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क्या अंबेडकर प्रेम से दलितों के दिल में जगह बना पाएंगे अखिलेश?

आजकल उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के स्वर दलितों के प्रति नरम हो गए हैं। जाहिर है कि यह 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पूर्व दलितों को अपनी ओर आकर्षित करने की रणनीति के तहत हो रहा है। इसमें भीमराव अंबेडकर को समाजवादियों का आदर्श बताना तथा वाराणसी में संत रविदास के दर पर मत्था टेकना आदि शामिल है। यही नहीं बल्कि अखिलेश यादव द्वारा अपने होर्डिंग में भीमराव अंबेडकर की तस्वीर को लगाना यह इशारा कर रहा है कि वह दलित वोट बैंक को अपने साथ हर हाल में जोड़ने की कोशिशें तेज कर चुके हैं।
पिछले दिनों अंबेडकर जयंती पर ‘दलित दीपावली’ मनाने के बाद अखिलेश यादव ने अब बाबा साहेब वाहिनी बनाने का ऐलान कर दिया है। बाबा साहेब वाहिनी लोहिया वाहिनी की तर्ज पर बनेगी। जिसमें दलितों को पार्टी से जोड़ने की मुहिम शुरू की जाएगी। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाजवादी पार्टी से दलित वोट खिसका है। जिसको आकर्षित करने के लिए कांग्रेस और सत्तासीन पार्टी भाजपा के साथ ही चंद्रशेखर रावण की बहुजन आजाद पार्टी भी कोशिशों में जुटी हुई है। इसी दौरान अखिलेश यादव ने बाबा साहेब वाहिनी की घोषणा करके दलितों को अपनी पार्टी से जोड़ने की मुहिम शुरू कर दी है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में दलित 22 प्रतिशत हैं। दलितों पर अब तक मायावती का एकछत्र राज रहता आया है। तभी इसे बसपा का वोट बैंक कहा जाता है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में दलितों का कुछ मत प्रतिशत भाजपा की तरफ भी झुका है।
सूबे का 22 प्रतिशत दलित समाज दो हिस्सों में बंटा है। जिनमें एक  जाटव हैं जिनकी आबादी करीब 12 प्रतिशत है। जबकि दूसरा गैर जाटव दलित है। जाटव वोट पर फिलहाल भीम आर्मी के प्रमुख और बहुजन आज़ाद पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद रावण की नजर पहले से है।
 जानकारी के अनुसार यूपी में गैर-जाटव दलित वोटों की संख्या करीब 10 प्रतिशत है। इनमें 50-60 जातियां और उप-जातियां बताई जाती हैं। राजनीति के जानकारों का कहना है कि यह वोट विभाजित होता है। पिछले कुछ वर्षों के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में देखा गया है कि गैर- जाटव दलितों का उत्तर प्रदेश में मायावती से मोहभंग हुआ है।
ऐसा नहीं है कि दलितों को अपने राजनीतिक जहाज पर सवार करने के लिए सिर्फ समाजवादी पार्टी ही जुटी हुई है बल्कि कांग्रेस भी इसमें पीछे नहीं है । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस  की कमान प्रियंका गांधी के हाथों में आने के बाद से ही वह अपने पुराने दलित वोट बैंक को फिर से पार्टी से जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही हैं। इसके चलते ही दलितों के मुद्दे पर कांग्रेस और प्रियंका गांधी लगातार सक्रिय हैं। पिछले साल हाथरस कांड पर प्रियंका गांधी ने सत्तारूढ़ भाजपा पर जमकर वार किए थे। यही नहीं बल्कि प्रियंका गांधी राहुल गांधी के साथ पीड़ित परिवार से मिलने भी पहुंची थी।
उत्तर प्रदेश में भाजपा को शिकस्त देने के लिए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार कोशिशों में जुटे रहते हैं । वह कभी कांग्रेस के साथ गठबंधन करते हैं तो कभी बसपा के साथ। लेकिन भाजपा को वह शिकस्त देने में कामयाब नहीं हो पाए। 2019 में उन्होंने मायावती के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा था। तब कहा जाने लगा था कि 2022 में सपा और बसपा मिलकर यूपी का विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। लेकिन कुछ दिनों बाद ही यह गठबंधन टूट गया। हालांकि इस गठबंधन के जरिए सियासी फायदे में बसपा ही रही थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी सिर्फ 5 ही सीट जीत पाई थी। जबकि बसपा 10 सीटों पर विजयी रही थी।
इस बार समाजवादी पार्टी ने अकेले अपने दम पर ही 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर ली है। जिसमें वह दलितों को अपनी ओर खींचने के लिए पूरी कोशिशों में जुट गई है। अखिलेश के लिए मिशन 2022 में सफल होने के लिए दलितों को अपनी पार्टी में जुटाना जरूरी हो गया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति फिलहाल वैसे भी ब्राह्मणों और दलितों पर आकर टिक गई है। बहरहाल, देखना यह है कि अंबेडकर प्रेम के बहाने अखिलेश यादव दलितों के दिल में कितनी जगह बना पाएंगे ?

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