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प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो .यशपाल ने एक कहा था, ‘ज्ञान बस्ते के बोझ से नहीं शिक्षा देने के तरीके पर निर्भर करता है।’ सन् 2000 से पहले ही उनकी अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई थी। उनकी समिति ने तभी बच्चों के स्कूली बोझ को कम करने की सिफारिश की थी। अब तक की सरकारें इसे लागू नहीं की। सरकार की अब नींद खुली है। इस पर फैसला लेते हुए सरकार ने क्लास एक से दस तक के बच्चों के स्कूली बैग का वजन तय कर दी है। केंद्र ने सभी राज्यों और केंद्र शामित राज्यों को भी सर्कुलर जारी कर दिया है। यह आदेश भी पूरे देश में लागू होता है या इसका हश्र भी प्रो  यशपाल समिति की सिफारिश वाला हाल होता है, वह देखना होगा।
स्कूली बच्चों के भारी भरकम बैग को हल्का करने की बात लंबे समय से चल रहा है। इस पर सवाल भी उठता रहा है। स्कूल बैग का वजन कम करने के लिए नियम पहले से ही बने हुए हैं। पर वे लागू नहीं हो पाए। 1993 में यशपाल कमिटी ने प्रस्ताव रखा था कि पाठ्य पुस्तकों को स्कूल की संपत्ति समझा जाए और बच्चों को अपनी किताबें क्लास में ही रखने के लिए लाॅकर्स अलाॅट किए जाएं। वर्ष 2005 में नैशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (एनसीएफ) ने एक सर्कुलर जारी किया, जिसमें बच्चों के शारीरिक और मानसिक दबाव को कम करने के सुझाव दिए गए थे। इसके आधार पर एनसीईआरटी ने नए पाठ्यक्रम और पुस्तकें तैयार कीं, जिसे सीबीएसई से संबद्ध कई स्कूलों ने अपनाया। इसके बावजूद स्कूली बैग का वजन जो स्कूल बैग का वजन कम करने को लेकर नियम पहले से ही बने हुए हैं पर वे लागू नहीं हो पाए। गौरतलब है कि 1993 में यशपाल कमिटी ने प्रस्ताव रखा था कि पाठ्य पुस्तकों को स्कूल की संपत्ति समझा जाए और बच्चों को अपनी किताबें क्लास में ही रखने के लिए लाॅकर्स अलाॅट किए जाएं। वर्ष 2005 में नैशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (एनसीएफ) ने एक सर्कुलर जारी किया जिसमें बच्चों के शारीरिक और मानसिक दबाव को कम करने के सुझाव दिए गए थे। इसके आधार पर एनसीईआरटी ने नए पाठ्यक्रम और पुस्तकें तैयार कीं, जिसे सीबीएसई से संबद्ध कई स्कूलों ने अपनाया। लेकिन स्कूल बैग का वजन नियमतः कम नहीं हुआ था।
उसके बाद चिल्ड्रन्स स्कूल बैग एक्ट, 2006 के तहत कहा गया कि बच्चों के स्कूल बैग का वजन उनके शरीर के कुल वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। इन सब उपायों के बावजूद आज भी ज्यादातर स्कूली बच्चों को भारी बोझा अपनी पीठ पर ढोना पड़ता है। स्कूल चाहे सरकारी हो या प्राइवेट, हकीकत यही है कि जिस स्कूल का बस्ता जितना ज्यादा भारी होता है और जहां जितना ज्यादा होमवर्क दिया जाता है, उसे उतना ही अच्छा स्कूल माना जाता है। पैरेंट्स की भी यही सोच बनी हुई है। स्कूल बैग का वजन कम करने को लेकर नियम पहले से ही बने हुए हैं पर लागू नहीं हुए। इस बार केंद्र सरकार ने इसे लागू किया है। इसलिए कुछ उम्मीदें बनीं हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने फस्र्ट से टेंथ क्लास तक के लिए बच्चों के स्कूल बैग के वजन को निर्धारित किया है। बच्चों के होमवर्क को लेकर भी नियम बनाया गया है।