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विकास की राजनीति में नई इबारत

दिल्ली विधानसभा चुनाव के साफ संदेश हैं कि देश में विकास की राजनीति ही विकल्प देगी। धार्मिक एवं भावनात्मक मुद्दों से जनता को लंबे समय तक नहीं बरगलाया जा सकता, बल्कि जमीन पर काम करने पड़ेंगे। आम आदमी पार्टी सरकार अपने काम के बूते ही लगातार तीसरी बार सत्ता में काबिज हुई है।

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत ने ‘विकास की राजनीति’ में निश्चित ही एक नई इबारत लिखी है। दिल्ली के लोगों ने यह बता दिया है कि उन्हें न तो धार्मिक मुद्दों में रुचि है और न ही वे किसी भावनात्मक बहाव में बहने वाले हैं, बल्कि उन्हें विकास से मतलब है। इसी विकास की वजह से दिल्ली के दिल में केजरीवाल बसते हैं।

उनकी पार्टी ने अपने कार्यों पर विधानसभा चुनाव लड़ा यानी कि विकास की राजनीति की और नेगेटिव प्रचार के बजाय पॉजिटिव प्रचार का रास्ता अपनाया तो जनता ने भी उस पर तीसरी बार भरोसा जताया। चुनावों के दौरान अक्सर पार्टियां अपने विरोधियों की विफलताओं को मुद्दा बनाती हैं, लेकिन आदमी पार्टी ने एक नए प्रयोग के साथ अपने चुनाव प्रचार को अंजाम दिया। उनकी टीम ने बीते पांच साल के अपने किए गए कार्यों का रिपोर्ट कार्ड जनता के समक्ष रखा। अपने काम पर ही फोकस रखने की सकारात्मक राजनीति की तो नतीजा भी उत्साहजनक आया।

केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने 63 सीटों पर जीत हासिल की और भाजपा सिर्फ 7 सीटों पर अटक कर रह गयी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भाजपा को अहसास था कि ‘विकास’ के मुद्दे पर केजरीवाल या उनकी पार्टी को घेरना मुश्किल है, तो उसने शाहीनबाग को तूल दिया। लेकिन दिल्लीवालों को केजरीवाल की सियासत और नेतृत्व पर ज्यादा भरोसा है। भारतीय जनता पार्टी के जीतने की स्थिति में दिल्ली की कमान किसे मिलेगी, इस सवाल का जवाब भी बीजेपी कभी नहीं दे पाई। सिर्फ सामूहिक नेतृत्व का हवाला देकर सवाल से बचने की कोशिश करती रही। ऐसे में जनता के सामने केजरीवाल ही एक पसंदीदा चेहरा रह गए थे।

अब जल्दी ही असम और बिहार जैसे राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, तो दिल्ली से सबक लेकर भाजपा को सोचना होगा कि जब चुनाव स्थानीय है, तो राष्ट्रीय मुद्दे का क्या करना? आम आदमी पार्टी ने बीते एक साल से अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली सरकार के पक्ष में माहौल बनाने के लिए हमेशा ही स्थानीय मुद्दों पर जोर दिया। चाहे बात बिजली की हो या पानी की। इन्हें बार-बार मुद्दा बनाया गया। पार्टी शुरू से जानती थी कि बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मुद्दे दिल्ली के हर आदमी को प्रभावित करते हैं।

ऐसे में इसका असर वोट पर भी दिखेगा। दिल्ली के सरकारी स्कूलों की बेहतर होती स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्कूलों की हालत को बेहतर कर आम आदमी पार्टी ने अपनी मंशा को जाहिर कर दिया था कि वह दिल्ली के हर तबके के लोगों के बारे में सोचती है।

जनता ने बीजेपी को क्यों नाकारा ?

इस चुनाव में बीजेपी ने भी प्रचार के दौरान अपना पूरा दम- खम दिखाया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, देश के गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रचार किया। भाजपा शासित राज्यों ही नहीं, बल्कि भाजपा की सहयोगी पार्टियों के मुख्यमंत्री तक चुनाव में उतरे। 200 सांसदों की फौज पार्टी ने मोर्चे पर झोंक डाली। बीजेपी ने इस चुनाव में धु्रवीकरण की भी आक्रामक पिच तैयार की। शाहीन बाग का प्रदर्शन उसके लिए मानो मुंह मागी मुराद जैसी थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित तमाम छोटे से लेकर बड़े नेता हर रैली और सभाओं में शाहीन बाग-शाहीन बाग का मुद्दा उछालते रहे। सभाओं में जनता के बीच सवाल उछालते रहे कि आप शाहीन बाग के साथ हैं या खिलाफ? शरजील इमाम के असम वाले बयान, जेएनयू, जामिया हिंसा को भी बीजेपी ने मुद्दा बनाकर बहुसंख्यक वोटर्स को साधने की कोशिश की। दिल्ली की जनता ने बीजेपी को नकारा और आप के काम पर पुनः अपना विश्वास जताया।

