• जीवन सिंह टनवाल
महाराष्ट्र में भाजपा ने सरकार बनाने में जो जल्दबाजी दिखाई वह उसके लिए हर तरह से महंगी पड़ी है। शरद पवार ने साबित किया कि राज्य की राजनीति के असली चाण्क्य वे ही हैं
भा रतीय जनता पार्टी ने शिवसेना को सबक सिखाने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता अजित पवार के साथ सरकार तो बनाई, लेकिन पार्टी का यह दांव उसके लिए एकदम उल्टा साबित हुआ। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने दिखा दिया कि राज्य की राजनीति के असली चाणक्य वास्तव में वे ही हैं। भाजपा के रातों-रात सरकार बनाने पर उन्होंने चेताया भी कि ‘ये गोवा, कर्नाटक और मणिपुर नहीं, बल्कि महाराष्ट्र है।’ हालांकि तब राजनीतिक विश्लेषकों ने शरद पवार की इस बात को गंभीरता से नहीं लिया, बल्कि कई तो यह मानकर चल रहे थे कि अंदर खाने चाचा- भतीजा (शरद- अजित) की मिलीभगत है कि भाजपा की सरकार बनाई जाए। शरद सिर्फ बाहरी दिखावा कर रहे हैं कि भतीजा अजित दोषी है,  जबकि खुद प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात कर वे भाजपा की सरकार बनाने की बात कर आए हैं। एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस की संयुक्त प्रेस काॅन्फ्रेंस को भी लोग हल्के में ले रहे थे कि यह सिर्फ दिखावा है। भाजपा ने सरकार बनानी थी तो अपने मन की कर ही ली है। सरकार गठन के बाद जिस तरह भ्रष्टाचार के मामलों में अजित पवार को क्लीन चिट मिली उससे भी यह बात मजबूती से मानी जाने लगी है कि भाजपा और अजित पवार की जुगलबंदी से पांच  साल सरकार चलेगी। लेकिन हुआ तमाम विश्लेषणों से हटकर।
शरद पवार ने भाजपा  को ऐसी राजनीतिक पटकनी दी है कि वह आह! तक नहीं कर पा रही है। शिवसेना का ही सीएम बनाकर एनसीपी और कांग्रेस ने यह भी संदेश दिया है कि इस देश में भाजपा को सत्ता से दूर करने का समय शुरू हो चुका है। कभी गैर कांग्रेसवाद का जो नारा दिया जाता था वह अब गैर भाजपावाद में तब्दील हो चुका है। महाराष्ट्र की महाभारत में 34 दिन तक चले महासंग्राम से भाजपा की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेन गठबंधन ने साफ संकेत दिया है कि गोवा, मणिपुर, कर्नाटक और हरियाणा में सत्तासीन होने के लिए भाजपा ने जो चालें चली हैं, वे अब ज्यादा नहीं चल पाएंगी। महाराष्ट्र से गठबंधन का ऐसा नया प्रयोग शुरू हो चुका है जो आने वाले दिनों में भाजपा को देश से उखाड़ फेंकने का मार्ग प्रशस्त करेगा। देश के सबसे धनी राज्य पर शासन करने की कोशिश में भाजपा की छवि को भारी नुक्सान हुआ है। इससे पहले भाजपा गोवा, मणिपुर और हरियाणा में अपनी ऐसी कोशिशों में पास तो हो गई थी। लेकिन महाराष्ट्र में फेल हो गई। मोदी और शाह की अगुवाई में भाजपा ने कभी भी मौका आने पर सत्ता पाने की कोशिश करने में संकोच नहीं दिखाया। उन्होंने 2017 में सीटों के लिहाज से कांग्रेस से पीछे रहने के बावजूद छोटे दलों के साथ मिलकर गोवा में सरकार बनाई थी। भाजपा बड़ी पार्टी होने के बावजूद पहली बार कर्नाटक में सरकार बनाने में सफल नहीं हुई थी। हालांकि बाद में जोड़- तोडकर भाजपा ने कर्नाटक में सरकार बनाई। इसमें कांग्रेस और जद (एस) सरकार जल्द ही गिर गई, क्योंकि दोनों दलों के कई विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और सरकार अल्पमत में आ गई। बाद में ये सभी विधायक भाजपा में शामिल हो गए। येदियुरप्पा ने फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और अब अगले महीने होने वाले उपचुनाव में उनके भाग्य का फैसला होना है।
महाराष्ट्र में भाजपा नेता फडणवीस ने जिस दिन जल्दबाजी भरे एक समारोह में शपथ ली, उसके तुरंत बाद राकांपा के ज्यादातर विधायकों ने पार्टी अध्यक्ष शरद पवार के नेतृत्व में ही भरोसा जता दिया। ऐसे में फडणवीस के बहुमत साबित करने की उम्मीद धूमिल होने लगी। उच्चतम न्यायालय ने  जब आदेश दिया कि फडणवीस सरकार एक दिन के भीतर बहुमत साबित करे, तो बाकी बची उम्मीद भी खत्म हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ महाराष्ट्र में पार्टी के पास बचे विकल्पों पर विचार किया। इसके कुछ घंटों बाद फडणवीस ने इस्तीफा दे दिया। भाजपा का मानना था कि अजित पवार के पाला बदलने और उनके उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से वह 288 सदस्यों वाली विधानसभा में सामान्य बहुमत का आंकड़ा जुटा लेगी। अजित पवार पद से हटाए जाने तक राकांपा के विधायक दल के नेता थे। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि देश के सबसे धनी राज्य पर शासन करने की
