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रेमडेसिविर के बाद अब बाजार में ब्लैक फंगस की दवाइयों की कालाबाजारी 

कोरोना काल में सबसे ज्यादा संकट दवाइयों, बेड, वेंटिलेटर और ऑक्सीजन का रहा। हालांकि अब धीरे-धीरे इन सभी की कमी पूरी होने लगी है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ कोरोना के खत्म होने के बाद अब देश में ब्लैक फंगस नामक बीमारी का प्रकोप बढने लगा है।

अब तक इस बीमारी की जद में देश के 10 प्रदेश आ चुके हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में ही अब तक 90 से ज्यादा मामले मिल चुके हैं। नोएडा में भी आज इस बीमारी का एक मरीज मिल गया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वास्थ्य अलर्ट जारी कर दिया है। लेकिन इस समय जो चिंता सताए जा रही है वह है इस बीमारी की दवाइयों की कमी पडना। जिस तरह कोरोना में रेमडेसिविर नामक इंजेक्शन के लिए मारामारी मची थी। लोगों ने लाखों रुपए देकर ब्लैक में रेमडेसिविर इंजेक्शन को खरीदा था।

कुछ ऐसी ही संभावना अब ब्लैक फंगस बीमारी में काम आने वाली दवाइयों की व्यक की जाने लगी है। कई अस्पतालों और डाक्टरों ने इस तरफ इशारा किया है कि रेमेडिसिविर दवा की कालाबाजारी जिस तरह से शुरू हुई थी अब लिपोस्माल एम्फोटेरिसिन इंजेक्शन की भी पूरे देश में कालाबाजारी हो सकती है।

बताया जा रहा है कि ये दवा अभी तक बाजार में 5 से 8 हजार में अलग-अलग कंपनियों की मिल रही थी। हालांकि ब्लैक फंगस के आने के बाद अब बाजार से ये इंजेक्शन गायब है।

कई अस्पतालों की तरफ से कहा गया है कि कोविड-19 के नतीजे में होनेवाला म्यूकोरमाइकोसिस के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इस फंगल संक्रमण के कारण कई कोविड-19 मरीजों ने अपनी जान गंवा दी है। विशेषकर डायबिटीज के मरीजों को इस बीमारी का ज्यादा खतरा रहता है।

अब लोगों की ज्यादा चिंता खुद संक्रमण के मुकाबले कोविड-19 के मरीजों में ब्लैक फंगस बढ़ने को लेकर है। देश में खराब होती स्थिति के बीच म्यूकोरमाइकोसिस के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महत्वपूर्ण दवा लिपोस्माल, वोरिकोनाडोल, थाइमोसिन अल्फा और
एम्फोटेरिसिन इंजेक्शन
की कमी ने चिंता बढ़ा दी है।

बताया जा रहा है कि पूरे सूबे में अचानक लिपोस्माल वोरिकोनाडोल, थाइमोसिन अल्फा और एम्फोटेरिसिन इंजेक्शन की मांग दस गुना तक बढ़ गई है। बताया जा रहा है कि डॉक्टरों ने दवा कारोबारियों को हजारों इंजेक्शन के ऑर्डर दे दिए हैं लेकिन कम्पनियों ने ऑर्डर पूरा करने में एक 15 से 20 दिन तक का समय लगने के आसार बताएं हैं। बताया जा रहा है कि इन दवाओं की पूर्व में सीमित मांग ही रही। अब इनका ज्यादा से ज्यादा उत्पादन शुरू करने की मांग अचानक बढ गई है।

सिपला कंपनी के लिए रेमेडिसिविर जैसी दवा बनाने वाली कमला लाइफ साइंस लैब की माने तो ब्लैक फंगस के लिए इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन का कुछ प्रोडक्शन उन्होंने किया था। लेकिन रॉ मैटेरियल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है जिसकी वजह से इसका प्रोडक्शन नहीं हो पा रहा। बाजार में इसकी डिमांड बढ़ने के साथ भारी कमी देखने को मिल रही है।

इस मामले में अपोलो हॉस्पिटल्स में सीनियर ईएनटी सर्जन डॉक्टर कोका रामबाबू बताते हैं कि इंजेक्शन की अनुपलब्धता चिंता का कारण है। साथ ही वह कहतें हैं कि शुरुआती इलाज के बाद इस्तेमाल होनेवाली दवाइयां भी आपूर्ति में कम हैं।

रिपोर्ट से पता चलता है कि म्यूकोरमाइकोसिस के तेजी से बढ़ते मामलों की वजह से मांग में इजाफा हो गया है। जिसकी वजह से इन दवाइयों को ब्लैक मार्केट में महंगे दाम में बेचा जा रहा है। दवा की असली कीमत के मुकाबले धंधे में शामिल लोग तीन गुना ज्यादा दाम वसूल रहे हैं।

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