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राजस्थान में दो गुटों में बंटी भाजपा ,पार्टी आलाकमान के सामने एक और नई मुसीबत 

नए कृषि कानूनों को लेकर  किसान आंदोलित हैं,यह आंदोलन केंद्र सरकार के लिए गले की हड्डी बन चूका है, तो इस बीच भाजपा के लिए एक बड़ी मुसीबत यह आ खड़ी हुई है कि राजस्थान में पार्टी  दो गुटों में बंटती  नजर आ रही है। दरअसल राजस्थान में तीन सीटों पर विधानसभा उप चुनाव होने हैं। जिसके लिए भाजपा नेतृत्व द्वारा राजस्थान के नेताओं की बैठक हुई।बैठक में  वसुंधरा राजे को नहीं बुलाया गया था। इसके बाद  पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे समर्थक व विरोधी एक बार फिर आमने-सामने आ गए हैं।

वसुधंरा राजे समर्थकों ने सोशल मीडिया पर एक मंच बनाने की घोषणा करने के बाद  प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। भाजपा के इस अंदरूनी कलह का असर राज्य में होने वाले तीन विधानसभा उप चुनाव पर पड़ सकता है।

भाजपा नेतृत्व फिलहाल मामले पर नजर रखे है । सूत्रों की मानें तो राज्य में अभी भी वसुंधरा राजे को दरकिनार करना संभव नहीं है, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व राज्य पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। यही वजह है कि बीते दिनों राजस्थान के मुद्दे पर चर्चा के लिए जब प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया व अन्य प्रमुख नेता दिल्ली आए तो उनमें वसुंधरा राजे शामिल नहीं थीं। इस बैठक के बाद ही वसुंधरा राजे समर्थकों ने सोशल मीडिया पर वसुंधरा राजे समर्थक मंच बनाकर अपनी मुहिम शुरू कर दी और जिला स्तर तक इस मंच का विस्तार किया जाने लगा।

प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया ने इसका जोरदार विरोध किया और कहा कि पार्टी व्यक्ति नहीं संगठन से चलती है। उन्होंने कहा कि मंच से जो लोग जुड़े हैं, वह भाजपा के सक्रिय सदस्य नहीं है। इसके बाद सोशल मीडिया पर ही सतीश पूनिया समर्थक मंच भी उभरा। इन सब बातों से लगता है कि  अब भाजपा मंचों के जरिए राजनीति करेगी । हालांकि, पूनिया ने अपने नाम से बने मंच को खारिज कर दिया और इसे सोशल मीडिया की शरारत करार दिया।

लगभग एक दशक से भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व व वसुंधरा राजे के बीच कई बार विवाद देखने को मिला है। । हालांकि राज्य  में वसुंधरा राजे की जनता पर मजबूत पकड़ को देखते हुए वह राज्य में पार्टी के सर्वमान्य नेता बनी रहीं। बीते लोकसभा चुनाव से पहले भी केंद्रीय नेतृत्व ने मौजूदा केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहा था, लेकिन वसुंधरा राजे के पक्ष में न होने से उस पर अमल नहीं हो सका था। इसके बाद मदनलाल सैनी को अध्यक्ष बनाया गया। उनके निधन के बाद सतीश पूनिया को अध्यक्ष बनाया गया है। बीते साल राजस्थान में कांग्रेस में सचिन पायलट की बगावत के समय भी भाजपा दो खेमों में बंटी नजर आई थी।

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