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 26 नवंबर को एक सर्कुलर जारी करते हुए स्कूल बैग के वजन एवं पाठ्यक्रम को लेकर स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित राज्यों को कहा है कि अब बच्चों के बैग का वजन वही होगा जो मिनिस्ट्री की ओर से तय किया जाएगा। गाइडलाइन में कक्षाओं के मुताबिक बच्चों के स्कूल बैग का वजन निर्धारित कर दिया गया है। गौरतलब है कि स्कूली बस्तों के भारी भरकम वजन की वजह से बच्चों की कमर पर बुरा असर पड़ रहा था। बच्चों की सेहत के मद्देनजर सरकार ने नई गाइडलाइन जारी कर है।
होमवर्क पर एमएचआरडी ने दिए हैं कि निर्देश पहली और दूसरी क्लास में पढ़ने वाले बच्चों को होमवर्क नहीं दिया जाएगा। कक्षा एक और दो में भाषा, गणित, क्लास तीन से पांच में भाषा, गणित एवं पर्यावरण विज्ञान विषय होंगे। स्कूल संचालक अन्य विषय नहीं लगा सकेंगे। पाठ्यक्रम एनसीईआरटी के अनुरूप होगा। स्टूडेंट्स पर अतिरिक्त बुक, पाठ्य सामग्री लाने का दबाव नहीं बनाएंगे, ताकि बस्ते का वजन न बढ़े।
इन निर्देशों में पहली और दूसरी के बच्चों के लिए बस्ते का वजन डेढ़ किलो और तीसरी से पांचवीं तक के बच्चों के लिए दो से तीन किलो निर्धारित किया गया है। सरकार का यह आदेश प्राइमरी शिक्षा में निश्चय ही यह एक बड़ा सुधार है, बशर्ते यह लागू हो जाए। शरीर विज्ञानी चेतावनी दे चुके हैं कि भारी बस्ता बच्चों की हड्डियों में विकृति पैदा करता है और बड़े होने पर वे गंभीर बीमारियों के शिकार हो सकते हैं। शिक्षा शास्त्री बताते हैं कि 4 से 12 साल तक की उम्र बच्चे के व्यक्तित्व के विकास की उम्र होती है, इसलिए इस दौरान रटंत पढ़ाई का बोझ डालने के बजाय सारा जोर उसकी रचनात्मकता को विकसित करने पर होना चाहिए। उम्मीद तो यही की जा रही है कि राज्य सरकारें उसके निर्देशों की रोशनी में नियम बनाएंगी। पब्लिक स्कूलों के संचालकों, शिक्षकों और उन अभिभावकों को भी इन नियमों को मन से स्वीकार करना होगा, जो बच्चों को अधिक से अधिक पाठ रटा देने को ही क्वालिटी एजुकेशन मान बैठे हैं।
एसोचैम के एक सर्वे के अनुसार, बस्ते के बढ़ते बोझ के कारण बच्चों को नन्हीं उम्र में ही पीठ दर्द जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है। इसका हड्डियों और शरीर के विकास पर भी विपरीत असर होने का अंदेशा जाहिर किया गया है। एक स्टडी के मुताबिक बच्चे अपने वजन का 20-25 प्रतिशत वजन उठा रहे हैं। इस सर्वेक्षण के मुताबिक स्कूल जाने वाले करीब 68 प्रतिशत बच्चे, जिसमें विशेष तौर पर देखा जाए तो 7 से 13 वर्ष के करीब 88 फीसदी बच्चे पीठ दर्द या उससे जुड़ी समस्या का शिकार हो रहे हैं। यह सर्वे अहमदाबाद, दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, बैंगलूरु, मुंबई, हैदराबाद, पुणे, लखनऊ, जयपुर और देहरादून में किया गया, जिसमें 25,00 छात्रों और 1,000 अभिभावकों से बातचीत की गई थी।
