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चरम पर घात-प्रतिघात की राजनीति

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के निजी आवास ‘मातोश्री’ के बाहर हनुमान चालीसा पढ़ने का ऐलान करने वाली अमरावती से निर्दलीय सांसद नवनीत राणा ने महाराष्ट्र की सियासत में भूचाल की स्थिति पैदा कर दी है। उनको उनके विधायक पति रवि राणा के साथ जेल में डाल दिया गया है लेकिन उनके तेवर अब भी सख्त नजर आ रहे हैं। जेल के अंदर से लिखे एक पत्र के जरिए उन्होंने मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार पर कई सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। नवनीत राणा का कहना है कि दलित होने की वजह से उनको न तो जेल में पीने का पानी दिया गया और न ही वॉशरूम का इस्तेमाल करने दिया गया। वहीं दूसरी तरफ गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी को एक मामले में जमानत मिलने के घंटे भर बाद ही असम पुलिस ने दोबारा गिरफ्तार करके हिरासत में लेकर ये जता दिया कि राजनीतिक द्वेष में सबकुछ संभव है। इस बीच पंजाब पुलिस भी पूर्व आप नेता कुमार विश्वास और अलका लांबा के खिलाफ कार्यवाही करने दिल्ली पहुंच गई

इंसान में बदले की भावना तब से है, जब से हम इस धरती पर रह रहे हैं। हमारे देश के किस्से-कहानी हों या पश्चिमी साहित्य, बदले की कहानियों से भरे पड़े हैं। फिर चाहे वो शेक्सपीयर का ड्रामा हैमलेट हो या ग्रीक उपन्यास ओरेस्टिया ट्रायलॉजी। यही बदले की भावना अब भारतीय राजनीति में चरम पर पहुंच गई है। राजनीतिक दल और उसके नेतागण निजी शत्रुता निकालने के लिए अपने दबदबे का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल ही में महाराष्ट्र और गुजरात की सियासत में जो हुआ वो इसी का एक जीता-जागता उदाहरण है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के निजी आवास ‘मातोश्री’ के बाहर हनुमान चालीसा पढ़ने का ऐलान करने वाली अमरावती से निर्दलीय सांसद नवनीत राणा ने महाराष्ट्र की सियासत में भूचाल की स्थिति पैदा कर दी हैं। दरअसल, उनको उनके विधायक पति रवि राणा के साथ जेल में डाल दिया गया है लेकिन उनके तेवर अभी भी सख्त नजर आ रहे हैं। जेल के अंदर से लिखे एक पत्र के जरिए उन्होंने मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार पर कई सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि दलित होने की वजह से उनको न तो जेल में पीने का पानी दिया गया और न ही वाशरूम का इस्तेमाल करने दिया गया। खार थाने में भी पूरी रात वो प्यास से तड़पती रहीं लेकिन पानी मांगने पर पुलिसवालों ने उनके साथ अभद्रता करते हुए अपशब्द कहे हैं। जिसके बाद नवनीत राणा प्रकरण ने महाराष्ट्र की सियासत में गर्मी ला दी है। हालांकि राणा के आरोपों को सिरे से नकारते हुए मुंबई पुलिस ने वीडियो जारी कर दिया जिसमें राणा दंपति थाने में चाय-नाश्ता करते दिखाई दे रहे हैं।

दूसरी तरफ गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी को एक मामले में जमानत मिलने के घंटे भर बाद ही असम की पुलिस ने दोबारा गिरफ्तार करके अपनी हिरासत में लेकर ये जता दिया कि राजनीतिक द्वेष में सबकुछ संभव है। पिछले कई दशकों में यह इकलौता ऐसा मामला है, जहां एक चुने हुए जन-प्रतिनिधि को कोर्ट से जमानत मिलने के तुरंत बाद किसी और मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। ये घटना देश के लोकतंत्र को ताकतवर बनाने वाली नहीं है बल्कि उन सबको डराने-धमकाने वाली भी है, जो किसी भी सत्ता के खिलाफ अपनी आवाज उठाने की हिम्मत अपने बूते पर ही जुटाते हैं। इसी प्रकार पंजाब पुलिस का दिल्ली पहुंच पूर्व आप नेता कुमार विश्वास और अलका लांबा के घर दस्तक देने का है। जाने माने कवि कुमार विश्वास रामलीला आंदोलन से लेकर दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के कुछ दिन बाद तक अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के बेहद करीबियों में शुमार रहे। लेकिन फिर झगड़ा हो गया और वो कट्टर विरोधी बन गए। देश की राजधानी दिल्ली में विधानसभा चुनाव से पहले कुमार विश्वास ने आप के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल पर गंभीर आरोप लगाए थे जिसके चलते कुमार विश्वास अब परेशानियों के घिरते नजर आ रहे हैं। उन्हें भी राजनीतिक द्वेष का सामना करना पड़ रहा है। कुमार विश्वास के अलावा कांग्रेस नेता अलका लांबा के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया था। लांबा पर विश्वास द्वारा की गई टिप्पणी का समर्थन करने का आरोप लगाया गया है। कुमार विश्वास के घर पंजाब पुलिस भी पहुंच चुकी है। अब विश्वास ने इस मामले में कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इससे भी स्पष्ट होता है कि राजनीति में द्वेष की भावना इतनी ज्यादा हो गई है कि पॉलिटिकल पावर का इस्तेमाल करके बदला लिया जा रहा है।

