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गैरों पर सितम, अपनो पर करम

कुछ ऐसा ही हाल है यूपी की भाजपा सरकार का। मौजूदा सरकार भ्रष्टाचार की आड़ में ऐसे अधिकारियों, कर्मचारियों और नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर रही है जो पूर्ववर्ती सरकारों में खास अहमियत रखते थे। गत दिवस दो आईएएस अधिकारियों पर सरकार की गाज गिरी। खनन घोटाले में सच्चाई सामने आने के बाद दोनों आईएएस अफसरों अजय कुमार सिंह और पवन कुमार को उनके पद से हटा दिया गया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि छानबीन के दौरान ये अधिकारी दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ न कर सकें।
भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार का यह कदम सराहनीय माना जा सकता है लेकिन तब जब निष्पक्ष भाव से उन सभी कथित भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की जाए जो तमाम सुबूतों के बावजूद मौजूदा सरकार में महत्वपूर्ण स्थान पर जमे हुए हैं।

भ्रष्ट अफसरों की फेहरिस्त में जल निगम, कानपुर के अफसरों समेत आधा दर्जन अभियंता और एक प्रमुख सचिव काफी समय से जोड़-तोड़ की रणनीति अपनाते हुए स्वयं को बचाते चले आ रहे हैं जबकि ऐसे अफसरों के खिलाफ तमाम सुबूत और प्रत्यक्ष प्रमाण उन्हें दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है। प्रश्न यह उठता है कि आखिरकार ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों को क्यों बचाया जा रहा है जिन्होंने जनता की गाढ़ी कमाई को दोनों हाथों से लूटा और सरकार की योजनाओं को अधूरा ही छोड़ दिया।


लगभग पांच वर्ष पूर्व अखिलेश सरकार के कार्यकाल में कानपुर मण्डल के मण्डलायुक्त इफ्तेखारुद्दीन ने जांच आख्या के आधार पर दर्जन भर अधिकारियों को दोषी मानते हुए कार्रवाई की संस्तुति की थी लेकिन ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर की बात उन्हें उनके पद से विस्थापित तक नहीं किया गया।
मामला कुछ इस तरह से है। ‘जेएनएनयूआरएम’ कार्यक्रम के अंतर्गत कानपुर नगर में दो पेयजल योजनाएं स्वीकृत हुई थीं। फेस-1 वर्ष 2007-2008 में तथा फेज-2 वर्ष 2008-2009 में स्वीकृत हुई। पहले फेज की योजना की लागत 393.93 करोड़ रुपए तथा दूसरे फेज की लागत 475.15 करोड़ रुपयों की थी। यह योजना वर्ष 2008 से आरंभ हुई थी, जिसे वर्ष 2011 के अंत में पूरा हो जाना था। जिस वक्त योजना बनी उस वक्त सूबे में मायावती की सरकार थी और जल निगम के चेयरमैन थे एक चर्चित आईएएस अफसर। हालांकि मण्डलायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में आईएएस अफसर का जिक्र नहीं किया है लेकिन जल निगम में चेयरमैन होने की हैसियत से वे भी जिम्मेदार थे। वर्ष 2007 से लेकर 2009 के बीच स्वीकृत हुई ये योजना लगभग एक दशक बाद भी पूरी नहीं हो पायी है।


योजना के प्रथम फेज का कार्य कई लगभग आधा दर्जन कंपनियों ने मिलकर किया था। दूसरे फेज का कार्य सिर्फ मेसर्स रैमको प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक कंपनी वर्ष 2009 से अभी तक कर रही है। रैमको नामक कंपनी को 475 करोड़ रुपए की धनराशि में से 455 करोड़ रुपए का भुगतान जल निगम द्वारा काफी पहले किया जा चुका है।
लगभग एक दशक का समय बीत जाने के बाद भी स्थिति यह है कि यह योजना कब पूरी होगी और जल निगम द्वारा कब निर्धारित लक्ष्य के अंतर्गत घर-घर  पानी पहुंचाया जा सकेगा? इसकी जानकारी किसी के पास नहीं। मौजूदा अधीक्षण अभियंता रामशरण पाल भी कुछ ऐसा ही कहते हैं। वे कहते हैं कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह कह पाना मुश्किल है कि काम कब तक पूरा होगा। रही बात गुणवत्ताहीन कार्य की वजह से पाइप लाइनों के क्षतिग्रस्त होने की तो इसके ठीक होने की गुंजाइश भी दूर-दूर तक नजर नहीं आती।

जल निगम कानपुर के मुख्य अभियंता का कहना है कि 800 करोड़ की योजना का निस्तारण अभी पूरी तरह से नहीं हो पाया है। जहां तक घटिया पाइप लाइनों की बात है तो उन्हें सुधारने का काम चल रहा है।
जल निगम कानपुर के मुख्य अभियंता और अधीक्षण अभियंता के बयान यह साबित करने के लिए काफी हैं कि अरबों की योजना में खूब लूट हुई। जानकारी पूर्ववर्ती मायावती सरकार से लेकर अखिलेश सरकार और मौजूदा योगी सरकार को भी है। बात यदि किसी जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की हो तो किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकी है। ऐसा क्यों? ये अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है।

 

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