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सपा से दूर जाते आजम

उत्तर प्रदेश की सत्ता पाने के करीब पहुंचते नजर आ रहे अखिलेश यादव के लिए दस मार्च को आए चुनाव नतीजे सुखद नहीं रहे। भाजपा स्पष्ट बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में काबिज हो चुकी है तो दूसरी तरफ सपा सुप्रीमो की दिक्कतें तेजी से बढ़ने लगी है। चुनाव नतीजों बाद पहले तो सपा के टिकट पर चुनाव लड़े प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष शिवपाल यादव ने बागी सुर अपना अखिलेश संग अलगाव का इशारा किया, अब सपा के मजबूत स्तंभ कहलाए जाने वाले मोहम्मद आज़म खान ने भी बागी तेवर अपना लिए हैं

‘हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष को हमारे कपड़ों से बदबू आती है। जेल में बंद आज़म खान के जेल से बाहर न आने की वजह से हम लोग सियासी रूप से यतीम हो गए हैं। हम कहां जाएंगे, किससे कहेंगे और किसको अपना गम बताएं? हमारे साथ तो वो समाजवादी पार्टी भी नहीं है, जिसके लिए हमने अपने खून का एक-एक कतरा बहा दिया। क्या सारा ठेका अब्दुल ने ले लिया है? वोट भी अब्दुल देगा और जेल अब्दुल जाएगा? अब्दुल बर्बाद हो जाएगा। घर की कुर्की हो जाएगी। ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री योगी का बयान सही था कि अखिलेश नहीं चाहते कि आज़म खान बाहर आएं। आज़म खान ने अखिलेश यादव और उनके पिता का समाजवादी पार्टी बनने और मुख्यमंत्री बनने तक हर कदम पर साथ दिया। अखिलेश यादव जी हमारा सलूक आपके साथ ये था कि जब 1989 में आपके वालिद साहब को कोई सीएम बनाने को तैयार नहीं था, तब आज़म खान ने कहा था कि मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री बनाओ। हमारा कुसूर ये था कि आपके वालिद मुलायम सिंह को ‘राफीकुक मुल्क’ का खिताब दिया था। कन्नौज में जब आप चुनाव लड़े तो आज़म खान ने कहा था कि टीपू को सुल्तान बना दो और जनता ने आपको सुल्तान बना दिया। आज़म खान ने अखिलेश की बात को मानकर अपनी जिंदगी के साथ बड़ा रिस्क लिया और नतीजा यह हुआ कि उनकी जान पर बन आई। आपने कहा कि मैं कोरोना का टीका नहीं लगवाऊंगा तो आज़म खान ने जेल में कोरोना का टीका नहीं लगवाया। नतीजा ये हुआ कि वो मौत के मुंह में जाते-जाते बचे।’

यह पहला मौका था, जब आज़म खान के खेमे की ओर से इस तरह समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ कुछ कहा गया है। आज़म खान के मीडिया प्रभारी फसाहत अली खान शानू ने यह कहकर अपना और आज़म खान का बगावती रुख दर्शा दिया है। फसाहत अली खान शानू के बारे में कहा जाता है कि वह वही बोलते हैं जो आज़म खान स्क्रिप्ट लिखकर देते हैं। ऐसे समय में जब रमजान का महीना चल रहा है, इस दौरान पार्टी की मीटिंग तक नहीं होती थी, तब यूपी के रामपुर स्थित समाजवादी पार्टी के कार्यालय में 10 अप्रैल को आज़म के मीडिया प्रभारी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस करना और अखिलेश यादव पर वार करना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है। आज़म के मीडिया प्रभारी के साथ ही संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने भी पार्टी द्वारा मुस्लिमों के हित में काम नहीं करने का आरोप लगाकर मामले को चर्चा का विषय बना दिया है। ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज़म के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी खासकर अखिलेश के खिलाफ मोर्चाबंदी की खबरें तैर रही है। आज़म खान के नए राजनीतिक कदम को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं। इसके बाद से ही कयास लग रहे हैं कि वे अपने समर्थकों समेत सपा छोड़ सकते हैं। उनके द्वारा एक अलग पार्टी बनाने की भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