बैग पर ज्यादा भाड़ से होने वाली समस्या स्पाॅन्डलाइटिस की प्राॅब्लमः बच्चे के वजनदार बैग उठाने से भविष्य में उनको स्पाॅन्डलाइटिस और स्काॅलियोसिस की समस्या हो सकती है।
हाथों में झुनझुनी आनाः वजनदार बैग से हाथों में झुनझुनी और कमजोरी आने लगती है। इससे बच्चों की नसें भी कमजोर हो जाती हैं।
फेफड़ों पर दबावः वजनदार बैग से बच्चों के फेफड़ों पर दबाव पड़ने लगता है। साथ ही उनकी सांस लेने की क्षमता कम हो जाती है। यह बेहद खतरनाक हो सकता है।
लोअर बैक प्राॅब्लमः बैग का भार बढ़ने से लोअर बैक झुक और टेढ़ी हो सकती है। इससे बच्चे आगे झुककर चलने लगते हैं। उनके पाॅस्चर में चेंज हो जाता है।
वन साइड पेनः आजकल बच्चों में एक कंधे पर बैग को टांगे रखने का फैशन है। एक कंधे पर बैग टांगे रहने से वन साइडेड पेन शुरू हो जाता है।
कंधों पर असरः वजनदार बैग से बच्चों के कंधों पर बुरा असर पड़ता है। दर्द शुरू हो सकता है।
बच्चों में तनावः मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इससे बच्चों पर मानसिक प्रभाव पड़ता है। भारी बैग उठाने से बच्चें तनाव में रहते हैं।
नालंदा पब्लिक स्कूल के निदेशक डीपी वत्स से हुई बातचीत के मुख्य अंश
प्र :केंद्र सरकार ने बच्चों के बैग का वजन तय कर दिया है। इस पर आपकी क्या राय है?
उ : केंद्र सरकार का निर्णय अच्छा है। बच्चों के कंधों पर कम वजन ही होना चाहिए। इससे बच्चों में शारीरिक विकास बेहतर होता है। बच्चें स्कूल फ्रेंस मूड में आते हैं। वे थके हुए नहीं होते हैं। इससे क्लास की पढ़ाई वे बेहतर ढंग से ग्रहण करते हैं।
प्र : जब सरकार का निर्णय बेहतर है तो फिर आपके स्कूल के बच्चों का बैग भारी क्यों है?
उ : हमारे स्कूल में ऐसा नहीं है। नालंदा पब्लिक स्कूल का टाइम टेबल इस प्रकार से डिजाइन किया गया है ताकि बच्चों को डेली तीन बुक से ज्यादा नहीं लाना पड़े। जिस दिन जो सबजैक्ट होता है, उस दिन सिर्फ उसी सबजैक्ट की बुक लाना होता है। हमने स्कूल का नोटबुक भी छोटा रखा है। ताकि बच्चों के बैग का वजन कम न हो।
प्र : यह भी तो है कि केजी और पहली, दूसरी क्लास में भी 10 से ज्यादा बुक पढ़ाई जा रही है?
उ : आप जिस क्लास की बात कर रहे हैं, उन क्लासों में 10 बुक तो नहीं है। लेकिन सरकार ने जो तीन विषय तय किए हैं, उससे ज्यादा जरूर है। इसका कारण यह है। आप खुद मानेंगे कि आज कंपिटिशन बहुत बढ़ गया है। तकनीक ने जिस तरह से छोटे-छोटे बच्चों को प्रभावित किया है। उससे बच्चें छोटी उम्र में ही बहुत कुछ जान जा रहा है। इसलिए यदि सेकैण्ड क्लास के बच्चों को कंप्यूटर नहीं पढ़ाया जाएगा तो वे अपने को पीछे समझने लगेंगे। कंपिटिशन भी देश से नहीं विदेशी बच्चों से होने लगा है। इसके अलावा यदि आप इन क्लासों में सिर्फ हिन्दी, अंग्रेजी और मैथ्स पढ़ाएंगे तो पैरेंट्स ही कहने लगते हैं कि स्कूल अच्छा नहीं है। स्कूलों पर पैरेंट्स का भी दबाव रहता है। फिर भी केंद्र सरकार के निर्देश के बाद राज्य सरकार से जो हमें निर्देश मिलेंगे, उस पर हमारा प्रबंधन विचार कर निर्णय लेगा।

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