को मात दे सके।

 

अनुभव बनाम जोश के बीच चुनाव

 

यह अच्छी बात है कि कांग्रेस ने तीन राज्यों में भाजपा से सत्ता छीन ली है। यह भी अच्छी बात है कि राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने के साल भर के भीतर यह बड़ी कामयाबी हासिल की है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा का पिछले पंद्रह सालों से शासन रहा है। दोनों ही प्रदेशों में भाजपा चौथी बार सरकार बनाने के मूड में थी। लेकिन जनता का मूड कुछ और था। उसने कांग्रेस पर भरोसा किया और सत्ता परिवर्तन कर जनतंत्र का बेमिसाल उदाहरण पेश किया। यहां तक तो सब ठीक है। लेकिन सत्ता की लालसा सबको है चाहे वह पार्टी हो या व्यक्ति। और यहीं आकर तीन प्रदेशों में मुख्यमंत्री के सवाल पर कांग्रेस थोड़ी देर के लिए फंसती मालूम पड़ी। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने की लड़ाई कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया तो राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के दरम्यान रही। अनुभव बनाम युवा जोश का यह संघर्ष दोनों ही सूबों में खूब परवान चढ़ा। चारों नेताओं के समर्थक नतीजों के आते ही सड़कों पर आ गए। वे अपने-अपने नेता को मुख्यमंत्री बनाने की जोरदार मांग कर रहे थे।
मुख्यमंत्री के दावेदारों ने व्यक्तिगत तौर पर कुछ नहीं कहा मगर उनके समर्थक काफी आक्रोशित मूड में दिखाई दे रहे थे। बताया गया कि राजस्थान में सचिन पायलट के साथ 60 विधायक हैं। यही स्थिति मध्य प्रदेश की भी रही जहां एक बड़ा खेमा युवा सिंधिया के साथ था और लगातार उनको मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग कर रहा था। छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री को लेकर टकराहट दिखाई दी। यहां भूपेश बघेल, टीएस सिंह देव और ताउम्र ध्वज में खींचतान रही।
मुख्यमंत्री बनने के मुद्दे पर टकराव बढ़ते ही इस बाबत अंतिम फैसला लेने का अधिकार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को सौंप दिया गया जो कांग्रेस की पुरानी परंपरा रही है। राज्यों के मुख्यमंत्री आलाकमान के फरमान से बनाने की कांग्रेस की फितरत रही है। पार्टी प्रवक्ता रणदीय सुरजेवाला ने कहा कि हालांकि नव निर्वाचित विधायकों ने पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को मुख्यमंत्री चुनने के लिए अधिकृत किया है लेकिन पार्टी हर चुने हुए विधायक की राय ले रही है। राहुल गांधी ने इन राज्यों के पर्यवेक्षक नियुक्त किए। एके एंटनी को मध्य प्रदेश, मल्लिका अर्जुन खड़गे को छत्तीसगढ़ और केसी वेणुगोपाल को राजस्थान का पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया।
मध्य प्रदेश में तमाम लोग जीत का श्रेय कमलनाथ को दे रहे हैं। उन्होंने खेमों में बंटी कांग्रेस को प्रदेश अध्यक्ष बनते ही एकजुट किया। चाहे दिग्विजय सिंह रहे हों या ज्योतिरादित्य सिंधिया दोनों के बीच कमलनाथ ने तालमेल बनाते हुए सबको एक साथ किया और नतीजा सामने है कि 15 साल बाद प्रदेश में कांग्रेस की वापसी हुई है। कमलनाथ की खासियत यह रही है कि वो सबको साथ लेकर चलते हैं। इकहत्तर साल के कमलनाथ हर उस रणनीति के उस्ताद बताए जाते हैं जिसका पार्टी में एक लंबे अरसे से अभाव दिखाई दे रहा था।
जानकारों के अनुसार अगर आगामी लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश से कांग्रेस को बेहतर प्रदर्शन और सीटें चाहिए तो इसके लिए कमलनाथ काबिल मुख्यमंत्री साबित हो सकते हैं। लेकिन प्रदेश का युवा ज्योतिरादित्य के साथ है। बिल्कुल यही कहानी राजस्थान की भी है। वहां अशोक गहलोत पहले भी प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और अनुभवी हैं। लेकिन वहां भी युवा नेता सचिन पायलट को नेतृत्व देने की मांग बुलंद होती रही।
मुख्यमंत्री दोनों राज्यों में चाहे जो भी बने, एक बात तय है। वह यह कि मुख्यमंत्री पद से वंचित रह जाने वाला नेता और उसके समर्थकों की मायूसी कहीं अगामी लोकसभा चुनाव में भितरघात में न तब्दील हो जाए। ‘अच्छा अब हम सबक सिखाते हैं’ वाला मूड और सोच पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है। लिहाजा राहुल गांधी को एक साथ दो-मोर्चों पर अगले लोकसभा चुनाव के बाबत जूझना है। मोदी-शाह को टक्कर देने के साथ-साथ पार्टी के आंतरिक संघर्ष को भी शांत करने की उनके सामने कठिन चुनौती है।

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