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तमिल राजनीति में नया मोड़

करुणानिधि के निधन के बाद केवल डीएमके ही नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में नए मोड़ की संभावना बढ़ गई है। तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री रहे। डीएमके प्रमुख एम ़ करुणानिधि का 7 अगस्त को निधन हो गया। वह काफी लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे।

तमिलनाडु सरकार ने विपक्षी द्रमुक को उसके दिवंगत नेता करुणानिधि को दफनाने के लिए मरीना बीच पर जगह देने से साफ इंकार कर दिया। उसे इसके लिए पूर्व मुख्यमंत्री सी राजगोपालचारी और के ़ कामराज के स्मारकों के करीब जगह देने की पेशकश की। सरकार के इस फैसले से विवाद भी जन्मा। मामला मद्रास हाईकोर्ट तक पहुंचा। डीएमके की याचिका पर सुनवाई के बाद मद्रास हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि करुणानिधि को मरीना बीच पर ही दफनाया जाएगा। सुनवाई के दौरान डीएमके के वकील ने कहा कि राज्य की सात करोड़ आबादी में से एक करोड़ डीएमके के समर्थक हैं, अगर करुणानिधि को मरीना बीच पर दफनाने की अनुमति नहीं मिलती है तो वे सभी आहत हो जाएंगे। डीएमके के संस्थापक अन्ना दुर्रई अक्सर कहा करते थे- मेरा जीवन और मेरी आत्मा करुणानिधि हैं।

करुणानिधि के पार्थिक शरीर को सीआईटी कॉलोनी स्थित कनिमोझी के घर से राजाजी हॉल ले जाया गया ताकि नेता, पार्टी कार्यकर्त्ता और आम लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दे सकें। कुछ लोगों को करुणानिधि को दफनाने पर हैरानी हो रही है। जयललिता के निधन पर भी यह सवाल उठा था कि जयललिता का दाह संस्कार क्यों नहीं किया गया। दरअसल करुणानिधि की तरह जयललिता भी द्रविड़ मूवमेंट से जुड़ी थीं। द्रविड़ आंदोलन हिंदी धर्म की किसी ब्रह्मणवादी परंपरा और रस्म में यकीन नहीं करता। द्रविड़ आंदोलन से जुड़े रहने के कारण ही करुणानिधि को दफनाया गया। जयललिता से पहले एमजी रामचंद्रन को भी दफनाया गया था। तमिलनाड़ु के प्रथम मुख्यमंत्री अन्ना दुरै की भी उनके बगल में कब्र है।

गौरतलब है कि एमजीआर पहले डीएमके में ही थे लेकिन अन्ना दुरै के निधन के बाद जब पार्टी की कमान करुणानिधि के हाथों में आई तो नाराज होकर अलग हो गए। और एआईएडी- एमके की स्थापना की। करुणानिधि के निधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति में निश्चित तौर पर एक शून्य उभरा है। इस शून्य में खुद की उपस्थिति को लेकर बहुत जल्द ही कवायदें भी शुरू हो जाएंगी, हालांकि शुरू तो पहले से ही हो गयी थी अब दिखाई देने लगेगी। डीएमके और एआईएडीएमके के बीच की सियासी जंग अपनी जगह है। इससे भी इतर कुछ होने की गुंजाइश वहां की राजनीति में दिखाई दे रही है। वहां की सियासत का सिनेमा से बहुत पुराना संबंध है। साहित्य और सिनेमा के पुराने और वर्तमान संबंध पर चर्चा से पहले करुणानिधि के सियासी सफर को बातें जिसका आगाज सिनेमा से ही होता।

करुणानिधि के व्यक्तित्व के कई पहलू थे। वह एक सफल राजनेता के साथ-साथ पिता, लेखक, साहित्यकार, पत्रकार, तमिल सिनेमा के मशहूर पटकथा लेखक थे। उनके समर्थक उन्हें कलाईनारा यानी कला का विद्वान भी कहते हैं। उन्होंने मात्र 20 साल की उम्र में तमिल फिल्म उद्योग में पटकथा लेखक के रूप में अपने करियर का आगाज किया। अपनी पहली फिल्म राजकुमारी से ही वे मकबूल हो गए। वह एक प्रसिद्ध पटकथा लेखक के रूप में स्थापित हो गए। उनकी लिखी 75 से अधिक पटकथाएं मशहूर हुई।

असल में करुणानिधि ने द्रविड़ आंदोलन के जरिए राजनीति का सफर तय किया। उन्होंने अपनी फिल्म पराशिक्त के मार्फत अपने राजनीतिक विचारों का प्रचार-प्रसार किया। यह फिल्म तमिल सिनेमा जगत की माइल स्टोन है। इससे द्रविड़ आंदोलन को समर्थन मिला। फिल्म सुपरहिट रहे मगर विवादों से नहीं बच सकी। उनके लेखन में समाज सुधार होता था। करुणानिधि ‘कुडियारसु’, ‘मुत्तारम’, ‘अरासु’ सहित कई तमिल और अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं का संपादकीय दायित्व निभाते रहे।

तमिल फिल्मों में काम करने के कारण ही वह एमजी रामचंद्रन के करीब आए। करुणानिधि की फिल्मों में एमजीआर ने काफी काम किया। लेकिन अन्ना दुरैई के निधन के बाद करुणानिधि वहां के मुख्यमंत्री बन गए। तब उनको मुख्यमंत्री बनने में एमजीआर ने मदद की। लेकिन बाद में दोनों के दरम्यान सियासी जंग शुरू हो गई जो मरते दम तक जारी रही। एमजीआर ने तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणानिधि पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। नतीजतन उनको पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसके बाद ही एमजीआर ने अन्नाद्रमुक नाम से दूसरी पार्टी बना ली और वहां के चुनाव में जीत के बाद मुख्यमंत्री बने। यही वह दौर था जब तमिलनाडु में चुनाव में सस्ती लोकप्रियता के नए-नए नुस्खे अपनाए गए। एमजीआर के जीवित रहते करुणानिधि मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। येरियार के समाज सुधार आंदोलन का समर्थक, हिंदी विरोध का झंडा और श्रीलंकई तमिलनाडु के मुद्दे को लेकर ही करुणानिधि राजनीति के केंद्र में रहे। वक्त ने करवट ली और करुणानिधि की प्रतिद्वंदिता जयललिता से हो गई। यह प्रतिद्वंदिता वर्षों तक चलती रही। जयललिता के बाद अब करुणानिधि भी चले गए। यक्ष प्रश्न यह हे कि इनके बाद कौन?

बेशक तमिलनाडु की राजनीति में एक शून्य उभरा है। उस शून्य की भूमिका कौन? वर्तमान मुख्यमंत्री या करुणानिधि के पुत्र एम स्टालिन के वश की बात नहीं। सारी उम्मीद भरी निगाह सिनेमा की दो बड़े हस्तियों पर टिकी हैं- रजनीकांत और कमल हसन। क्या सिनेमा और सियासत की पुरानी परंपरा आगे भी बढ़ेगी। दोनों ही बेहद लोकप्रिय अभिनेता हैं। दक्षिण में सिनेमा के अभिनेता, खासकर रजनीकांत को ‘भगवान’ का दर्जा देते हैं, उनके प्रशंसक। क्या राजनीकांत और कमल हसन सियासत में अपनी सक्रियता बढ़ाएंगे?

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