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दोषियों की रिहाई के खिलाफ न्यायालय पहुंची बिलकिस बानो,दायर की पुनर्विचार याचिका

बिलकिस बानो ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान सामूहिक बलात्कार और हत्या के लिए उम्रकैद की सजा पाए 11 दोषियों की समय से पहले रिहाई के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

दरअसल,बिलकीस बानो ने 2002 के सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले में दोषियों को सजा में छूट देने तथा उन्हें रिहा किए जाने को चुनौती देते हुए 30 नवंबर को न्यायालय में एक याचिका दायर की है। जिसके बाद न्यायालय ने कहा कि वह मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर विचार करेगा।बिलकिस बानो ने न्यायालय के पहले दिए गए उस फैसले की समीक्षा की भी मांग की है, जिसमें गुजरात सरकार को दोषियों की सजा पर निर्णय लेने की अनुमति दी गई थी।चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने वकील शोभा गुप्ता की उन दलीलों पर गौर किया कि पीड़िता ने खुद दोषियों को सजा में छूट देने तथा उनकी रिहाई को चुनौती दी है तथा मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।चीफ जस्टिस ने कहा कि सजा में छूट के खिलाफ ऐसी ही अन्य याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली पीठ का हिस्सा रहे जस्टिस अजय रस्तोगी अब संविधान पीठ का हिस्सा हैं। चीफ जस्टिस ने कहा, ‘सबसे पहले पुनर्विचार याचिका की सुनवाई होगी। इसे जस्टिस रस्तोगी के समक्ष पेश करने दीजिए।बिलकीस बानो की ओर से पेश वकील शोभा गुप्ता ने चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ के समक्ष याचिका का उल्लेख किया।उन्होंने कहा कि क्या जस्टिस अजय रस्तोगी के नेतृत्व वाली पीठ मामले की सुनवाई कर पाएगी, क्योंकि वह अब एक संविधान पीठ की सुनवाई में है।चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि पुनर्विचार याचिका पहले सुननी होगी। इसे जस्टिस रस्तोगी के समक्ष आने दें। जब एडवोकेट गुप्ता ने कहा कि मामले को एक खुली अदालत में सुना जाना चाहिए तो चीफ जस्टिस ने कहा कि केवल अदालत ही इसका फैसला कर सकती है।

मई 2022 में, जस्टिस रस्तोगी की अगुवाई वाली एक पीठ ने फैसला सुनाया था कि गुजरात सरकार के पास छूट के अनुरोध पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र है क्योंकि अपराध गुजरात में हुआ था। गुजरात उच्च न्यायालय ने पहले माना कि महाराष्ट्र राज्य द्वारा छूट पर विचार किया जाना था, क्योंकि मामले को गुजरात से मुंबई ट्रांसफर करके ट्रायल चलाया गया था।बाद में 15 अगस्त 2022 को सभी ग्यारह दोषियों को रिहा कर दिया गया। रिहा किए गए दोषियों के वीरतापूर्ण स्वागत के दृश्य सोशल मीडिया में वायरल हो गए, जिससे कई लोगों में आक्रोश फैल गया। इस पृष्ठभूमि में, दोषियों को दी गई राहत पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर की गईं। माकपा नेता सुभाषिनी अली, पत्रकार रेवती लाल, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, पूर्व आईपीएस कार्यालय मीरा चड्ढा बोरवंकर और कुछ अन्य पूर्व सिविल सेवक, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन आदि कुछ याचिकाकर्ता थे।

याचिकाओं का जवाब देते हुए गुजरात सरकार ने न्यायालय को एक हलफनामे में बताया है कि यह फैसला दोषियों के अच्छे व्यवहार और उनके द्वारा 14 साल की सजा पूरी होने को देखते हुए केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद लिया गया है। राज्य के हलफनामे से पता चला कि सीबीआई और ट्रायल कोर्ट के पीठासीन न्यायाधीश ने इस आधार पर दोषियों की रिहाई पर आपत्ति जताई कि अपराध गंभीर और जघन्य है।राज्य के हलफनामे से पता चलता है कि दोषियों में से एक को 2020 में पैरोल पर बाहर रहने के दौरान एक महिला के यौन उत्पीड़न के लिए मामला दर्ज किया गया था। अब, खुद पीड़िता ने ही दोषियों को रिहा करने के फैसले पर सवाल उठाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। इससे पहले, जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रवि कुमार की पीठ ने कहा था कि वह मामले में दोषियों को सजा में छूट देने तथा उन्हें रिहा करने को चुनौती देने वाली महिला संगठन ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन विमेन’ की याचिका पर सुनवाई करेगी।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक,यह बताया गया था कि 11 दोषियों में से कुछ के खिलाफ पैरोल पर बाहर रहने के दौरान ‘महिला का शील भंग करने के आरोप’ में एक एफआईआर दर्ज हुई और दो शिकायतें भी पुलिस को मिली थीं। इन्ही गवाहों ने धमकी की भी आरोप लगाए थे। इसी बीच दोषियों में से एक राधेश्याम शाह ने सजा माफ़ी के खिलाफ याचिकाओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देते हुए इस याचिका को ‘अव्यवहार्य और राजनीति से प्रेरित’ बताया था। इतना ही नहीं राधेश्याम शाह पर इससे कुछ दिन पहले मामले के एक प्रमुख गवाह को धमकाने के भी आरोप लगे थे। मामले के प्रमुख गवाह इम्तियाज घांची ने इस संबंध में भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखते हुए जान के खतरे के मद्देनजर सुरक्षा की मांग की थी।

