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बेकार फूलों से खड़ी की कंपनी

‘जहां चाह, वहां राह’ को चरितार्थ करने का काम सूरत की 22 वर्षीया मैत्री जरीवाला ने कर दिखाया है। इतनी कम उम्र में ही पेशे से केमिकल इंजीनियर मैत्री ने खराब हो चले फूलों को एकत्रित कर उनसे अगरबत्ती, वर्मीकम्पोस्ट, गुलाल इत्यादि बनाने का व्यापार शुरू किया है। घर से शुरू किए गए इस काम में उन्होंने नौ लोगों को रोजगार उपलब्ध करा मिसाल कायम की है

एक लड़की रोज सुबह उठकर मंदिर जाती है। पूजा करने के लिए नहीं, बल्कि मूर्तियों पर जो फूल चढ़ाने के बाद बेकार हो जाते हैं, जिनको लोग कूड़ेदान में फेंक देते हैं उनको इकट्ठा करने के लिए। वह यह काम पिछले एक वर्ष से कर रही है। आपके मन में यह सवाल भी आ रहा होगा कि वह इन फूलों का क्या करती होगी। इससे उसको क्या फायदा होता होगा। तो जवाब यह है कि इन बेकार फूलों को अपसाइकिल करके साबुन, मोमबत्ती, ठंडई, स्प्रे, अगरबत्ती वर्मीकंपोस्ट सहित 10 से ज्यादा वैराइटी के प्रोडेक्ट बनाती है। इस काम के लिए उसने 9 लोगों को रोजगार भी दे रखा है। इसकी एक साल की कमाई लगभग 10 लाख रुपए हैं और यह सब वह घर से ही करती है।

कचरे से फूल इकट्ठा करती मैत्री

सूरत की रहने वाली 22 वर्षीय मैत्री जरीवाला केमिकल इंजीनियर है। ‘दि संडे पोस्ट’ से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि वह कॉलेज के दिनों से ही वेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। उन्होंने कई तरह के प्रोडक्ट पर रिसर्च किया, उसको बारीकियों से समझा। इसमें उन्हें लगभग तीन वर्ष का समय लगा। तब तक उन्हें हर तरह के प्रोडक्ट की अच्छी समझ हो चुकी थी। फूलों से अपसाइकिल करने का काम उन्होंने अपने कॉलेज के फाइनल ईयर के प्रोजेक्ट के तौर पर चुना था जिसके लिए उन्हें कॉलेज से भरपूर सहयोग के रूप में 77 हजार रुपए का फंड भी मिला। शुरुआत में मैत्री ने मंदिर से कचरे तक जाने वाले फूलों को खुद इकट्ठा कर अलग-अलग प्रोडक्ट बनाना शुरू किया। पहला प्रोडक्ट के रूप में रंग और गुलाल को तैयार करने का था। चूंकि होली का मौका था। इसके लिए सबसे पहले फ्लावर वेस्ट कलेक्ट किया, उन्हें घर लाकर साफ करके सुखाया। इसके बाद इसको ग्राइंड करके पाउडर तैयार किया।

जिससे अलग-अलग फूलों से अलग-अलग रंग और गुलाल तैयार किए गए। क्योंकि समय होली का था जिससे उनका बनाया गुलाल और रंग बाजार में खूब बिका। शुरुआत में उनका यह प्रोडक्ट सूरत और आस-पास के शहरों में उपलब्ध था। फिर भी उनके प्रोडक्ट की सेल अच्छी थी। लेकिन कम जगह उपलब्ध होने पर भी उनका प्रोडक्ट अच्छा बिक रहा था जिससे उनका मनोबल बढ़ा और उन्होंने अपना दायरा बढ़ाना शुरू किया। रंग गुलाल के बाद साबुन, अगरबत्ती, मोमबत्ती, स्प्रे, वर्मीकंपोस्ट जैसे प्रोडक्ट को बनाना शुरू किया। सेल को बढ़ाने एवं अन्य राज्यों में उपलब्धता के लिए शुरुआत में वह कुछ एनजीओ से भी जुड़ी। इसके बाद तो कई कस्टमर्स उनसे जुड़ते गए।