अगले पांच साल तक फिर से अरविंद केजरीवाल राज करेंगे। आम आदमी पार्टी की इस जीत से उसके चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर बहुत खुश हैं। उन्होंने इस मौके पर कहा कि ‘भारत की आत्मा की रक्षा में साथ देने के लिए दिल्ली की जनता का आभार। यह साफ हो गया है कि दिल्लीवालों ने फिर से अरविंद केजरीवाल को अपना मुख्यमंत्री चुन लिया है।’

दूसरी तरफ चुनाव प्रचार के दौरान लगातार शाहीनबाग पर धारदार बयानबाजी करने वाले बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा ने चुनाव नतीजों के बाद हार स्वीकार करते हुए कहा कि ‘हम नतीजों पर गौर करेंगे। दिल्ली वाले फ्री के प्रभाव में बह गए। हम 5 साल दिल्ली की जनता के मुद्दों को विपक्ष के रूप में उठाते रहेंगे।’

आम आदमी पार्टी की जीत पर ‘जन की बात’

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बधाई देते हुए कहा, ‘मैं आम आदमी पार्टी की जीत पर दिल्ली के लोगों और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बधाई देता हूं। लोगों ने ये दिखाया है कि देश ‘जन की बात’ से चलता है न कि ‘मन की बात’ से। बीजेपी ने केजरीवाल को आतंकवादी तक करार दिया, लेकिन उन्हें हरा नहीं सकी।’

भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने केजरीवाल को बधाई देते हुए कहा कि ‘हमने चुनाव में जनता को आश्वस्त करने की कोशिश की, लेकिन हम सफल नहीं हुए। हमने अपनी तरफ से चुनाव में खूब मेहनत की। मुझे पूरी उम्मीद है कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली का विकास होगा।’

उधर जिस पार्टी ने देश में 60 साल और दिल्ली में 15 साल लगातार सरकार चलाई हो, वो पार्टी पिछले दो चुनावों से दिल्ली में एक सीट के लिए भी तरस रही है। कांग्रेस इस बार भी शून्य पर आउट हो गई। यहां तक कि पार्टी के 63 प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। कुछ राजनीतिक विश्लेषक तो यह मान रहे हैं कि कांग्रेस ने जानबूझकर इस चुनाव में आक्रामक रवैया नहीं अपनाया कि कहीं उसके और आम आदमी पार्टी के वोट न बंट जाए और इसका फायदा भाजपा न उठा ले।

कहाँ मात खा गई  भाजपा !

छोटे से केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली के लिए बीजेपी ने जितनी ताकत झोंक दी थी, उतनी बड़े- बड़े राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी मेहनत नहीं की। लेकिन वह जनता का मन-मिजाज समझने में मात खा गई। उसे समझना होगा कि दिल्ली के व्यापारियों को सीलिंग का भय हमेशा सताता रहा है। व्यापारियों को लगता है कि केंद्र में बीजेपी की सरकार होने के कारण वह सीलिंग से राहत दिला सकती है।

शायद यही वजह रही कि मतदान से एक दिन पहले व्यापारियों के सबसे बड़े संगठन कैट ने बीजेपी को समर्थन देने का ऐलान भी कर दिया था। इस संगठन से दिल्ली में 15 लाख व्यापारी जुड़े हैं, जिनका दावा है कि वे 30 लाख लोगों को रोजगार देते हैं। ऐसे में बीजेपी के साथ सचमुच व्यापारी समुदाय आया था तो फिर पार्टी बेहतर प्रदर्शन क्यों न कर सकी?

मुख्यमंत्री केजरीवाल ने रणनीतिक रूप से भी संतुलित नीति अपनाई। खुद की घेराबंदी और हमलों का जवाब देने के बजाए उन्होंने अपने उन विधायकों के टिकट तक काट डाले जो उदासीन थे। राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का मानना है कि बीजेपी का हद से ज्यादा आक्रामक चुनाव प्रचार अभियान उसे फायदा देने की जगह नुकसान पहुंचा गया है। केजरीवाल बीजेपी की भारी-भरकम बिग्रेड का बार-बार हवाला देते हुए खुद को अकेला बताते रहे। ऐसे में जनता की केजरीवाल के प्रति सहानुभूति उमड़ी और जिसका नुकसान बीजेपी को उठाना पड़ा।

चुनाव में साइलेंट वोटर बनकर नजर आया गरीब तबका

केजरीवाल ने जिस तरह से दो सौ यूनिट बिजली और महीने में 20 हजार लीटर पानी मुफ्त कर दिया, उससे आम जन और गरीब परिवारों की जेब पर भार कम हुआ। लाभ पाने वाला गरीब तबका चुनाव में साइलेंट वोटर बनकर नजर आया। बिजली कंपनियों के आंकड़ों की बात करें तो एक अगस्त को योजना की घोषणा होने के बाद दिल्ली में कुल 52 लाख 27 हजार 857 घरेलू बिजली कनेक्शन में से 14,64,270 परिवारों का बिजली बिल शून्य आया।