आरोपों के विपरीत थाने में चल रहा चाय-नाश्ता

महाराष्ट्र में राजनीतिक उबाल
25 अप्रैल की देर शाम बीजेपी शासित राज्य असम में हुई इस घटना के बाद सियासी गलियारों में बड़ा सवाल ये उठा है कि इस बहाने कहीं महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार को राजनीतिक तौर पर मुंहतोड़ जवाब तो नहीं दिया गया है? हो सकता है कि सवाल उठाने वाले सही भी हों क्योंकि अमरावती की निर्दलीय सांसद नवनीत राणा और उनके निर्दलीय विधायक पति रवि राणा ने बीते 24 अप्रैल को महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे के निजी आवास ‘मातोश्री’ के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ करने की धमकी दी थी। कानून के मुताबिक वो विभिन्न समुदायों के बीच धार्मिक उन्माद फैलाने का जुर्म बनता है और उसी आरोप में राणा दंपति जेल में बंद हैं। 25 अप्रैल को मुंबई हाइकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए दोनों को ये कहते हुए फटकार भी लगाई कि जो जितना बड़ा जन प्रतिनिधि, उसकी ताकत भी उतनी बड़ी होती है लेकिन आखिर वो ये क्यों भूल जाता है कि समाज-देश के प्रति उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। लिहाजा, उसकी इस लापरवाही पर कोर्ट को भला किसलिए हमदर्दी दिखानी चाहिए।

गुजरात की गरमाई राजनीति
अब जरा गौर करते हैं जिग्नेश मेवाणी के उस बयान पर जिसके कारण असम पुलिस ने उन्हें गुजरात के पालनपुर जाकर पहले गिरफ्तार किया, फिर कोर्ट में पेश किया और कोर्ट से उन्हें जमानत भी मिल गई। लेकिन असम पुलिस को ये रास नहीं आया क्योंकि राज्य कोई भी हो, खाकी वर्दी अगर अपने हुक्मरान का फरमान नहीं मानेगी, तो उसके कंधे पर चमक रहे सितारों को उतरने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। तो आखिर जिग्नेश मेवाणी ने ऐसा क्या कह दिया कि एक दूरदराज के राज्य की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करने में ज्यादा देर नहीं लगाई। भले ही ऐसे किसी भी राज्य में आम लोग चोरी, झपटमारी जैसी छोटी वारदातों से लेकर हत्या की कोशिश, बलात्कार और हत्या जैसे संगीन जुर्म की एफआईआर दर्ज करने के लिए भी पुलिस के आगे फरियाद की गुहार लगाए बैठे हों।

दरअसल, जिग्नेश मेवानी को उनके एक ट्वीट के चलते गिरफ्तार किया गया था जिसमें उन्होंने लिखा था, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो गोडसे को भगवान मानते हैं, वह गुजरात में हुई सांप्रदायिक झड़पों के लिए शांति और सद्भाव की अपील करें।’ उनके इस बयान पर असम के बीजेपी नेता अरूप कुमार द्वारा शिकायत किए जाने के बाद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। गुजरात के वडगाम से विधायक मेवानी के खिलाफ धारा 120 बी (आपराधिक साजिश), धारा 153 (ए) (दो समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 295 (ए), 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान) और आईटी की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। असम पुलिस ने जिग्नेश मेवानी को 19 अप्रैल को गुजरात के पालनपुर शहर से गिरफ्तार किया था। विधायक को ट्रांजिट रिमांड पर कोकराझार ले जाया लाया गया और वहां के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 21 अप्रैल को उन्हें तीन दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया था। 25 अप्रैल की देर शाम उसी कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी लेकिन पुलिस ने अपनी हिरासत से छोड़ने से पहले ही जिग्नेश के खिलाफ एक और मामला दर्ज करके उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया।

असम पुलिस ने इसे जायज दिखाने के लिए ये दलील दी है कि जमानत मिलने के तुरंत बाद मेवाणी ने पुलिस अधिकारियों पर हमला किया, जिसके कारण उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया है। जिग्नेश मेवाणी गुजरात के वडगाम से निर्दलीय विधायक हैं। वह पेशे से एक वकील होने के साथ ही पत्रकार भी रह चुके हैं। दलित आंदोलन के दौरान जिग्नेश अचानक ही मीडिया की सुर्खियों में चर्चा का विषय गए हैं। हालांकि वे हार्दिक पटेल के साथ दिल्ली में कांग्रेस का मंच साझा कर चुके हैं लेकिन औपचारिक तौर पर कांग्रेस की सदस्यता नहीं ली है। इसलिए कि ऐसा करते ही उनकी विधायकी चली जाएगी। हालांकि उनकी गिरफ्तारी पर असम कांग्रेस ने विरोध-प्रदर्शन भी किया। लेकिन खुद मेवाणी अपनी गिरफ्तारी को भाजपा और आरएसएस की साजिश बताते हुए कहते हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले यह मेरी छवि खराब करने के लिए राजनीतिक प्रतिशोध लिया जा रहा है। यह पूरी प्लानिंग है, जैसा रोहित वेमुला के साथ किया, चंद्रशेखर आजाद के साथ किया गया।’ लेकिन यहां सवाल सियासत का नहीं बल्कि ये है कि लोकतंत्र में निजी शत्रुता से नुकसान किसे हो रहा है?

 

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