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कांग्रेस की तरह अकेले चुनाव में नहीं उतरेंगे अजीत सिंह

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की योजना लोकसभा की 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की है। लगभग तय हो चुका है कि दोनों पार्टियां 37-37 सीटों पर चुनाव लडेंगी। इसमें खास बात यह है कि आगामी लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी दलों के महागठबंधन की वकालत करती रही इन दोनों पार्टियों ने न तो कांग्रेस को तरजीह दी है और न ही राष्ट्रीय लोकदल को। साफ है कि दोनों पार्टियां मानकर चल रही हैं कि उत्तर प्रदेश में उनके सिवाय और किसी का कोई खास जनाधार नहीं रहा। ऐसी स्थिति में कांग्रेस अकेले चुनाव में उतरेगी, लेकिन राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह के सामने गठबंधन में बने रहने की मजबूरी है।

कांग्रेस के लिए सपा-बसपा ने सिर्फ दो सीटें रायबरेली और अमेठी छोड़ी हैं। इन दोनों सीटों पर वे उम्मीदवार खड़े नहीं करेंगी, जबकि राष्ट्रीय लोकदल को तीन सीटें ही दी हैं। ऐसे में अब कांग्रेस के सामने यही रास्ता बचा है कि वह राज्य की सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़े। लेकिन दिक्कत राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह के सामने है। उन्हें मजबूरन गठबंधन का हिस्सा बना रहना होगा। कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अच्छा जनाधार रखने वाले अजीत सिंह की पार्टी को आज सपा-बसपा सिर्फ तीन सीटें ही देने को राजी हैं। बताया जाता है कि मायावती, आरएलडी को तीन सीटों से ज्यादा देने के लिए जरा भी राजी नहीं हैं, जबकि आरएलडी कम से कम छह सीटें चाहती है। गठबंधन के तहत मथुरा, बागपत और मुजफ्फरनगर की सीटें आरएलडी को दी जा सकती हैं, लेकिन पार्टी और सीटें चाहती है। आरएलडी नेता मसूद अहमद ने कहा, ‘पार्टी महागठबंधन का हिस्सा है और पार्टी नेतृत्व ने लोकसभा चुनाव में छह सीटों की मांग की है , ये सीटें हैं बागपत, मथुरा, मुजफ्फरनगर, हाथरस, अमरोहा और कैराना।’ उन्होंने कहा कि कैराना लोकसभा सीट तो आरएलडी के पास पहले ही है अब पांच सीटों की और मांग की गई है । इस बारे में फैसला पार्टी के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी और एसपी सुप्रीमो अखिलेश यादव तथा बीएसपी सुप्रीमो मायावती के बीच बातचीत के बाद तय होगा।

गौरतलब है कि  2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 73 सीटें भारतीय जनता पार्टी गठबंधन ने जीती थीं। इस बार भी भाजपा नेता 73 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं। लेकिन समझा जा रहा है कि विपक्षी दलों का गठबंधन उसके लिए परेशानी खड़ा कर सकता है। ऐसा इसलिए कि बसपा-सपा और रालोद ने साथ मिलकर उपचुनाव लड़ा था जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गोरखपुर सीट और उप मुख्यमंत्री की फूलपुर सीट से सपा प्रत्याशियों को जीत मिली थी। जबकि कैराना सीट पर रालोद प्रत्याशी ने भाजपा से यह सीट छीनी थी।

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