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दलितों का नेता बनने की राह पर अखिलेश यादव 

दलितों का नेता बनने की राह पर अखिलेश यादव 

कभी उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं पर मायावती का एकछत्र राज हुआ करता था। दलित मतदाताओं की मेहरबानी के चलते ही मायावती उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य की चार बार बागडोर संभाल पाने में कामयाब हो गई थी। दलित मतदाता भी मायावती को अपना भगवान मानने लगे थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ ही मायावती की तस्वीर दलितों के घरों में लगने लगी थी। लेकिन दलितों ने मायावती को छह साल पूर्व उस समय तगड़ा झटका दे दिया जब उन्होंने उनके चुनाव चिन्ह हाथी की बजाय कमल को वोट दे दिया।

बहरहाल, जहां मायावती हाथी की सवारी करके दिल्ली तक पहुंचने और प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब देख रही थी वह उनके गृह प्रदेश यूपी में ही अर्श से फर्श पर आ पड़ी। तब एक बारगी मायावती को दिन में तारे दिखते नजर आ गए थे। इसके बाद मायावती अपनी चुनावी रणनीति बदलने को मजबूर हो गई।

2019 के लोकसभा चुनाव में वह अपने चार दशक पुराने राजनीतिक दुश्मन पार्टी समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर नए रूप में सामने आई। जिसके चलते मायावती 2014 में जहा शून्य पर थी वहा इस बार उसके सांसदों का आंकड़ा 10 तक पहुंच गया। लेकिन घाटे में समाजवादी पार्टी रही।  उसको सिर्फ 5 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। इसके बाद भी मायावती सपा से संतुष्ट नजर नहीं आयी और यह कहकर गठबंधन तोड़ दिया कि इससे उनके मतदाताओं का ट्रांसफर नहीं हो पाया था। यानि की बसपा खेमे में सपा के वोटर नहीं आ सके थे।

इस सबसे सीख लेकर अखिलेश यादव ने अपनी अलग ही रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। राजनीति के मैदान में निखार पा चुके अखिलेश यादव ने अब मायावती के तीर से ही उसके मतदाताओं पर निशाना लगाना शुरू कर दिया है। जिसके चलते अखिलेश मायावती के धुरंधरों को एक-एक कर अपने पाले में लाने में कामयाब हो रहे है।

सबसे पहले अखिलेश यादव ने दलितों के भावनात्मक पक्ष को अपने पाले में लाने की मुहीम चलाई है। यही वजह है कि इन दिनों समाजवादी पार्टी की होर्डिंग्स में डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ अब डॉ. भीमराव अंबेडकर की भी तस्वीर नजर आ रही है। इसके अलावा अखिलेश यादव दलित वर्ग से जुड़े चेहरों को संगठन में भी महत्व देने की कोशिश कर रहे हैं।

इसी योजना के तहत हाल ही में गठित सपा के प्रदेश संगठन में खासी तादाद दलित वर्ग के पदाधिकारियों की हो रही है। बहरहाल, एक ओर सपा संगठन में दलितों का प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है तो दूसरी ओर पूर्व मंंत्रियों और पूर्व सांसदों समेत दर्जनों दिग्गज बसपा नेता मायावती को छोड़कर हाथी से उतरकर साइकिल पर सवार हो रहे हैं। दूसरी तरफ अखिलेश यादव सभी का गर्मजोशी से स्वागत कर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वह दलितों के भी नेता हो सकते हैं।

अंबेडकर जी की मुर्तिया तो हमारे दफ्तरों में पहले से ही लगती थी। लेकिन अब प्राथमिकता पर लग रही है। दलित मतदाताओं का रुझान अब बसपा की तरफ से हटकर समाजवादी पार्टी की तरफ आ रहा है। इसका कारण है दलितों का मायावती से विश्वास उठना। क्योकि मायावती को भाजपा ने सीबीआई से डरा दिया है। मायावती इस डर के चलते भाजपा के खिलाफ बोल नहीं पा रही है। उसके नेता और वोट बैंक अब सपा की तरफ आ रहा है।  -राजकुमार भाटी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, समाजवादी पार्टी

अखिलेश के दलितों का नेता बनने की इस राजनीतिक पिच पर बसपा के नेताओं ने आकर फील्डिंग जमानी शुरू कर दी है। जिसके चलते 20 जनवरी को पूर्व मंत्री रामप्रसाद चौधरी के साथ पूर्व सांसद अरविंद चौधरी और पांच पूर्व विधायकों के अलावा जिलास्तर के कई नामी-गिरामी बसपा नेताओं ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ले ली।

जबकि इसके एक दिन पहले ही बसपा सरकार में पूर्व मंत्री रहे रघुनाथ शंखवार और 2019 के लोकसभा चुनाव में मोहनलाल गंज से बसपा प्रत्याशी रहे सीएल वर्मा समेत बड़ी संख्या में बसपा नेता सपा में शामिल हो गए थे। याद रहे कि लोकसभा चुनाव के बाद से अब तक आठ महीने में कई दिग्गज बसपा नेता साइकिल पर सवार हो चुके हैं। अखिलेश यादव इससे उत्साहित है। उनकी मानें तो बसपा से सपा में आने वालो की यह संख्या अभी और बढ़ेगी।

उल्लेखनीय है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने आगे बढ़कर बसपा से गठबंधन किया था। हालांकि, समाजवादी पार्टी को चुनाव में उम्मीदों के मुताबिक सफलता नहीं मिल पाई। नतीजन फिर दोनों दल एक-दूसरे से अलग हो गए और अपनी-अपनी रणनीति बनाने लगे है। फिलहाल अखिलेश यादव ने संगठन में फेरबदल करते हुए बड़ी संख्या में दलित वर्ग के नेताओं को अहम जिम्मेदारी सौंपी है।

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