[gtranslate]
Country

मायावती की काट के लिए अखिलेश-जयंत ने मिलाए चंद्रशेखर से हाथ

देश में डेढ़ साल बाद लोकसभा चुनाव होने वाले है ,लेकिन सियासी बिसात अभी से बिछाई जा रही है। उत्तर प्रदेश में तो समाजवादी पार्टी ने तो अपना सियासी एजेंडा सेट करने का काम शुरू कर दिया है। उपचुनाव में गठबंधन के लिए चंद्रशेखर आजाद का प्रचार करना पश्चिमी प्रदेश के नए बनते समीकरण की ओर इशारा कर रही हैं,अखिलेश-जयंत -चंद्रशेखर की तिकड़ी आगामी लोकसभा चुनाव में एक साथ मिल कर उतरते हैं तो पश्चिम उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों के लिए राजनीतिक तौर पर कड़ी चुनौती हो सकती है। पिछले विधानसभा में भले ही चंद्रशेखर आजाद की सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ गठबंधन बनते-बनते रह गई थी,लेकिन अब उपचुनाव के जरिए दोनों ही नेता करीब आ रहे हैं।

दरअसल उत्तर प्रदेश में 5 दिसंबर को एक लोकसभा और दो विधानसभा सीट पर उपचुनाव होने वाले है। इस उपचुनाव में चंद्रशेखर आजाद समाजवादी पार्टी गठबंधन के साथ खुलकर खड़े दिख रहे हैं। वो खतौली विधानसभा में जयंत चौधरी के साथ प्रचार करने के बाद अब तीन दिसंबर को आजम खान के रामपुर में अखिलेश यादव और जयंत के साथ चंद्रशेखर भी मंच साझा करेंगे। इससे साफ जाहिर होता है कि प्रदेश में आने वाले समय तिकड़ी गठबंधन देखने को मिल सकती है। उत्तर प्रदेश के खतौली विधानसभा सीट तो पश्चिम उत्तर प्रदेश की सियासत का कुरुक्षेत्र बना है। भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए राष्ट्रीय लोक दल ने गुर्जर समुदाय के दिग्गज नेता मदन भैया को मैदान में उतारा है। वहीं मैनपुरी और रामपुर सीट पर सपा और भाजपा की सीधी लड़ाई है।बहुजन समाज पार्टी तो उपचुनाव नहीं लड़ रही है।  ऐसे में मायावती के दलित वोटबैंक को साधने के लिए जयंत चौधरी ने चंद्रशेखर आजाद को गठबंधन में साथ लेकर चलने का दांव चला है। खतौली विधानसभा सीट पर जयंत चौधरी और चंद्रशेखर आजाद एक मंच पर थे और दोनों का मकसद मदन भैया को जिताना है। जयंत ने खतौली से दिल्ली पर निशाना साधा है।आरएलडी अध्यक्ष जयंत चौधरी ने तो कहा है कि जीत पक्की करने को नहीं है ये गठबंधन है। हम खतौली से दिल्ली तक का समीकरण बिगाड़ देंगे।

इतना ही नहीं जयंत चौधरी मीडिया से  बातचीत करते कहा कि चंद्रशेखर की गठबंधन में औपचारिक एंट्री हो चुकी है और आप देख सकते हैं तीनों रामपुर में एक साथ एक गाड़ी पर चलने जा रहे हैं। वहीं, चंद्रशेखर आजाद के तेवर भी भाजपा को लेकर आक्रामक है। खतौली उपचुनाव में हाथरस की घटना किसान आंदोलन में मारे गए किसानों का जिक्र कर सियासी पारा और भी चढ़ा दिया है। चंद्रशेखर ने कहा कि खतौली का उपचुनाव भाजपा के अहंकार के ताबूत में आखिरी कील ठोकने का काम करेगा। खतौली की जीत  किसान आंदोलन में शहीद किसानों को सच्ची श्रद्धांजलि देगा।

