[gtranslate]
Country

3000 सिक्खों का कत्लेआम, 35 साल से न्याय की आस

 

4 नवंबर 1984 का वह काला दिन जो देश के इतिहास में एक दाग बनकर अंकित हो गया है। सन् 1984 के कांग्रेस के शासन में जब सिखों को मौत के घाट उतारा जा रहा था, उनकी दुकानों को आग के हवाले किया जा रहा था, उनके घर लूटे जा रहे थे और उनकी पत्नियों के साथ बलात्कार किया जा रहा था । तब पुलिस और प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की । इसे हर लिहाज़ से घृणित और जघन्य अपराध कहा जाएगा । 1947 – जब से भारत आजाद हुआ- से लेकर आज तक इतनी बडी और भयानक घटना कभी नहीं हुई है ।यहां तक कि मुंबई और गुजरात के दंगे भी सिख विरोधी दंगों की तुलना में कमतर ही ठहरते हैं । इस वर्ष नवंबर में इस नरसंहार के 35 वर्ष पूरे हो जाएंगे । लेकिन कितनी अजीब बात है कि अभी तक बहुत कम लोगों को ही सज़ा मिल पाई है । यह कटु सत्य है कि इस घटना को अंजाम देनेवाले और उनके राजनीतिक संरक्षकों में से 99.9 प्रतिशत सज़ा से साफ बच गए हैं और उन्हें उनके कृत्यों के लिए कभी कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकेगा । तो क्या हमें दिल्ली और देश के दूसरे हिस्से में घटे उस सिख विरोधी दंगे को एक बुरा सपना मानते हुए भूल जाना चाहिए ???

1984 के सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस पार्टी की भूमिका के बारे में भी अक्सर सवाल उठाए जाते रहे हैं। ऐसा इसलिए भी होता हैं कि सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस के कई नेताओं जैसे कमलनाथ, अमिताभ बच्चन, राजीव गांधी, सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर की भूमिका संदिग्ध रही हैं।साल 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और देश के अन्य राज्यों में भड़के सिख विरोधी दंगों में करीब 3000 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। 1984 के सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस पार्टी की भूमिका के बारे में भी अक्सर सवाल उठाए जाते रहे हैं। ऐसा इसलिए भी होता हैं कि सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस के कई नेताओं की भूमिका संदिग्ध रही हैं।

30 अक्टूबर 1984 में भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उन्हीं के अंगरक्षकों द्वारा की गई थी। इसके बाद पूरे देश में सिखों के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। इन दंगों में 3000 से ज़्यादा लोगों की हत्या कर दी गई थी। विकिपीडिया पर मौजूद जानकारी के मुताबिक साल 1984 के दंगों को लेकर सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन (सीबीआई) की राय ये है कि ये सभी हत्याएं दिल्ली पुलिस के अधिकारियों और इंदिरा गांधी के बेटे और बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी की सरकार की मौन सहमति से अंजाम दिए गए थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से सिख दंगों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि ‘जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तब धरती भी हिलती है।

बेनकाब चेहरे है, दाग बडे गहरे है – भाग 3

दरअसल 1984 की सिख विरोधी हिंसा देश के इतिहास में काला अध्याय है। इस हिंसा में देशभर में हजारों सिखों का कत्लेआम हुआ, हजारों मां-बहनों की आबरू से खिलवाड़ किया गया और अरबों रुपये की संपत्ति लूटी गई, लेकिन इसमें शामिल कांग्रेस नेताओं को सरकार लगातार बचाती रही। और तो और तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अमानवीय बयान देकर इस हत्याकांड को सही ठहराने की कोशिश भी की। बहरहाल सिख संगठनों और पीड़ितों को इंसाफ दिलाने की सबसे गंभीर पहल वाजपेयी सरकार ने साल 2000 में शुरू की लेकिन 2004 में कांग्रेस की सरकार बनने के साथ ही ये प्रक्रिया पटरी से उतर गई। नरसंहार के सबसे बड़े गुनहगार सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को कांग्रेस ने 2004 में न केवल सांसद बनाया बल्कि सिखों के जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए टाइटलर को 2005 में मंत्री भी बना दिया गया।