इस दौरान सबसे ज्यादा चर्चाओं का केंद्र तो वीडियो बना था जिसमे रिहाई के बाद  मिठाई खिलाकर और माला पहनाकर स्वागत किया गया था। इसे लेकर कार्यकर्ताओं ने आक्रोश जाहिर किया था। इसके अलावा सैकड़ों महिला कार्यकर्ताओं समेत 6,000 से अधिक लोगों ने न्यायालय  से दोषियों की सजा माफी का निर्णय रद्द करने की अपील की थी। गोधरा से भाजपा विधायक चंद्र सिंह राउलजी गुजरात सरकार की उस समिति के उन चार सदस्यों में से एक थे, जिसने बिलकिस बानो के साथ बलात्कार और उनकी तीन साल की बेटी सहित परिवार के सात सदस्यों की हत्या के दोषी 11 लोगों को रिहा करने का फैसला किया था। राउलजी ने बेहद विवादास्पद टिप्पणी के साथ इस फैसले का बचाव किया था।

एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा था कि 2002 के गुजरात दंगों के इस मामले के दोषियों में शामिल कुछ लोग ‘ब्राह्मण’ हैं, जिनके अच्छे ‘संस्कार’ हैं और यह संभव है कि उन्हें फंसाया गया हो। उन्होंने यह भी जोड़ा था कि हो सकता है कि वे बेगुनाह हों क्योंकि सांप्रदायिक स्थिति में एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के निर्दोष लोगों को फंसाने की कोशिश भी की जाती है। उन्होंने कहा था कि जेल में दोषियों का आचरण अच्छा था। राउलजी गोधरा से छह बार विधायक रह चुके हैं और इस बार भी भाजपा के टिकट पर गोधरा से ही चुनाव में उतरे हैं।केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी ने भी एक बयान में दोषियों के बचाव में कहा था ‘जो भी हुआ है, वह कानून के प्रावधानों के अनुसार हुआ है। किसी भी व्यक्ति के जेल में एक निश्चित समय काटने के बाद उन्हें रिहा करने का प्रावधान है। इस मामले में वही नियम, जो पूरी तरह कानून के हिसाब से है,अपनाया गया है।

गौरतलब है कि 27 फरवरी, 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में आग लगने की घटना में  59  कारसेवकों की मौत हो गई। इसके बाद पूरे गुजरात में दंगे भड़क गए थे। इस हिंसा से बचने के लिए बिलकिस बानो, जो उस समय पांच महीने की गर्भवती थी, अपनी बच्ची और परिवार के 15 अन्य लोगों के साथ अपने गांव से भाग गई थीं। तीन मार्च 2002 को वे दाहोद जिले की लिमखेड़ा तालुका में जहां वे सब छिपे थे, वहां 20-30 लोगों की भीड़ ने बिलकिस के परिवार पर हमला किया था। यहां बिलकीस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, जबकि उनकी बच्ची समेत परिवार के सात सदस्य मारे गए थे। बिलकिस द्वारा मामले को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में पहुंचने के बाद उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। जिसके बाद साल 2004 में आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था।इस मामले की सुनवाई अहमदाबाद में शुरू हुई थी, लेकिन बिलकीस बानो ने आशंका जताई थी कि गवाहों को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, साथ ही सीबीआई द्वारा एकत्र सबूतों से छेड़छाड़ हो सकती, जिसके बाद न्यायालय  ने अगस्त 2004 में मामले को मुंबई स्थानांतरित कर दिया था।

सीबीआई की विशेष अदालत ने  21 जनवरी 2008 को बिलकीस बानो से सामूहिक बलात्कार और उनके सात परिजनों की हत्या का दोषी पाते हुए 11 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके अलावा  भारतीय दंड संहिता के तहत एक गर्भवती महिला से बलात्कार की साजिश रचने, हत्या और गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने के आरोप में दोषी ठहराया गया था। हालांकि सीबीआई की विशेष अदालत ने सात अन्य आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी। इसके बाद 2018 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी व्यक्तियों की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सात लोगों को बरी करने के निर्णय को पलट दिया था। अप्रैल 2019 में उच्चतम न्यायालय ने गुजरात सरकार को बिलकीस बानो को 50 लाख रुपये का मुआवजा, सरकारी नौकरी और आवास देने का आदेश दिया था।

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