समाजवादी पार्टी -राष्ट्रीय लोक दल गठबंधन की जीत की कहानी लिखने उतरे जयंत-चंद्रशेखर ने मुजफ्फरनगर से दिल्ली पर निशाना साधकर गठबंधन का नया फार्मूला सामने रखा है। ऐसे ही रामपुर में 3 दिसंबर को सपा प्रमुख अखिलेश यादव, राष्ट्रीय लोक दल अध्यक्ष जयंत चौधरी और चंद्रशेखर आजाद एक साथ चुनाव प्रचार करने के लिए उतर रहे हैं। चंद्रशेखर के जरिए गठबंधन दलित वोटों को साधने में जुटा है। ऐसे में यह फॉर्मूला कामयाब हुआ तो चंद्रशेखर आजाद फिर 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में सपा-आरएलडी गठबंधन का हिस्सा होंगे?

प्रदेश के रामपुर,खतौली और मैनपुरी उपचुनाव के जरिए उत्तर प्रदेश में डेढ़ साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए अभी से ही सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है।यह उपचुनाव पश्चिमी प्रदेश के नए बनते समीकरण की ओर इशारा कर रही हैं। अखिलेश-जयंत चौधरी-चंद्रशेखर की तिकड़ी आगामी लोकसभा चुनाव में एक साथ मिलाकर उतरते हैं तो पश्चिम यूपी में भाजपा और बीएसपी दोनों के लिए राजनीतिक तौर पर कड़ी चुनौती हो सकती है। पश्चिम उत्तर प्रदेश की सियासत में जाट, मुस्लिम और दलित काफी अहम भूमिका अदा करते हैं। आरएलडी का कोर वोटबैंक जहां जाट माना जाता है तो सपा का मुस्लिम है। वहीं, चंद्रशेखर आजाद ने दलित नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई है। 2017 में सहारनपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच हुए जातीय संघर्ष में दलित समाज के युवाओं के बीच चंद्रशेखर ने मजबूत पकड़ बनाई है।

ऐसे में चंद्रशेखर और जयंत चौधरी को अखिलेश अपने साथ जोड़कर दलित-मुस्लिम-जाट का मजबूत कॉम्बिनेशन बनाना चाहते हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ कहते है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में भाजपा 2013 से पहले का कोई खास जनाधार नहीं था, लेकिन मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाटों को जोड़कर उसने अपनी सियासी जमीन को मजबूत किया है। किसान आंदोलन ने जाट और मुस्लिम के बीच दूरियों को काफी पाटने का काम किया है।  2022 के चुनाव में अखिलेश-जयंत की जोड़ी में चंद्रशेखर जगह नहीं बना सके थे, जिसके चलते समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल  को भी नुकसान हुआ है और चंद्रशेखर के हाथ भी कुछ नही आया है। विधानसभा चुनाव से सबक लेते हुए अब तीनों नेता एक साथ खड़े हो रहे हैं, जिसके लिए उपचुनाव में इस फॉर्मूले के टेस्ट का मौका दिया है।

गौरतलब है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट 20 फीसदी के करीब हैं तो मुस्लिम 30 से 40 फीसदी के बीच हैं और दलित समुदाय भी 25 फीसदी के ऊपर है।ऐसे में पश्चिम यूपी में जाट-मुस्लिम-दलित समीकरण बनता है कि भाजपा के साथ-साथ बसपा के लिए भी चुनौती खड़ी हो जाएगी। बसपा दलित-मुस्लिम समीकरण बनाने में जुटी है, लेकिन मुसलमानों का एक समुदाय बसपा अध्यक्ष मायावती पर विश्वास जता नहीं पा रही है। बसपा को भाजपा की बी-टीम के तौर पर देखता है। ऐसे में अखिलेश यादव भी दलित वोटों के लिए तमाम जतन कर रहे हैं। इसी कड़ी में चंद्रशेखर और जयंत चौधरी के साथ अखिलेश नया सियासी फार्मूला बना रहे है।

You may also like

MERA DDDD DDD DD