एक तरफ शिवपाल यादव के भाजपा में जाने की अटकलें लग रही हैं और वह सपा की मीटिंग में न बुलाए जाने को लेकर नाराज हैं तो वहीं दूसरी तरफ आज़म खान का खेमा भी अखिलेश यादव से नाराज बताया जा रहा है। आज़म खान के समर्थकों में नाराजगी के यह भाव तब से ज्यादा आए है जब से आज़म सांसद रहते रामपुर से विधायक का चुनाव जीते हैं। आज़म ने लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दिया तो उनके समर्थकों में एक चर्चा शुरू हुई कि ऐसा उन्होंने विधानसभा में विपक्ष का नेता बनने के लिए किया है। लेकिन उन्हें तब झटका लगा जब अखिलेश यादव की तरफ से आज़म खान के लिए ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया और वह खुद ही इस महत्वपूर्ण पद पर काबिज हो गए। गौरतलब है कि आज़म लंबे समय से कई मामलों में जेल में बंद हैं। वह इस वक्त सीतापुर जेल में हैं। उन पर योगी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान कुल 87 मामले दर्ज हुए थे। जिनमें 86 मामलों में उनको जमानत मिल चुकी है। जबकि एक मामला अभी ऐसा है जिसमें उनकी जमानत होनी बाकी है।

योगी सरकार ने जब आज़म खान को जेल भेजा तो उनके समर्थकों ने कहा कि अखिलेश यादव ने जिस तरह से उनका साथ देना चाहिए था, नहीं दिया। बताया जाता है कि इसके पीछे अखिलेश यादव की रणनीति यह रही कि वह आज़म खान के मसले को लेकर ज्यादा आक्रामक न दिखे। क्योंकि ऐसा करने पर भाजपा उन पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा सकती है। उनकी इस रणनीति का फायदा गत विधानसभा चुनाव में तो नहीं मिला, लेकिन हार के बाद इसका उन्हें नुकसान जरूर उठाना पड़ रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज़म खान को एक कद्दावर मुस्लिम नेता माना जाता रहा है। यहां के रामपुर, बरेली, मुरादाबाद, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, शाहजहांपुर, पीलीभीत, बदायूं, रुहेलखंड और तराई में मुस्लिमों मतदाताओं के बीच उनकी काफी पकड़ रही है। माना जाता है कि पश्चिम में आज़म की वजह से पूरे इलाके में समाजवादी पार्टी को 2012 के विधानसभा में बेहतरीन सफलता मिली थी। आज़म खान सपा के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरा रहे हैं और मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी नेताओं में गिने जाते थे। 1977 में जनता पार्टी से पहली बार रामपुर से लोकसभा से चुनाव लड़ने और हारने के बाद आज़म खान 1985 में मुलायम सिंह यादव से जुड़े। उसके बाद से वह लगातार उनके साथ रहे हैं। वह वर्ष 1980 से ही रामपुर सीट से लगातर जीत दर्ज कराते रहे हैं। उन्हें सिर्फ एक बार 1996 में कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। आज़म खान गत विधानसभा चुनावों में रामपुर से दसवीं बार विधायक चुने गए हैं। विषम परिस्थितियों में भी मुलायम के पीछे चट्टान की तरह खड़े रहने वाले खान ने एक विश्वस्त सहयोगी के तौर पर अपनी पहचान बनाई। उत्तर प्रदेश में अकेले दम पर सपा सरकार बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन अब उनके समर्थक आज़म के साथ अखिलेश यादव के रवैये के चलते नाराज हैं। कभी मुस्लिमों में फायरब्रांड नेता की छवि रखने वाले आज़म खान की भी फिलहाल अखिलेश यादव के साथ अच्छी नहीं पट रही है। जब से सपा के सिरमौर अखिलेश यादव हुए है और मुलायम सिंह यादव बीते दिनों की बात हो चली है तब से आज़म खान राजनीतिक हाशिए पर पंहुचा दिए गए है।