साल 1984 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगे में हजारों सिखों का नरसंहार हुआ। उन्हें जलते टायर का माला पहना कर जिंदा जला दिया गया,कमरे में परिवार समेत बंद कर मिट्टी तेल डाल कर फूंक दिया गया। चार नवबंर 1984 को दिल्ली के महिपालपुर इलाके में दो सिखों की हत्या करने के जुर्म में 34 साल बाद अदालत ने एक अपराधी यशपाल सिंह को समाज के लिए इतना खरनाक माना की उसे मौत की सजा दी है। 34 साल से वो अपराधी समाज में छुट्टा घुम रहा था। अपनी पारिवारिक जिंदगी जी रहा था। अपनी पूरी जवानी काट कर दबा के सहारे जब बुढ़ापे में हांफ रहा था। अदालत ने उसे मौत की सजा दी है। इसी मामले में दुसरे अपराधी नरेश शेहरावत को अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई है। उसे अब अपना पूरा बढ़ापा जेल में काटना होगा। 34 साल में इन दोनो अपराधी ने कभी एक दिन भी जेल में नहीं बिताया। क्योंकि देश की सबसे काबिल दिल्ली पुलिस को इनके खिलाफ कभी कोई सबूत नहीं मिले इस लिए मामला बंद करने की अर्जी पुलिस ने अदाल में 1993 में डाला था जिसे 1994 में अदालत ने स्वीकार कर लिया था। अब उसी मामले में दिल्ली की ही अदालत ने अपराधियों के जुर्म को इतना गंभीर माना है कि उसे मौत की सजा सुना दी है। इसलिए क्योंकि वो समाज के अंदर ही नहीं जेल के अंदर भी दूसरे की जिंदगी के लिए खतरनाक हो सकता है। वही व्यक्ति जो 34 साल से समाज में छुट्टा घुम रहा था।

हमारे संविधान में इस बात की व्याख्या है कि जिंदगी सबसे महत्वपूर्ण है और उसे हर हाल में बचाने का अधिकार कानून की नजर में एक अपराधी को भी है। इसीलिए अदालत के अंदर सिर्फ अपराधी को झूठ बोलने की सजा नहीं दी है। लेकिन जो कानून किसी को अपनी जिंदगी बचाने का अधिकार देता है वही कानून किसी किसी को जिंदगी खत्म करने के पागलपन को मौत की सजा भी तय करता है। इसीलिए ऐसे खुंखार अपराधियों को मौत की सजा का प्रावधान कानून के अंदर है। तो सवाल उठता है कि यदि यशपाल सिंह इतना खुंखार अपराधी था जिसके खिलाफ सबूत इक्कठा करने के लिए अदालत ने एसआईटी टीम की तारीफ की उसके खिलाफ कोई सबूत दिल्ली पुलिस को क्यों नहीं मिला!

सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अंदर एक नवंबर से चार नवंबर 1984 तक तीन हजार सिखों का नरसंहार हुआ। इस मामले में 297 एफआईआर दर्ज किए गए। 34 साल बाद इस मामले पहली बार किसी को सजा हुई। वो भी तब जब मोदी सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने चार साल पहले 84 दंगे के सभी फाईलों की जांच के लिए जस्टिस माथुर कमेटी बनाई। जस्टिस माथुर कमिटी ने कांग्रेस सरकार द्वारा बंद किए 237 केसों का पुनर्वलोकन का फैसला किया था।

दिलचस्प यह है कि दिल्ली पुलिस द्वारा दंगे के महज डेढ़ साल बाद ही 1986 बिना किसी जांच के 186 मामले बंद कर दिए गए थे। जिसमें सज्जन कुमार और एच के एल भगत समेत कांग्रेस के कई नामचीन नेताओं को राहत मिल गई थी। बदलते दौर में कई केस और बंद कर दिए गए और बचे खुचे मामलों की सुनवाई टलती रही। सिर्फ इसलिए क्योंकि अपराधिक मामले जिनके खिलाफ दर्ज किए गए उसमें ज्यादातर कांग्रेस के कद्दावर नेता थे या कार्यकर्ता। इस साढे तीन दशक से ज्यादा के वक्त में भारतीय मीडिया प्रौढ़ हो गई। गुजरात दंगा मामले में खुद जज बनकर कुर्ता फाड़कर फैसला सुनाने वाली, मीडिया डेढ़ दशक तक हल्ला बोलने वाली मीडिया 84 दंगा पीड़ितों के मामले में कलम तोड़ कर चुप्पी लादे रही। हद तो यह है कि इस मामले में न तो पीड़ितों के इंसाफ के लिए मीडिया ने कभी दिलचस्पी रही। न ही अदालत की। लेकिन क्यों ?

You may also like

MERA DDDD DDD DD