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संसद में अविश्वास प्रस्ताव को गिरना था, वह गिरा। सरकार को विपक्ष के इस तीर से एक खरोंच तक नहीं आनी थी। ऐसा ही हुआ। इस अविश्वास प्रस्ताव के जरिए अगले साल 2019 के लोकसभा चुनाव परिदृश्य की झलक मिलनी थी। वह भी हुआ। सब कुछ प्रत्याशित था। जो अप्रत्याशित था वह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का संसद के भीतर किसी चुनावी सभा-सा आक्रामक भाषण। राफेल डील पर रक्षामंत्री और प्रधानमंत्री पर सीधे अटैक। और अंत में प्रार्थना की तर्ज पर भाषण के बाद वजीर-ए-आजम नरेंद्र मोदी के गले जा लगना।

विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव ग्यारह घंटों की लंबी और गरमा-गरम बहस के उपरांत बुरी तरह गिर गया। मोदी सरकार ने सदन में शानदार ढंग से अपना बहुमत साबित कर दिया। प्रस्ताव के पक्ष में कुल 126 मत पड़े जबकि विपक्ष में 325 मत। बीजू जनता दल ने इस बहस में खुद को पूरी तरह अलग रखते हुए वाक आऊट किया। बहुमत के लिए 268 सांसदों की जरूरत थी। भाजपा के स्पीकर सुमित्रा महाजन समेत कुल 274 सांसद हैं।

भाजपा को रामविलास पासवान की लोजपा के छह सांसदों और शिरोमणि अकाली दल के चार सदस्यों का समर्थन हासिल है। एनडीए सरकार में शामिल शिवसेना के 18 सांसद हैं। मगर उसने संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान भाजपा का विरोध किया। चौतीस सांसदों वाली तृणमूल कांग्रेस और सपा ने प्रस्ताव का समर्थन किया।

जो होना था संसद में वह हो गया। अब उसकी परीक्षाएं हो रही हैं और संकेत निकाले जा रहे हैं। राहुल की आक्रमकता ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ-साथ अपने समर्थकों में भी उत्साह का संचार किया है। देश की जनता उनके उस भाषण से कितना प्रभावित हुई और कितनी गंभीरता से लिया, यह बाद की बात है। मई 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान पता भी चल जाएगा। लेकिन जिस तरह से संसद में अपने भाषण की समाप्ति पर उन्होंने टपोरों की तरह आंख मारी उसने उनके सारे किये कराए पर पानी फेर दिया। विपक्ष ने उनके इस आचरण को मुद्दा बना दिया। खुद कांग्रेसयों को भी लगा कि राहुल के इस आचरण से विपक्ष पर आक्रमण बहुत भोथरा पड़ गया। राहुल ने अंततः साबित कर दिया कि वह अब भी बड़े नहीं हो पाए हैं। पप्पू ही हैं। उनकी इस पप्पू वाली इमेज की देन है कि मोदी अपने तमाम वादाखिलाफी और नक्कारेपन के बावजूद मजबूत बने हुए हैं।

संसद में राहुल के आरोपों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खूब दहाड़ा। जिस तरह राहुल ने अपनी पूरी बात मोदी को केंद्र करके कही उसी तरह सरकारी योजनाओं का उल्लेख छोड़ दें तो मोदी ने राहुल के हर उछाले गए मुद्दे का माकूल जवाब दिया। मोदी ने विपक्ष के आरोप को खारिज करते हुए और उन पर हमला करने के साथ अपनी सरकार के उल्लेखनीय कार्यों को रेखांकित भी किया। उन्हें संसद से दिए भाषण के मार्फत जनता तक पहुंचाने का काम किया। विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर बहस और मतदान सरकार की रजामंदी की अहम वजह भी यही थी।

बहस के दौरान टीडीपी, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना भी केंद्र में रहा। गृह मंत्री राजनाथ सिंह और खुद नरेंद्र मोदी ने उसे विशेष तवज्जो दी। वर्ष 2014 में दो हिस्सों तेलंगाना और आंध प्रदेश में बांटे गए राज्य को विशेष दर्जा न दिए जाने की वजह से आंध्र प्रदेश की नाराजगी है। टीडीपी चाहती है कि वो विशेष दर्जा न मिल पाने के खिलाफ जारी संघर्ष में आगे दिखाई दे।

बहस के दौरान बीजू जनता दल के सदस्यों का वॉक आऊट करना हैरतनाक था। जबकि विपक्ष की बैठक में सरकार के खिलाफ खड़े होने का पार्टी ने भरोसा दिया था। भाजपा-कांग्रेस से समान दूरी बनाकर चलने की बीजू जनता दल की नीति की अलग -अलग ढंग से व्याख्या की जा रही है। अब तो यह भी चर्चा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तरह क्या भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को तोड़ पायेंगे। पिछले साल जब सोनिया गांधी ने विपक्षी दलां को डिनर पर बुलाया था तब भी बीजू जनता दल नहीं शरीक हुआ था। बहरहाल मोदी शाह की सांसें राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में अटकी हुई हैं। अगर इनमें पार्टी को शिकस्त मिलती है तो उसका प्रभाव आगामी लोकसभा चुनाव में पड़ना तय है। राजस्थान में महारानी वसुंधरा राजे से जनता नाराज है मगर वहां महारानी भजापा की मजबूरी भी हैं। भाजपा ने उनको अगले चुनाव के लिए मुख्यमंत्री का दावेदार घोषित कर दिया है। यह पार्टी के लिए आत्मघाती कदम है।

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