Country Uttarakhand

नगर निकाय चुनाव: थोड़ी ख़ुशी थोड़ा गम 

उत्तराखंड नगर निकाय चुनाव के नतीजे आज सुबह आ गए. नतीजों से भाजपा खासकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राहत की सांस ली तो वहीं कांग्रेस के चेहरे पर भी थोड़ी मुस्कान ला दी. मेयर, नगर पालिका और नगर पंचायत अध्यक्ष पद की 84 सीटों पर देर रात तक मतगणना जारी थी. आज सुबह 83 सीटों के परिणाम जारी कर दिए गए हैं। इसमें 34 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की है। जबकि कांग्रेस के खाते में 25 सीटें आई हैं। 23 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने दमदार जीत हासिल  की. बसपा ने भी एक सीट पर कब्जा किया। लेकिन आप, सपा और क्षेत्रीय पार्टी उक्रांद का सूपड़ा साफ हो गया। इनका खाता भी नहीं खुला.

कुल आठ नगर निगम में से सात में मेयर का चुनाव हुआ. रुड़की निगम का चुनाव नहीं हुआ है. मेयर की 7 सीटों में से पांच पर बीजेपी ने कब्जा किया है. दो सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की. देहरादून, हरिद्वार, काशीपुर, ऋषिकेश, रुद्रपुर, कोटद्वार और हल्द्वानी सीटों में से देहरादून, ऋषिकेश, काशीपुर, रुद्रपुर और हल्द्वानी में भाजपा ने परचम लहराया। पहली बार अस्तित्व में आए कोटद्वार नगर निगम में कांग्रेस की हेमलता नेगी पहली मेयर चुनी गई हैं। वहीं हरिद्वार में भी कांग्रेस ने जीत हासिल की है। हरिद्वार निगम को कांग्रेस ने भाजपा से छीन लिया है.

निकाय चुनाव के नतीजों ने बेशक मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को राहत दी है. मगर भाजपा को कहीं न कहीं झटका भी लगा है. इसकी बड़ी वजह यह है कि प्रदेश सरकार हमेशा डबल इंजन की बात करती है इसके बावजूद हरिद्वार जैसे महत्वपूर्ण निगम सीट कांग्रेस ने भाजपा की झोली से निकल लिया. पार्टी केवल अपनी साख बचाने में कामयाब हुई है। सात नगर निगमों में से दो हरिद्वार और कोटद्वार में हारने से भाजपा की चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े हो गए हैं। पालिका और नगर पंचायत में भाजपा बेशक कांग्रेस ने ज्यादा सीट जीती पर यहां निर्दलीय ने पार्टी को तगड़ा झटका दिया है. निर्दलीय भाजपा-कांग्रेस से लगभग बराबर सीट अपने कब्जे में किए है. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले निकायों में बड़ी जीत की उम्मीद को लगा झटका पार्टी के लिए सबक है।

विधानसभा चुनाव में हाशिये पर आई कांग्रेस को निकायों के नतीजे राहत देते दिख रहे हैं। पार्टी ने अपना प्रदर्शन सुधारा है। पार्टी प्रदेश नेतृत्व को ये नतीजे नई ऊर्जा देेंगे। हालांकि यह नई ऊर्जा पार्टी को एकजुट कर पाती है या नहीं यह भी अब देखना कम दिलचस्प नहीं होगा. क्योंकि चुनाव के दौरान प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता गुटबाजी के खेल खेल रहे थे. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने शहरी वोट बैंक के बीच उपस्थिति दर्ज करवा कर सत्ताधारी भाजपा की चिंताएं बढ़ा दी हैं। पार्टी को यदि लोकसभा चुनाव में चुनौती देना है तो उनके बड़े नेताओं को पहले संगठित होना होगा.
शहरी निकाय चुनाव के इस नतीजे ने प्रदेश की राजनीती को एक बार फिर साफ सन्देश दिया है कि यहां भाजपा और कांग्रेस के मुकाबले कोई तीसरा विकल्प जनता को नहीं मिला है. उक्रांद, आम आदमी पार्टी, बसपा और सपा की उपस्थिति बेहद कमजोर रही। प्रदेश की सियासत में तीसरे विकल्प या मोर्चे की संभावनाओं के लिए नतीजे बड़ा झटका हैं। छोटे दलों को अपनी रणनीति में सुधार करना होगा।

निकाय चुनाव में हर बार की तरह इस बार भी निर्दलियों का प्रदर्शन बेहतर रहा। जनता ने कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के तौर पर अन्य दल की जगह निर्दलियों को चुना। पार्षदों के चुनाव में उनका प्रदर्शन बेहद जोरदार रहा। इससे साफ है कि मेयर और अध्यक्ष कोई भी हो, लेकिन बोर्ड में उनका भी दबदबा रहेगा।

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