हार में भाजपा गठबंधन सरकार में शामिल है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नाटकीय अंदाज में रातां-रात राजद को झटक दे कर भाजपा का दामन थामा था। अब देश भर की नजरें आगामी 2019 के लोकसभा चुनाव पर हैं कि भाजपा, जद(यू) और राजद क्या हासिल करते हैं और क्या गंवाते हैं।

खबर है कि आगामी लोकसभा चुनाव के लिए जद(यू) और भाजपा में सीटों का बंटवारा हो गया है। दोनों के बीच मामला फिफ्टी- फिफ्टी पर निपटा है। इस बंटवारे को भाजपा का नरम पड़ जाना माना जा रहा है। भाजपा खुद 16 सीटों पर लड़ेगी बाकी चार वह अपने सहयोगी दलों को देगी। रामविलास पासवान के लोजपा के लिए तीन और उपेंद्र कुशवाह की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के लिए एक सीट छोड़ रही है। मगर राम विलास पासवान और कुशवाह दोनों ही अपने लिए ज्यादा सीटों की मांग कर रहे हैं। दोनों ही दलों को भाजपा का जद(यू) से फिफ्टी-फिफ्टी का समझौता करना ठीक नहीं लगा।

असल में भाजपा बिहार में डिफेंसिव दिखाई पड़ रही है। कहीं न कहीं उसे लालू प्रसाद के राजद-कांग्रेस गठबंधन से खतरे की संभावना दिखाई दे रही है। फिर बिहार में भाजपा के पास बड़े कद वाला कोई नेता भी नहीं है। सुशील मोदी जरूर हैं मगर वह शुरू से ही कागजी नेता रहे हैं। बयानबीर गिरिराज सिंह का भी कोई खास असर नहीं है। भाजपा लालू के जमात की सेंधमारी में पूरी तरह नाकाम रही है। पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि भाजपा यहां नीतीश से लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीट मांगेगी और विधानसभा चुनाव में उनको ज्यादा देगी। लेकिन भाजपा का बैकफुट पर जाना कहीं न कहीं उसके मंसूबे का कमजोर पड़ना साबित हो रहा है।

भाजपा के डिफेंसिव होने से बिहार के वोटरों में भाजपा को लेकर जो संदेश गया है, वह भाजपा के लिए सुखद नहीं है। यह युद्ध के पहले हौसले में कमी आ जाना लगा है। हार का संकेत है। लोग अब भी इंतजार कर रहे हैं कि सीटों के बंटवारे की फाइनल अधिकारिक घोषणा के पहले सीटों में थोड़ी बढ़ोतरी हो जाए तो भाजपा के लिए बेहतर होगा।

बिहार का पेंच अभी फंसा हुआ है। सबसे बड़ा पेंच राजग में है। सीट बंटवारे से राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा नाराज हैं। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से सम्मानजनक सीटे देने को कहा है। इस बाबत उनकी भाजपा नेता भूपेंद्र यादव से बातें भी हुई मगर कोई समाधान नहीं निकला। लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान से भी उन्होंने बात की। कुशवाहा की नाराजगी अपनी जगह और जायज है। पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी तीन सीटों पर चुनाव लड़ी थी और तीनों पर उनको जीत मिली थी। इसलिए वह अपनी पार्टी के लिए कम से कम तीन सीटें मांग रहे हैं।

सबसे बड़ी बात कि उपेंद्र कुशवाहा के लिए रास्ता खुला हुआ है। मतलब यह कि वह भाजपा को छोड़कर राजद का दामन भी थाम सकते हैं। वहां उनको ज्यादा सीटें भी मिल सकती हैं। भाजपा इसलिए भी सीटों के लिए पुनर्विचार कर सकती है। सूत्रों की मानें तो भारतीय जनता पार्टी 14 सीटों पर लड़ेगी।

लोजपा चार और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी दो सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। यह भी चर्चा है कि रामविलास पासवान लोकसभा नहीं लड़ेंगे। वह राज्यसभा का रास्ता चुनेंगे। बिहार की लगातार करवट लेती राजनीति में उपेंद्र कुशवाहा ने एक नया धमाका कर दिया है। उन्होंने कहा है- 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार खुद मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे। नीतीश पहले भी कह चुके हैं कि 15 साल मुख्यमंत्री रह चुके हैं, वह और कब तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे।

कुशवाहा का मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति अचानक आगाध प्रेम उमड़ पड़ा है। उन्होंने नीतीश कुमार को अपना बड़ा भाई बताया है। यह भी कहा है कि कोई भी उनके और नीतीश के बीच रिश्ते को जान-समझ नहीं सकता। हमारे दरम्यान कोई भी आएगा तो वह ‘फेरा’ में पड़ जाएगा।

बिहार की जातीय राजनीति में ‘लव कुश’ बड़ा फैक्टर है। लव मतलब कुर्मी? कुश माने कोयरी नीतीश कुमार कुर्मी तो उपेंद्र कुशवाहा कोयरी हैं। बिहार की राजनीति में कुर्मी-कोयरी का गठजोड़ काफी मजबूत माना जाता है। उपेंद्र कुशवाहा का यह नीतीश प्रेम भाजपा पर दबाव बनाने के लिए भी हो सकता है।

इसी बीच यह भी चर्चा है कि कई संकटों में फंसती जा रही मोदी सरकार की एक नयी मुसीबत राम मंदिर निर्माण है। सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी चतुराई के साथ गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है। ऐसे में अगर वह राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश लाती है तो बिहार में नीतीश कुमार और राम विलास पासवान अलग हो सकते हैं। हालांकि यह एक हाईपोथेरिटिकल बात है मगर सियासी गलियारों में अब 2019 के चुनाव को लेकर अटकलें परवान चढ़ने लगी हैं।

लब्बोलुआब यह कि आगामी लोकसभा चुनाव अन्य राज्यों की तुलना में बिहार में काफी जटिल दिखाई दे रहा है। यहां उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान की तरह चीजे साफ नहीं है।

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