कोशिश में भाजपा की छवि को जो नुकसान हुआ है, उससे इनकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि भाजपा नेता कहते हैं कि शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस के बीच वैचारिक विरोधाभास और जमीन स्तर पर प्रतिस्पर्धा के चलते ये गठबंधन टिकाऊ नहीं होगा और इसलिए उन्हें एक बार फिर महाराष्ट्र की सत्ता में वापसी की उम्मीद है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि गठबंधन में शामिल तीनों दल महाराष्ट्र से भाजपा को बेदखल करने का मन बना चुके हैं।
अजित पर अब भी लटक रही तलवार
म हाराष्ट्र की राजनीतिक महाभारत में अजित पवार ऐसे नेता रहे जिन्होंने देश भर के राजनीतिक विश्लेषकों और आम लोगों का ध्यान अपनी ओर केंद्रित रखा। अजित न सिर्फ रातों-रात भाजपा की सरकार बनाने के लिए चर्चाओं में रहे, बल्कि हर जगह उनके भ्रष्ट कारनामों को लेकर भी कटाक्ष होते रहे कि सत्ता का जादू होता ही कुछ ऐसा है कि एक मिनट में सारे पाप धुल  जाते हैं। अजित पवार  के भाजपा को समर्थन देने और उपमुख्यमंत्री बनने के साथ ही भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एनसीबी) ने सिंचाई घोटाले से जुड़े उन मामलों को बंद कर दिया जिन्हें लेकर भाजपा महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में लगातार उनकी घेराबंदी कर रही थी।
भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने 2013 में दर्ज 71,000 करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले से जुड़े नौ मामले बंद कर दिए। हालांकि एसीबी का कहना है कि जो नौ केस बंद किए गए हैं, उनका अजित पवार से कोई संबंध नहीं है। इनमें से कुछ मामले विदर्भ सिंचाई विकास निगम (वीआईडीसी) से जुड़े हैं, तब अजित पवार उसके अध्यक्ष थे। एसीबी की इस सफाई के बावजूद इन मामलों के बंद होने से लोगों के कान खड़े हो गए। हर जगह चर्चाएं होने लगी कि पद पाकर अजित के बुरे गृह टल गए। लेकिन एसीबी की बात से ऐसा लगता है कि अजित पर आगे भी शिकंजा कस सकता है। ऐसा एकदम नहीं कहा जा सकता कि उनके ऊपर लटकी तलवार म्यान में बंद हो गई है। 2014 के विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव से पहले इन मामलों को भाजपा ने अपनी चुनावी रैलियों में खूब भुनाया था। तब स्वयं देवेंद्र फड़ण्वीस यह कहते घूम रहे थे कि भाजपा सत्ता में आई तो अजित पवार जेल में चक्की पीसेंगे। लेकिन जब फडण्वीस के साथ ही अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ तो ली शपथ ग्रहण के तीसरे दिन ही ये मामले बंद कर दिए गए।
एसीबी अधिकारी परमवीर सिंह के अनुसार सिंचाई से जुड़ी शिकायतों के मामले में करीब 3000 निविदाओं की जांच जारी है। ये नियमित जांच है, जो बंद हुई है। बाकी मामलों में हमारी जांच अब भी जारी है।गौरतलब है कि महाराष्ट्र में 1999 से 2009 के बीच कथित तौर पर 70 हजार करोड़ रुपये का सिंचाई घोटाला हुआ था। इस कथित सिंचाई घोटाले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने नवंबर 2018 में अजित पवार को जिम्मेदार ठहराया था। महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने बंबई उच्च न्यायालय को बताया था कि करोड़ों रुपये के कथित सिंचाई घोटाले मामले में अजित तथा अन्य सरकारी अधिकारियों की ओर से भारी चूक की बात सामने आई है। यह घोटाला करीब 70,000 करोड़ रुपए का है, जो कांग्रेस- एनसीपी के शासन के दौरान अनेक सिंचाई परियोजनाओं को मंजूरी देने और उन्हें शुरू करने में कथित भ्रष्टाचार तथा अनियमितताओं से जुड़ा हुआ है।
 अजित पवार पर कुल 95,000 करोड़ के भ्रष्टाचार का आरोप है। सिंचाई विभाग घोटाला मामले में उनसे पूछताछ होती रही  है।  हाल ही में मुंबई पुलिस की अपराध शाखा ने 25000 करोड़ के गबन का मामला दर्ज किया था,इसमें 70 लोग आरोपी बनाए गए जिनमें से एक अजित पवार भी थे। ऐसे में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की आंच में झुलस रहे अजित पवार बीजेपी का हाथ पकड़ अपने पाप धोकर निकल लिए। अजित पवार का नाम महाराष्ट्र स्टेट काॅपरेटिव बैंक से जुड़े 25 हजार करोड़ रुपये के घोटाले में भी खूब उछाला है। विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने इसे जोरदार ढंग से मुद्दा बनाया था।

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