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हरियाणा के बाद अब मध्य प्रदेश में सिंधिया समर्थकों को कैसे संतुष्ट करेगी सोनिया

 

 हरियाणा में हुड्डा की ट्रिक तो काफी हद तक कामयाब रही। प्रदेश का मुखिया कुमारी शैलजा को बनाकर सोनिया  गांधी ने हरियाणा में चल रहे हुड्डा – तंवर गुट को निष्प्रभावी करने में प्राथमिक सफलता पा ली है। लेकिन अब सवाल है कि मध्य प्रदेश में क्या होगा ? मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद को लेकर हमलावर हो गए है। सिंधिया समर्थको ने ग्वालियर सहित कई शहरो को सिंधिया को सपोर्ट करते पोस्टरों और होर्डिंगों से पाट दिया है। इसके चलते सोनिया गांधी के सामने एक बार फिर परीक्षा की घडी आ गई है।


कहा जाता रहा है की ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी के सबसे अच्छे दोस्त रहे हैं। हालाँकि सड़क से संसद तक  फैसला सोनिया गांधी को ही करना है। बहरहाल अवैध खनन के मामले को लेकर सिंधिया समर्थको ने दिग्विजय सिंह के खिलाफ खुली जंग भी छेड़ दी है। मध्यप्रदेश की कांग्रेस राजनीती में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह पुराने खिलाड़ी ही नहीं बल्कि एक ही गुट के हिस्सेदार रहे हैं। राजनितिक गलियारों में चर्चा ए आम है की दिल्ली में कमलनाथ तो भोपाल में दिग्विजय सिंह ने बरसों से अपनी अपनी हिस्सेदारी बांट रखी थी। मध्य प्रदेश की इस जोड़ी से ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया भी लंबे वक्त तक परेशान और जूझते रहे थे। फ़िलहाल सवाल यह है कि क्या जूनियर सिंधिया पिता का बदला ले पाएंगे या फिर खामोशी अख्तियार कर राहुल गांधी के लौटने का इंतजार करना पड़ेगा?

सवाल यह भी है कि  क्या कमलनाथ सिंधिया को पीसीसी चीफ के रूप में स्वीकार करने की स्थिति में हैं? इसी सवाल के जवाब के रूप में अजय सिंह राहुल के आवास पर हुई हाल की बैठक को लिया जाना चाहिये क्योंकि इसमें 12 सीनियर एमएलए एकत्रित हुए थे और इसे कमलनाथ और दिग्विजय की युगलबंदी के रूप में भी विश्लेषण करने की जरूरत है। यह सच है की मप्र की राजनीति में जूनियर सिंधिया और सीनियर सिंधिया दोनों को दिग्विजय सिंह, मोतीलाल वोरा और शुक्ला खेमों से तगड़ी चुनौतियाँ मिलती रही हैं। 1993 में तब के कद्दावर नेता स्व. माधवराव सिंधिया सीएम बनते बनते रह गए थे।

मौजूदा सियासी परिदृश्य में भी ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए कमोबेश हालात ऐसे ही हैं लेकिन एक बड़ा अंतर ज्योतिरादित्य की राजनीति में यह है कि उनके समर्थक मुखर होकर उनकी वकालत करते हैं। ऐसा स्व. सिंधिया के मामले में नहीं होता था। वे 1993 में सीएम पद की रेस में पिछड़ने के बाद दिल्ली की सियासत में रम गए थे और लोकसभा में उपनेता तक गए। हालांकि यह भी तथ्य है कि वे ज्योतिरादित्य की तरह पूरे प्रदेश में घूम घूम कर प्रचार नहीं करते थे। स्वाभाविक है कि ज्योतिरादित्य नए जमाने की राजनीतिक स्टाइल पर चलते हैं यही कारण है कि उनके समर्थक मंत्री लगातार मुख्यमंत्री पर दबाव बना रहे हैं कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी जाए ताकि प्रदेश की कांग्रेस सियासत में उनका दबदबा और संतुलन बना रहे।

मध्य प्रदेश  विधानसभा  में सिंधिया खेमे के कुल 10 विधायक है। इसके अलावा प्रदेश कैबिनेट में 7  में से चार मंत्री सिंधिया के समर्थको में गिने जाते हैं। फिलहाल कमलनाथ ने शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम, महिला बाल विकास, खाद्य, परिवहन, पशुपालन जैसे विभाग सिंधिया कोटे के मंत्रियों को दे रखे हैं। लेकिन इसके बावजूद सिंधिया समर्थक चाहते हैं कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस की कमान दी जाए ताकि प्रदेश में उनके प्रभाव में बढ़ोतरी हो। गाहे बगाहे ये सभी मंत्री सार्वजनिक रूप से मुख्यमंत्री को मुश्किलें खड़ी करते रहते हैं। पता चला है की खाद्य मंत्री प्रधुम्न तोमर तो कैबिनेट की मीटिंग्स में ही सीएम से भिड़ जाते हैं वहीं अन्य मंत्री भी इसी लाइन पर चलकर दबाव की राजनीति कर रहे हैं।

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