लोकसभा चुनाव में दौरान बसपा-सपा ने मिलकर भाजपा को खाई में ढकेलने के लिए गठबन्धन की आधारशिला रखी। यह खाई भाजपा को भले ही न ढकेल सकी हो लेकिन गठबन्धन के ताबूत के लिए उपयुक्त मानी जा रही है। बसपा प्रमुख मायावती ने अपनी तरफ से गठबन्धन को समाप्त करने का ऐलान कर दिया है जबकि सपा की तरफ से इंतजार है। अनुमान लगाया जा रहा है कि आज नहीं तो कल मुलायम से मुलाकात के बाद अखिलेश यादव भी न सिर्फ गठबन्धन समाप्ति की औपचारिक घोषणा कर देंगे बल्कि भविष्य में बसपा के साथ मिलकर चुनाव न लड़े जाने की बात भी कही जायेगी।
हाल ही में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनाव के दौरान अस्तित्व में आया गठबन्धन (सपा-बसपा) अब पूरी तरह से धाराशायी हो चुका है। गठबन्धन के दोनों ही दल अब ‘अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग’ सुना रहे हैं। खासतौर से बसपा प्रमुख मायावती ने अपनी तरफ से इस गठबन्धन को अलविदा कह दिया है। गत दिवस बसपा प्रमुख मायावती ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की खामियों को उजागर करते हुए अपनी नीति साफ कर दी है। हालांकि समाचार लिखे जाने तक सपा प्रमुख अखिलेश यादव की तरफ से किसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की गयी थी लेकिन माना जा रहा है कि जल्द ही अखिलेश यादव भी अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करके गठबन्धन के ताबूत में आखिरी कील ठोंक देंगे।
कहा जा रहा है कि गठबन्धन को लेकर मायावती के बयान का प्रतिउत्तर देने के लिए पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, राम गोपाल यादव और आजम खां समेत तमाम दिग्गज नेताओं का जमावड़ा लगने वाला है। हाई कमान की बैठक में ही मायावती के आरोप का जवाब तो दिया ही जायेगा साथ ही आगामी उप चुनाव में किस रणनीति के तहत चुनाव लड़ा जाए, इस पर भी विचार किया जायेगा। सपा नेताओं में बीच चिंता का विषय यह है कि बसपा प्रमुख मायावती ने गठबन्धन के अपने साथी सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर यह आरोप लगाया है कि अखिलेश यादव मुसलमानों को टिकट दिए जाने के पक्ष में ही नहीं थे। स्पष्ट समझा जा सकता है कि मायावती का निशाना किस ओर है। सपा की चिंता इसलिए भी बढ़ गयी है कि क्योंकि बसपा में अब दलित और मुस्लिम वोट बैंक की रणनीति पर खेल खेले जाने की तैयारी है। सभी जानते हैं कि यूपी का मुसलमान हमेशा से ही सपा की तुष्टिकरण नीति में शामिल रहा है। नब्बे के दशक का एक समय ऐसा भी था जब पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को मुल्ला मुलायम सिंह यादव के नाम से भी जाना जाने लगा था। मौलाना-मौलवी से लेकर मुस्लिम धर्म की ठेकेदारी करने वाले मुस्लिम नेताओं को सपा के कार्यकाल में ही अपनी सुरक्षा नजर आने लगी है। मुसलमानों के प्रति सपा का लगाव इतना था कि मुसलमानों को खुश करने के लिए पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कई बार अपनी ही पार्टी के हिन्दू नेताओं को नाराज किया। जब से सपा की कमान मुलायम के पुत्र अखिलेश यादव के हाथोें में आयी है तब से न सिर्फ सपा में फूट पड़ी बल्कि मुसलमानों से दूरी रखने वाले अखिलेश यादव की कार्यप्रणाली ने मुसलमानों को सपा से दूर कर दिया। हाल ही में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनाव में सपा की निराशा के पीछे मुसलमानों की नाराजगी सबसे बड़ा कारण मानी जा रही है। मुसलमानों से हुए डैमेज को कंट्रोल करने की रणनीति पर सपा विचार कर ही रही थी कि बसपा प्रमुख मायावती ने बाजी मारते हुए यह कह दिया कि लोकसभा चुनाव में हार के पीछे सपा प्रमुख अखिलेश यादव का हाथ है, वे नहीं चाहते थे कि मुसलमानों को टिकट दिया जाए। मायावती के इस बयान को लेकर सत्ता के गलियारे में निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं तो दूसरी ओर सपा इसका करारा जवाब देने के लिए नयी रणनीति पर विचार कर रही है। यहां तक कहा जा रहा है कि यदि जल्द ही सपा में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सपा से नाराज हो चुके पुराने नेताओं की वापसी के द्वार तो खोले ही जायेंगे साथ ही पारिवारिक सदस्यों को भी एक बार पुनः मिलाने की कोशिश होगी। रही बात बसपा से भविष्य में किसी प्रकार के गठबन्धन की तो जल्द ही सपा प्रमुख की तरफ से इंकार के बाबत इस बात का ऐलान कर दिया जायेगा।
यदि देखा जाए तो सपा की दो पीढ़ियां बसपा के चरित्र से वाकिफ हो चुकी हैं। जाहिर है भविष्य में किसी प्रकार का न तो समझौते की गुंजाइश शेष बची है और न ही किसी प्रकार के गठबन्धन में बसपा को शामिल किए जाने की रणनीति पर ही विचार किया जायेगा। इधर बसपा प्रमुख मायावती ने भी ट्वीट करके जानकार दी है कि बसपा अब भविष्य में सभी छोटे-बडे़ चुनाव अकेले दम पर लडे़गी। बस अब सपा की तरफ से भी इसी प्रकार के ऐलान का इंतजार है, उसके बाद ही यह कहा जा सकता है कि अनौपचारिक तरीके से समाप्त हो चुके गठबन्धन के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी गयी है।

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