आज़म खान के बारे में कहा जाता है कि वह पार्टी का वो चेहरा हैं जो लगातार सपा को मजबूत करते रहे हैं। सपा के लिए आज़म खान का बहुत ज्यादा महत्व है। वह सपा के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। समाजवादी पार्टी के ‘एमवाई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण में एम यानी मुस्लिम वोटरों का सपा के प्रति झुकाव में सबसे बड़ी भूमिका उत्तर प्रदेश में आज़म खान की रही है। मुलायम सिंह यादव इस बात को मानते भी थे और तब तक उनका पार्टी पर आधिपत्य रहा तब तक आज़म खान को उस तरह की तवज्जो दी भी जाती रही है। चाहे वह मुलायम के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल हो या फिर 2012 से 2017 तक का अखिलेश शासन, आज़म खान को पार्टी का थिंक टैंक का दर्जा दिया जाता रहा है। तब समाजवादी पार्टी की सरकार को ढाई लोगां की सरकार भी कहा जाता था। जिनमें एक शिवपाल सिंह यादव तो दूसरे आज़म खान सरकार तो आधा अखिलेश को कहा जाता था। हालांकि समाजवादी पार्टी आज़म खान को एक बार 6 साल के लिए निष्कासित भी कर चुकी है। मई 2009 में उन्हें पार्टी से निकाला गया था। लेकिन डेढ़ साल बाद ही दिसंबर 2010 में उनका निष्कासन वापस ले लिया गया और वे दोबारा पार्टी का हिस्सा बन गए। तब मुलायम आज़म को मनाने के लिए रामपुर आए थे। वर्ष 2009 के चुनाव में अमर सिंह के कहने पर मुलायम सिंह यादव ने रामपुर से जया प्रदा को लोकसभा चुनाव लड़ा दिया था। इस पर गुस्साए आज़म खान पार्टी से अलग हो गए थे। यहां तक कि गुस्साए आज़म फिरोजाबाद के चुनाव में अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव के खिलाफ प्रचार को पहुंच गए थे। फिरोजाबाद के उपचुनाव में अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को इसका नुकसान उठाना पड़ा था। तब वह कांग्रेस नेता राज बब्बर से चुनाव हार गई थीं।

आज़म के समर्थकों की नजर में कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनकी अखिलेश यादव ने अनदेखी की है। आज़म खान के जेल में बंद होने पर अखिलेश सिर्फ एक बार ही जेल में जाकर मिले। आज़म के समर्थकों में नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि अखिलेश यादव ने उनकी गिरफ्तारी का विरोध उस ढंग से नहीं किया जैसी की उनसे अपेक्षा थी। इसके अलावा आज़म समर्थकों को बरेली में भोजीपुरा के विधायक शहजिल इस्लाम के खिलाफ मुकदमे और उनके पेट्रोल पंप पर तोड़फोड़ की कार्रवाई में अखिलेश की चुप्पी रास नहीं आई। उनका मानना है कि यदि अखिलेश तीखे तेवर अपनाते तो तोड़फोड़ नहीं होती। शहजिल का कहना है कि उन्होंने यह बयान कोई पूर्व नियोजित तरीके से नहीं दिया था, वह समर्थकों में जोश भरने में बोल गए थे। गत् विधानसभा चुनावों में भी आज़म ने अपने समर्थकों के लिए टिकट की मांग की थी लेकिन अखिलेश ने सिर्फ अब्दुल्ला आज़म को टिकट दे मामले को इतिश्री कर दिया। आज़म समर्थकों का मानना है कि विधानसभा टिकट में भी आज़म समर्थकों का अखिलेश ने ख्याल नहीं रखा। बदायूं से आबिद रजा जैसे नेता जिनकी जीत तय मानी जा रही थी, उनका पत्ता साफ कर मुंबई में काम कर रहे बिल्डर को टिकट थमा दिया गया। आज़म खान को नेता प्रतिपक्ष बनाने की मांग हुई तो सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने यह जिम्मेदारी खुद उठाना बेहतर समझा। जबकि इससे पहले ही आज़म के समर्थक इस मुद्दे पर सोशल मिडिया में माहौल बनाने में जुटे हुए थे।

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