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बिहार: क्या पुलिस ने फ़र्ज़ी मामला बनाकर पत्रकार रूपेश को गिरफ़्तार किया?

झारखण्ड के रामगढ़ से नक्‍सली बताकर 6 जून को गिरफ्तार किए गए स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की रिहाई के लिए मुहीम तेज हो रही है।रूपेश कुमार सिंह भागलपुर के रहने वाले हैं,जो स्वतंत्र पत्रकार है। जिनको बिहार पुलिस ने 4 जून को  गिरफ्तार किया था। पिछले साल जून में उन्होंने ‘ झारखण्ड  के मजदूर नेताओं पर सत्ता का दमन’नाम से लंबी रिपोर्ट लिखकर सरकार से तीखे सवाल पूछे थे , तथा उन्होंने   झारखण्ड  के आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर आवाज़ उठाने की कोशिश की थी। उन्होंने मधुबन के डोली मजदूरों की समस्याओं के बारे में, मजदूरों की प्रिय ट्रेड यूनियन के बारे में, आदिवासियों की जमीन की कारपोरेट लूट के बारे में बहुत गहराई से लिखा। जिसके विरोध में तमाम दिग्गज नेताओं और सरकारी राजनैतिक शक्तियो का उन पर फ़साने का आरोप है।रूपेश कुमार सिंह की पत्नी ईप्सा ने संडे पोस्ट में जब हमसे बात की तो उन्होंने इस मामले में बताया कि रुपेश बहुत ही स्वदंशील वाले व्यक्ति है। उन्होंने हमेशा सच्चाई का साथ दिया है। वो तमाम मजदूर जो अपनी रोज मराज की जिंदगी से  परेशान है , उनकी मदद की हैं। ईप्सा ने आगे बताया कि रुपेश की गुम होने की रिपोर्ट उन्होंने थाने में दर्ज़ की थी , जिसके दो दिन बाद उनकी खबर आई थी कि उन्हें बिहार पुलिस ने विस्फोटक पदार्थ के साथ गिरफ्तार किया है।एक तरफ झारखण्ड पुलिस उन्हे समाज के मुख्य धारा से जुडे नागरिक के तौर पर खोज रही थी तो दूसरी तरफ बिहार पुलिस उनको हार्डकोर नक्सली बता कर गिरफ्तार किया। इससे यह तो साफ़ है कि इसमें किसी बड़े लोगों  का हाथ है।33 वर्षीय रूपेश कुमार सिंह बिहार के भागलपुर के रहने वाले हैं जो बिना किसी डर के सच को अपनी कलम से लिखते रहे हैं। जब इनकी  गिरफ्तारी की  तो  ईप्सा ने हमें बताया इनके बाल खिंच कर आंखों पर पट्टी लगा दी गई और हाथों को पीछे कर हथकड़ी भी लगाई , जिसका विरोध करने पर हथकड़ी खोल दी गई। बाद में आंखो की पट्टी भी हटा दी गयी। इन्हें फिर बाराचट्टी के कोबरा बटालियन के कैम्प में लाया गया। जहां रूपेश को बिलकुल भी सोने नहीं दिया गया और रात भर बुरी तरीके से मानसिक टार्चर किया गया। उन्हें धमकाया गया कि व्यवस्था या सरकार के खिलाफ लिखना छोड़ दें। रुपेश को खुद के एन्काउन्टर किए जाने की शंका भी हो रही थी। बातचीत की भाषा से रुपेश ने शंका जतायी है कि उनमे आंध्र प्रदेश आईबी के लोग भी थे।

 

 

 

उन्होंने उनसे कहा कि- “पढ़ें लिखे हो अच्छे आराम से कमाओ खाओ। ये आदिवासियों के लिए इतना क्यों परेशान रहते हो कभी कविता, कभी लेख। इससे आदिवासियों का माओवादियों का मनोबल बढ़ता है भाई क्या मिलेगा इससे जंगल,जमीन के बारे बड़े चिंतित रहते हो, इससे कुछ हासिल नहीं होना हैं, शादी शुदा हो परिवार है उनके बारे सोचो। सरकार ने कितनी अच्छी अच्छी योजनाएं लायी हैं उनके बारे में लिखो। आपसे हमारी  कोई दुश्मनी नहीं है, हम तुम्हें  छोड़ देंगे।फिलहाल रुपेश अब बिहार की गया सेंट्रल जेल में है। जिनकी ज़मानत के लिए उनकी पत्नी कोर्ट में अपील कर रही है जिसकी सुनवाई  दशहरा   के बाद होगी , उनके साथ उनके ड्राइवर आलम और एक रिश्तेदार भी इसमें शामिल है।आज सरकार व प्रशासन का दमन ऐसा रूप ले चुका है जहाँ पत्रकार, लेखक तथा तमाम न्यायपसंद लोग मुजरिम के रूप में कटघरे मे खड़े किये जा रहे हैं ।7 जून को उजागर हुआ रूपेश कुमार सिंह की फर्जी गिरफ्तारी का सच इसी बात से जुड़ा हुआ है कि वे एक न्याय पसंद इंसान है और हमेशा वे सच को लिखते आए हैं।

 

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