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उत्तर प्रदेश के चुनाव सिर पर हैं। चुनाव प्रचार धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगा है। सत्तारूढ़ भाजपा को समाजवादी पार्टी से खासी टक्कर मिलती नजर आ रही है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की सभाओं और रथ यात्रा में उमड़ते जनसमूह ने योगी आदित्यनाथ को सकते में डाल दिया है। अखिलेश अपने हर भाषण, यहां तक कि प्रेस वात्र्ताओं में भी खुद को ‘हम समाजवादी लोग’ कह कर पुकारते हैं। भगवा रंग लेकिन उनके समाजवादी विचारधारा के प्रति पे्रम रंग को फीका करता दिखाई देने लगा है। अखिलेश यकायक ही बेहद धार्मिक हो चले हैं। ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल हनुमान भक्त बन बैठे थे। इन दिनों अखिलेश के सपनों में भगवान श्री कृष्ण आने लगे हैं। पार्टी रैलियों में वे भगवान परशुराम का फरसा उठाए दिख रहे हैं। सपा के पुराने नेता उनके इस नए अंदाज से खासे व्यथित बताए जा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो मुलायम सिंह यादव के करीबी रहे इन नेताओं का मानना है कि भाजपा को चुनावी शिकस्त देने की नीयत से भले ही अखिलेश भगवा रंग में रंगते जा रहे हांे, पार्टी को इससे कुछ खास हासिल होने वाला नहीं है। दरअसल अखिलेश परशुराम के सहारे भाजपा से नाराज चल रहे ब्राह्मण मतदाता को लुभाने का प्रयास कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण समाज योगी आदित्यनाथ के ठाकुर प्रेम से खासा नाराज बताया जा रहा है। यह धारणा भी पिछले पांच सालों में बलवती हुई है कि योगी राज में सबसे ज्यादा अत्याचार ब्राह्मणों के साथ हुए हैं। इसी धारणा के चलते समाजवादी अखिलेश भगवान परशुराम के भक्त बन नाराज ब्राह्मण वोटर को लुभाने का काम करने लगे हैं। इतना ही मानो काफी नहीं था, अपने कोर वोट बैंक यादव को सपा संग जोड़े रखने के लिए उन्होंने श्री कृष्ण का सहारा भी लेना शुरू कर दिया है। वे कह रहे हैं कि इन दिनों श्री कृष्ण उनके सपनों में आकर उन्हें अगली सरकार बनाने का आशीर्वाद दे रहे हैं। खबर जोरों पर है कि भाजपा द्वारा मथुरा स्थित श्री कृष्ण जन्म भूमि मंदिर मुद्दे को हवा देने चलते अखिलेश खासे चिंतित हैं। उन्हें लग रहा है कि कहीं यदि यह मुद्दा गर्माया तो श्री कृष्ण का वंशज यादव समाज उनसे दूर जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों की राय में अखिलेश का समाजवादी चोले ऊपर भगवा चोला पहनना काउंटर प्रोडेन्टिव भी हो सकता है।

खांटी हिन्दुत्ववादी विचारधारा वाला वोट बैंक भले ही योगी से भारी नाराज क्यों न हो वह मतदान भाजपा के पक्ष में ही करेगा। ऐसों का मानना है कि भाजपा की काट के लिए अखिलेश का सबसे बड़ा हथियार योगी सरकार की विफलताएं और सामाजिक समीकरण हैं। यदि अखिलेश ओबीसी, मुस्लिम, एससी-एसटी वोट बैंक को साध लें तो उनकी जीत तय है। संकट यह भी भगवा की काट भगवा के जरिए कर रहे अखिलेश ऐसी कोई भी सलाह सुनने को राजी नहीं बताए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने वालों की मानें तो भाजपा जाति की राजनीति के मामले में मात खा जाती है। भले ही स्वर्ण मतदाता भाजपा का मजबूत वोट बैंक बन चुका है, उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे बड़ा फैक्टर ओबीसी, एससी-एसटी जातियां हैं। बसपा एक दौर में एससी-एसटी वोट बैंक पर जबरदस्त पकड़ रखती थी। अब लेकिन ऐसा नहीं है। मायावती का जनाधार पिछले दस वर्षों में कम होता चला जा रहा है। ऐसे में अखिलेश यादव यदि अपना फोकस धर्म को आधार न बनाते हुए जाति को बनाते हैं तो वे पिछड़ों और दलितों को अपनी तरफ आकर्षित कर भाजपा को इन चुनावों में पटखनी दे सकते हैं। इतना ही नहीं, वे तेजस्वी यादव की रणनीति से सबक लेते हुए योगी सरकार को उसकी विफलताओं के जरिए बैक फुट में ला सकते हैं। बिहार चुनावों में तेजस्वी ने सत्तारूढ़ नीतीश सरकार की खामियों को मुख्य मुद्दा बना बड़ी सफलता हासिल की थी। संकट यह कि अखिलेश यादव को ऐसी सलाह देने की हिमाकत कौन करे? अपने पिता के करीबियों को वे दो हाथ की दूरी पर रखते हैं और जिन पर वे भरोसा करते हैं उनकी राजनीतिक समझ अभी इतनी परिपक्व है नहीं कि वे अपने नेता को ईमानदार सलाह दे सकें।

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