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किसान आंदोलन के बीच, पत्रकारों पर लगातार दर्ज हो रहे हैं आपराधिक मामले

नए कृषि कानून के आने के बाद किसानों के आंदोलन के बीच पिछले 66 दिनों से लगातार कई पत्रकारों पर आपराधिक मामले दर्ज किये जा रहे हैं। ताजा मामला हरियाण प्रदेश से सम्बंधित स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया का है। लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ आंदोलनरत किसानों के दिल्ली के सीमाओं पर प्रदर्शन करने के दौरान से ही पत्रकारों के साथ ऐसा हो रहा है इससे पहले भी कई ऐसे पत्रकार हैं जिन पर आपराधिक मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया गया। सिंघु बॉर्डर पर जो गिरफ्तारियां हुई उनको लेकर पुलिस द्वारा कहा गया कि वे पुलिस के काम में बाधा पहुंचा रहे थे।

यहां एक सवाल पैदा होता है कि जरूरी सूचना जो तथ्यात्मक हैं जिनके प्रमाण हैं उनको जनता तक पहुंचाने वाला पत्रकार अपराधी कैसे हो सकता है ?क्योंकि ज्यादातर पत्रकार जिन पर आपराधिक मामले दर्ज किये गए वे सरकारी योजनाओं की ग्राउंड रिपोर्ट दिखा रहे थे। 

जैसे आज़मगढ़ के एक स्कूल में छात्रों से झाड़ू लगवाने की घटना को रिपोर्ट करने वाले छह पत्रकारों के ख़िलाफ़ 10 सितंबर, 2019 को एफ़आईआर दर्ज की गयी। पत्रकार संतोष जायसवाल के ख़िलाफ़ सरकारी काम में बाधा डालने और रंगदारी मांगने संबंधी आरोप दर्ज किये गए।

कानूनों का दुर्योपयोग कर पत्रकारों का किया जा रहा है मानसिक शोषण !

 

इतना ही नहीं मिर्जापुर में 31 अगस्त 2019 को पत्रकार पंकज जायसवाल के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई गयी। कारण यह था कि पंकज जायसवाल ने सरकारी स्कूल में व्याप्त अनियमितता और ‘मिड-डे’ मील में बच्चों को नमक रोटी खिलाए जाने से संबंधित ख़बर छापी थी। हालाँकि काफ़ी हंगामा होने के बाद पंकज जायसवाल का नाम एफ़आईआर से हटा दिया गया और उन्हें इस मामले में क्लीन चिट दे दी गयी। लेकिन यह क्यों जरूरी हो जाता है कि ऐसे मामले अस्तित्व में ही आये ? क्यों पत्रकारिता धर्म का पालन कर रहे पत्रकारों को सच्चाई दिखने के लिए कानूनों का दुर्योपयोग कर उनका मानसिक शोषण किया जाता है ?

उपर्युक्त घटना में ज़िले के कलेक्टर द्वारा एक गैर-ज़िम्मेदाराना बयान भी दिया गया। उन्होंने कहा था कि ‘प्रिंट मीडिया का पत्रकार वीडियो कैसे बना सकता है?’ इस सवाल का सटीक जवाब देने के लिए ‘प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया’ को हस्तक्षेप करना पड़ा था।

हाल के समय में जिन पत्रकारों पर आपराधिक मामला दर्ज किया गया है उनमें ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई, ‘नेशनल हेराल्ड’ की वरिष्ठ सलाहकार संपादक मृणाल पांडे, ‘क़ौमी आवाज़’ के संपादक ज़फ़र आग़ा, ‘द कारवां’ पत्रिका के संपादक और संस्थापक परेश नाथ, ‘द कारवां’ के संपादक अनंत नाथ और इसके कार्यकारी संपादक विनोद के. जोस का नाम भी शामिल है। 

शिकायतकर्ता ने कहा

 

इन सबके खिलाफ शिकायत करने वाले शिकायतकर्ता ने कहा है, ‘इन लोगों ने जानबूझकर गुमराह करने वाले और उकसाने वाली ग़लत ख़बरें प्रसारित कीं और अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया। सुनियोजित साज़िश के तहत ग़लत जानकारी प्रसारित की गई कि आंदोलनकारी को पुलिस ने गोली मार दी।’

मनदीप पुनिया की गिरफ़्तारी के मामले में उनके वकील का कहना है कि उन्हें फ़िलहाल 14 दिन के न्यायिक हिरासत में भेजा गया है। मनदीप पुनिया, सिंघु बॉर्डर पर हो रहे किसान आंदोलन को पहले दिन से ही कवर कर रहे थे। जिस वक़्त उनकी गिरफ़्तारी हुई उस वक़्त भी वह रिपोर्टिंग का कार्य कर रहे थे। यहाँ तक कि मनदीप की गिरफ़्तारी के करीब आठ घंटे बाद पुलिस ने उनकी पत्नी को इस बात की जानकारी दी।

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