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भाजपा के लिए वरदान बना हाईकोर्ट का फैसला 

‘‘राजनीति के रंग हजार’’, यूपी सरकार वोट के लिए नाराज चल रहे सहायक शिक्षकों को मनाने में कामयाब हो गयी। या यूं कह लीजिए उसकी किस्मत साथ दे रही है। सहायक शिक्षकों का क्रोध झेलती आ रही राज्य सरकार और जांच के दायरे में आए सहायक शिक्षकों को यह कामयाबी आज उस वक्त मिली जब हाईकोर्ट ने इस मामले में यथास्थिति बनाए रखने के आदेश जारी किए। जाहिर है इससे राज्य सरकार ने राहत की सांस ली होगी। कहा जा रहा है कि यदि हाई कोर्ट इस तरह का आदेश न देता तो निश्चित तौर पर आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को लाखों वोटों का नुकसान तय था। इस फैसले के बाद भाजपा कार्यकर्ता दावा कर रहे हैं कि पार्टी के प्रयासों से ही यह संभव हो पाया है।
हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब यह कहा जा रहा है कि भाजपा ने ही इस तरह के आदेश जारी करवाने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। खैर हकीकत कुछ भी हो लेकिन इस आदेश के बाद से भाजपा के चुनावी कार्यक्रम को काफी हद तक राहत मिली है। बताते चलें कि बेसिक शिक्षा विभाग में सहायक अध्यापकों के 68500 पदों पर नियुक्ति को लेकर भारी पैमाने पर गड़बड़ियों का खुलासा हुआ था। हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने भी अपनी जांच में घपले की पुष्टि की मुहर लगा दी थी। इस मामले में कई बड़े अधिकारियों की मिलीभगत की पुष्टि हुई थी।
इस मामले में सीबीआई ने आपराधिक षड्यंत्र, साक्ष्य मिटाने व आपराधिक धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोपों में आईपीसी की धारा 120 बी, 409, 420, 201, 467, 468 व 471 के अलावा भ्रष्टाचार निवारण एक्ट की धारा 13 (1)(ए) व 13(2) के तहत यह एफआईआर दर्ज की थी। यह एफआईआर बेसिक शिक्षा विभाग के अज्ञात अधिकारियों व कर्मचारियों, भर्ती परीक्षा कराने वाली संस्था (परीक्षा नियामक प्राधिकारी एलनगंज इलाहाबाद) के अज्ञात अधिकारियों व कर्मचारियों सहित अन्य अज्ञात सरकारी एवं निजी व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज करवायी गयी थी। सोनिका देवी बनाम उत्तर प्रदेश एवं अन्य की ओर से दायर याचिका (संख्या 24172ध्2018) पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ की ओर से एक नवंबर 2018 को पारित आदेश को आधार बनाया गया था। सीबीआई इंस्पेक्टर आरके तिवारी को इस मामले में जांच अधिकारी नियुक्त किया गया था।
प्रकरण कुछ इस तरह से है। प्रदेश के प्राथमिक स्कूलों में सहायक अध्यापकों के 68500 पदों पर नियुक्ति के लिए 23 जनवरी 2018 (मौजूदा योगी सरकार का कार्यकाल) को विज्ञापन जारी किया गया था। परीक्षा कराने वाली संस्था (परीक्षा नियामक प्राधिकारी इलाहाबाद) की ओर से 13 अगस्त 2018 को परीक्षा से सम्बन्धित उत्तरमाला जारी किया गया था। ज्ञात हो परीक्षा में अभ्यर्थियों को स्वःआंकलन के लिए उत्तर पुस्तिका की कार्बन काॅपी दी गई थी। शिकायत के आधार पर जब जांच की गयी तो गड़बड़ी निकलकर सामने आयी।
उम्मीद जतायी जा रही थी कि यदि सीबीआई ने अपनी जांच पूरी करके रिपोर्ट शासन को सौंप दी तो निश्चित तौर पर तमाम आला अधिकारियों के साथ ही सत्ताधारी दल से जुडे़ कुछ नामचीन नेताओं के चेहरे भी सामने आ जायेंगे। अब जबकि हाई कोर्ट ने उक्त प्रकरण पर यथा स्थिति बनाए रखने के आदेश जारी कर दिए हैं तो कुछ समय के लिए सहायक शिक्षकों को राहत मिल गयी है, दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव समाप्त होते ही भ्रष्टाचार से सम्बन्धित इस मामले में तेजी आयेगी और सहायक शिक्षकों का भविष्य तो अंधकार में रहेगा ही साथ ही वे शिक्षा विभाग से सम्बन्धित वे अधिकारी भी मुसीबत में नजर आयेंगे जो सीधे तौर पर इस भ्रष्टाचार में भागीदार बने हैं।
स्पष्ट है कि यह सारा खेल सरकार के दिशा-निर्देशों पर ही खेला गया है और वह भी तब जब यूपी की 80 लोकसभा सीटों पर भाजपा की दावेदारी सिमटती नजर आयी। लोकसभा चुनाव में इसका कितना असर होगा? यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन मौजूदा समय में भाजपा हाई कोर्ट के इस फैसले को किसी वरदान से कम नहीं समझ रही है। प्रदेश भाजपाई भी इस अवसर को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। प्रचारित किया जा रहा है कि भाजपा के प्रयासों से ही सहायक शिक्षकों के सिर पर लटकी तलवार कुछ समय के लिए हट गयी है। यह तलवार कब तक हटी रहेगी? जानते सभी हैं लेकिन अवसर का लाभ लेने के लिए सहायक शिक्षकों की टोली भाजपा को ही धन्यवाद प्रेषित कर रही है।

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