 

 

फूलों से बने प्रोडक्ट की खरीदते लोग

‘दि संडे पोस्ट’ से बातचीत के दौरान मैत्री ने बताया कि उन्होंने 2021 में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना शुरू किया। इंस्टाग्राम और फेसबुक पर फोटो और वीडियो को अपलोड करना शुरू किया। उन वीडियोज को प्रमोट करना शुरू किया। जिससे यह फायदा मिला कि सूरत के बाहर से भी प्रोडक्ट की डिमांड आने लगी। अब उनके पास मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली सहित कई लोग उनके कस्टमर बन गए। अभी उनको लगभग 30-35 ऑर्डर प्रतिदिन मिलते हैं।

कैसे बनता हैं प्रोडक्ट
मैत्री बताती हैं कि मेरे साथ 9 लोगों की टीम है। इसमें ज्यादातर महिलाएं शामिल हैं। जो फ्लावर से वेस्ट प्रोडक्ट बनाने का काम करती हैं। जहां तक रॉ मेटेरियल की बात है इसके लिए हमारे साथ कई एनजीओ जुड़े हैं। कई मंदिरों से हमारा टाइअप है। सूरत नगर निगम भी हमें सपोर्ट करती है। लिहाजा फ्लावर वेस्ट की कमी नहीं होती है।

वेस्ट फ्लावर कलेक्ट करने के बाद महिला कर्मचारी इनमें से उपयोगी फूलों की बारीकी से छंटनी करती हैं। फिर उनकी धुलाई कर सुखाने के बाद मशीन से पीसकर उनके पाउडर की परफ्यूमिंग होती है। उसके बाद ‘नभ अगरबत्ती’ और ‘नभ धूप’ नाम से इन प्रोडक्ट को उन्हीं पूजा स्थलों के साथ ही तीर्थ नगरी की दुकानों, आवासीय परिसरों में बेचा जाता है। बचा हुआ फूलों का कचरा भी इस्तेमाल कर लिया जाता है। उसका वर्मीकम्पोस्ट बनाकर जैविक खेती करने वाले क्षेत्र के किसानों को बेच दिया जाता है।

फूलों को अलग कर इस तरह सुखाया जाता है

लागत और मुनाफे का गणित
अगर छोटे लेवल पर फूलों के वेस्ट से अगरबत्ती, अबीर-गुलाल, साबुन, ठंडई जैसी चीजें आप बनाते हैं तो इसके लिए बहुत ज्यादा बजट की जरूरत नहीं होगी। 50 हजार रुपए से कम लागत में आप इसकी शुरुआत कर सकते हैं, लेकिन अगर आप
प्रोफेशनल लेवल पर यह काम करना चाहते हैं तो कम से कम 2 लाख रुपए की जरूरत होगी, क्योंकि इसमें इस्तेमाल की जाने वाली मशीनें थोड़ी महंगी होती हैं। अगर आप अपने लेवल पर बजट जुटाने में सक्षम नहीं हैं तो किसी इन्क्यूबेशन सेंटर से सपोर्ट ले सकते हैं। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें भी इसको लेकर सपोर्ट करती हैं। जहां तक मार्केटिंग और कमाई की बात है तो पिछले कुछ सालों से ऑर्गेनिक और होममेड प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ी हैं। फूलों के वेस्ट से बने साबुन, शैम्पू, स्प्रे, अगरबत्ती, मोमबत्ती की अच्छी-खासी कीमत मिल जाती है। मैत्री के मुताबिक, अगर सबकुछ ठीक रहा तो कम से कम 10 से 12 लाख रुपए सालाना कमाई की जा सकती है।

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