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मोदी सरकार ने एक तीर से साधे दो निशाने

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी कानून में किये गए बदलाव को निरस्त करने के लिए कैबिनेट ने संशोधन बिल को मंजूरी दी है। यह बिल संसद के मौजूदा सत्र में ही सदन में भी लाया जाएगा। भाजपा नेतृत्व की केंद्र सरकार ने अपने इस तीर से दो निशाने साधे हैं। एक तो उसने इससे अपने सहयोगी दलों लोकजन शक्ति पार्टी  और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया ( ए ) को खुश कर दिया है वहीं विपक्ष के इस आरोप का भी जवाब दिया है कि भाजपा दलित विरोधी पार्टी है।
दरअसल, देश में दलित वोट बहुत बड़ी संख्या में हैं। इन्हीं वोटों के चलते बसपा सुप्रीमो मायावती को विपक्षी गठबंधन में महत्व दिया जा रहा है। हर राजनीतिक दल की कोशिश रहती है कि इन वोटों को अपने पाले में कर लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी कानून में किये गए बदलाव के बाद से भाजपा के खिलाफ दलित विरोधी होने का माहौल बनने लगा था। आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्षी दल इस मुद्दे पर उसे घेर सकते थे कि कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार कहां सोई रही। भाजपा के सहयोगी दलों के नेता रामविलास पासवान एवं रामदास अठावले यहां तक कि खुद भाजपा के उदित राज जैसे सांसद भी आहत थे। लिहाजा पार्टी ने इसकी काट ढूंढ़ ली।
 दरअसल, इस वक्त विपक्ष 2019 के लिए महागठबंधन बनाने की तैयारियों में है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक विपक्ष एकजुट हो गया तो पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक समीकरणों के बूते एनडीए पर भारी पड़ सकता है। यही वजह है कि भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार उसकी काट के लिए सक्रिय हो गई। इसी का नतीजा है कि केंद्र सरकार के राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाले विधेयक को लोकसभा ने मंजूरी दे दी है और अगले सप्ताह वह राज्यसभा में आएगा। सरकार की कोशिश इसी सत्र में इसे पारित कराने की है, ताकि वह देश भर में पिछड़ों को संदेश दे सके कि भाजपा उनकी सच्ची हितैषी है। अब एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी सरकार कानून बनाकर पटलने की तैयारी में है। कैबिनेट ने इस बारे में विधेयक को मंजूरी दे दी है और मानसून सत्र में इसे पारित भी कर लिया जाएगा।

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