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4 सितम्बर 1987 जब पति की चिता पर जिंदा जली थी विधवा,32 साल से न्याय का इंतजार 

यह घटना आज की नहीं बल्कि आजादी के 44 साल बाद की है। जब पति के मरने के बाद एक 18 साल की लड़की को जिन्दा जलाकर सती कर दिया गया था। पहले के समय में एक कुप्रथा राजस्थान में थी। जिसके अनुसार जब किसी युवती का पति मर जाता था तो पत्नी को भी उसके साथ सती होना पड़ता था। ऐसा ही कुछ राजस्थान के सीकर जिले के दिवराला गांव में करीब 32 साल पहले हुआ था। जहां रूप कंवर को झूठी शान और मान की वजह से सती कर दिया गया था।

जयपुर की सती निवारण कोर्ट इस मामले पर कल अपना फैसला सुनाने वाली थी, लेकिन फ़िलहाल इस पर सुनवाई टल गई है। जज पुरुषोत्तम लाल सैनी इस मामले से जुड़े 8 आरोपियों को लेकर फैसला सुनाने वाले थे। लेकिन अब सुनवाई टल जाने से फैसला अभी नहीं आ पायेगा । जबकि  इस मामले में 25 लोग पहले बरी हो चुके हैं और कुछ लोगों की ट्रायल के दौरान ही मौत हो चुकी है।

32 साल पहले जब अखबारों ने इस काण्ड के बारे में रिपोर्टिंग की, तो देश भर से उग्र प्रतिक्रिया आने लगी थी। विदेशों में भी इसकी चर्चा होने लगी थी।  तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी अगले महीने कनाडा में आयोजित होने वाले कामनवेल्थ मीटिंग में जाने वाले थे और फिर यहाँ से वे अमेरिका के दौरे पर जाने वाले थे। पूरा काण्ड उनके लिए झकझोर करने वाला था। क्योकि एक तरफ राजीव गांधी  देश को २१वी सदी में ले जाने की बात कर रहे थे, और दुसरी तरफ परंपरा के नाम पर महिलाओं को ज़िंदा जलाया जा रहा था। उन्होंने राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरी देव जोशी को एक्शन लेने के लिए कहा।

लेकिन मुख्यमंत्री राजस्थान की राजनीति में प्रभावशाली और ताकतवर राजपूत जाति को छेड़ने के लिए तैयार नहीं थे।  पुलिस ने इस काण्ड के तीन सप्ताह के बाद कुछ गिरफ्तारियां की। लेकिन लोग इस मामले में गवाही देने के लिए तैयार नहीं थे।  पुलिस के अनुसार गवाह गाँव की उची जातियों के दबाब में आ गये थे।  गवाहों को उसी गाँव में रहना था और राजस्थान में जाति उत्पीडन का लंबा इतिहास रहा है।

गौरतलब है कि जयपुर जिले की रूप कंवर की दिवराला निवासी माल सिंह शेखावत के साथ 1987 में शादी हुई थी। शादी के 7 महीने बाद गंभीर बीमारी की वजह से रूप कुंवर के पति माल सिंह की मौत हो गई थी। बताया जाता है कि पति के निधन के बाद रूप कंवर ने सती होने की इच्छा जताई। लेकिन पुलिस जांच में यह बात सही नहीं बताई जा रही है। उसके बाद 4 सितंबर 1987 को रूप कंवर पति के साथ सती हो गई थी। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों ने रूप कंवर को सती मां का दर्जा दिया और वहां मंदिर बना दिया।

बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं पार्ट- 1

 

रूप कुंवर सती हुई या उसे सती होने को विवश किया गया, ये बहस आज भी जारी है। तब कई तरह की बाते  सामने आई थी।  गाँव वालों और रूप कुंवर के ससुराल वालों के अनुसार रूप कुंवर अपनी इच्छा से सती हुई।  लेकिन पुलिस में दर्ज चार्ज शीट में कहानी कुछ और ही है।  इसके अनुसार रूप कुंवर को अफीम चटाया गया और फिर दो महिलाओं के कंधे पर झूलती हुई उसे लगभग बेहोशी की अवस्था में श्मसान घाट पर लाया गया। चिता की आग की गर्मी से जब रूप कुंवर होश में आई, तो उसने चिता से भागने की कोशिश की थी। लेकिन वहा तलवार भांज रहे राजपूत समुदाय के लोगों ने उसे चिता से उतरने नहीं दिया।  रूप कुंवर की दर्दनाक चीखें उपस्थित जन समूह के नारों और ढोल ताशों की आवाज में दब कर रह गयी थी।  

 

जानकारी के मुताबिक मायके वालों को रूप कुंवर के सती होने की खबर बाद में दी गई थी। मामला सार्वजनिक होने के बाद उस समय इस पर प्रदेशभर में काफी बवाल मचा था। राष्ट्रीय स्तर पर यह मुद्दा गरमाया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी के निर्देश पर पुलिस ने जांच करते हुए 45 लोगों को इस मामले में आरोपी बनाया था। उन सभी पर आरोप था कि वो घटना के समय वहां मौजूद थे और उन्होंने सती माता के जयकारे भी लगाए थे। सबूत न मिलने की वजह से इस केस में 25 लोग रिहा हो चुके हैं। हालांकि और सभी आरोपी जमानत पर जेल से बाहर हैं।

आज रूप कुंवर सती के रूप में स्थापित हो चुकी है। हर साल हजारों की संख्या में लोग उसकी पूजा करने के लिए देओराला जुटते हैं। उन दिनों बहुत तेजी से धार्मिक बिजनस होता है।  इस तरह रूप कुंवर सती काण्ड ने ये साबित कर दिया कि सरकारें समाज की ताकतवर जातियों और परम्पराओं की रक्षा के आगे बेबस हो जाती हैं।  स्त्री अधिकार अक्सरहां परम्पराओं की बलि चढ़ जाता हैं। इस घटना ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के आगे देश का सर शर्म से झुका दिया था।

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