लाभ पाने वाले वोटरों ने निश्चित ही झाड़ू पर बटन दबाया। नागरिकता संशोधन कानून आने के बाद से मुस्लिमों की बड़ी आबादी के मन में डर बैठ गया। कहीं न कहीं मुसलमान उस पार्टी को वोट देना चाहते थे जो बीजेपी को हराने में सक्षम हो। कांग्रेस दिल्ली चुनाव में कहीं नजर नहीं आई, ऐसे में मुसलमानों का अधिकतर वोट आम आदमी पार्टी को गया है।

महिला वोटरों ने निभाई  अपनी निर्णायक भूमिका

दिल्ली में सीलमपुर, ओखला आदि सीटों पर मुस्लिम निर्णायक स्थिति में रहे। ‘आप’ के जीतने की एक वजह यह भी रही कि पार्टी ने जितना महिलाओं पर फोकस किया, उतना बीजेपी ने नहीं किया। केजरीवाल सरकार ने बसों में 30 अक्टूबर को भैयादूज के दिन से मुफ्त सफर की महिलाओं को सौगात दी। एक आंकड़े के मुताबिक प्रतिदिन करीब 13 से 14 लाख महिलाएं दिल्ली में बसों में सफर करती हैं।

ऐसे में महिलाओं को झाड़ू की बटन ही पसंद आनी थी। दिल्ली में स्कूलों की हालत सुधरने के दावे में सबसे ज्यादा लाभ प्राइवेट स्कूलों की फीस पर अंकुश लगाने से गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय जनता को पहुंचना बताया जा रहा है। आम आदमी पार्टी के ही एक सूत्र के मुताबिक दिल्ली में अधिकांश स्कूल कांग्रेस और बीजेपी नेताओं के चलते हैं। ऐसे में केजरीवाल ने फीस पर नकेल कस दी। इसका लाभ गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों को हुआ है। यह वर्ग मतदान में भी बड़ी भूमिका निभाता है।

 

दिल्ली के संदेश

दिल्ली में देश के विभिन्न भागों के लोग रहते हैं। लिहाजा इसे मिनी भारत कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं है। तमाम राजनीतिक पार्टियों को आम आदमी पार्टी की लगातार तीसरी जीत से समझ लेना चाहिए कि देश की जनता के लिए धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों से ज्यादा अहमियत विकास की है। यदि कोई पार्टी विकास की चाहत रखती है तो निश्चित ही जनता उसे विकल्प के रूप में चुनेगी।

कोई भी नेता और पार्टी इस भ्रमजाल में न रहे कि धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों पर जनता को लंबे समय तक बरगलाया जा सकता है, यदि कहीं से भी विकास की थोड़ी सी भी बयार चली तो हर कोई उसे पसंद करेगा। दिल्ली में तो यहां तक कहा जा रहा है कि खुद भारतीय जनता पार्टी के आम कार्यकर्ताओं ने भी आम आदमी पार्टी को इसलिए चुनाव में वोट दिया कि जिन स्कूलों में उनके बच्चे पढ़ रहे हैं या जिन अस्पतालों में वे इलाज को जाते हैं, उनकी दशा सुधरी है।

‘शाहीनबाग’ के बजाए चुनाव पर  भारी ‘विकास’

बिजली और पानी की सुविधा उन्हें मिल रही है।भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव भारी सबक लेने और आत्ममंथन का विषय हैं। उसे सोचना होगा कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा एवं सहयोगी दलों के मुख्यमंत्री दिल्ली में पड़े रहे। करीब 200 सांसदों की भारी- भरकम फौज चुनावी मोर्चे पर डटी रही। फिर भी जनता ने शाहीनबाग के बजाए विकास को प्राथमिकता दी। यानी विकास के विकल्प को चुना है। जाहिर है कि जिस किसी भी राज्य में विकल्प की संभावनाएं दिखेंगी वहां भविष्य में न मोदी मैजिक चलेगा और न ही कोई धार्मिक और भावनात्मक मुद्दा। उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखण्ड जैसे राज्यों में ऐसा हो भी चुका है।

कांग्रेस के लिए भी सबक है कि जिस दिल्ली में कभी उसकी तूती बोला करती थी वहां केजरीवाल का किला क्यों मजबूत होता रहा है। तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों को आम आदमी पार्टी ने संदेश दिया है कि यदि धरातल पर काम दिखें तो जनता को कोई भरमा नहीं सकता है, विकास की राजनीति ही विकल्प दे सकती है।

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