[gtranslate]
Country

कैथोलिक देश ने बदला कानून

दुनिया भर में उत्तरी आयरलैंड के गर्भपात कानून सबसे  अधिक कड़े माने जाते रहे हैं, लेकिन अब जनता की मांग के आगे यहां की सरकार को भी इन कड़े कानूनों में संशोधन के लिए विवश होना पड़ा है। पूर्व में संशोधन की मांग को लेकर हजारों की संख्या में लोग राजधानी बेलफास्ट की सड़कों पर उतर आए थे। इसके बाद सरकार को झुकना पड़ा। अब देश में समलैंगिक विवाह और गर्भपात को कानूनी वैधता मिल गई है। सरकार ने उदार रवैया अपनाते हुए कहा कि अब समलैंगिक विवाह और गर्भपात वैध होगा। हालांकि डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी (डीयूपी) के नेताओं ने संशोधित कानून को पास होने से रोकने की कोशिश भी की। लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली।
गौरतलब है कि वर्ष 2018 में उत्तरी आयरलैंड में भारतीय मूल की 31 वर्षीय भारतीय सविता हलप्पनवार के पिता ने संतोष जताया है। उन्होंने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि सविता को न्याय मिला। 31 वर्षीय दंत चिकित्सक सविता हल्लपनवार की मौत हो गई थी। आयरलैंड में गर्भपात की इजाजत न होने के चलते इमरजेंसी के बावजूद सविता का अबार्शन नहीं किया गया और उसकी मौत हो गई। इसके बाद आयरलैंड में गर्भपात पर रोक के कड़े कानून के खिलाफ आवाज तेज हो गई थी। जल्द ही इसने जन आंदोलन का रूप ले लिया।
कड़े कानून में संशोधन के बाद सविता के पिता अंदनप्पा यालंगी ने कहा, ‘हम बहुत खुश हैं। सविता को न्याय मिला है। जो सविता के साथ हुआ, अब किसी और परिवार के साथ नहीं होगा। इस ऐतिहासिक लम्हे पर आयरलैंड के लोगों का शुक्रिया करने के लिए मेरे पास  शब्द नहीं हैं।’ वहीं, इस कानून को हटाने के प्रबल समर्थक और भारतीय मूल के प्रथानमंत्री लियो वराडकर ने जनमत संग्रह के नतीजों को आयरलैंड के लिए ऐतिहासिक बताया। उन्होंने डबलिन कैसल में लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ‘यह परिणाम दर्शाता है कि आयरलैंड की जनता महिलाओं को अपने फैसले खुद लेने का विकल्प देने पर भरोसा करती है। उनका सम्मान करती है।’
संविधान में ऐतिहासिक आठवें संशोधन के लिए हुए जनमत संग्रह में 66 फीसदी से ज्यादा लोगों ने इस कानून को हटाने के पक्ष में मत दिया। इससे एक नया कानून बनाने का रास्ता साफ हो गया, जिससे कैथोलिक देश में गर्भपात पर लगी रोक हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। सविता हलप्पनवार की मौत ने गर्भपात से जुड़े कानून पर आयरलैंड में कुछ ऐसी बहस शुरू की कि अब वहां सांसदों ने पहली बार ये कघनून बदलने के पक्ष में मतदान किया है। गर्भपात को वैधानिक दर्जा देने वाला कानून कुछ शर्तों के साथ पारित कर दिया गया है। मतदान के दौरान 127 सांसद इसके पक्ष में थे, जबकि 31 सांसदों ने गर्भपात को कानूनी बनाने का विरोध किया। ज्यादातर सांसदों ने इस बात पर सहमति जताई कि अगर डाॅक्टर को ऐसा लगता है कि गर्भपात न कराने से गर्भवती महिला की जान जा सकती है, तो ऐसी स्थिति में गर्भपात की अनुमति दी जानी चाहिए।
दरअसल, आयरलैंड एक कैथोलिक देश है जहां अब तक गर्भपात कानूनन एक जुर्म था। लेकिन सविता हलप्पनवार के गर्भ गिरने यानी मिसकैरेज से हुई मौत के बाद वहां गर्भपात से जुड़े कानून को लेकर बहस छिड़ गई थी। सविता पिछले साल अक्टूबर में अस्पताल में भर्ती हुई थी, जहां उसका गर्भ गिर गया था। इसके एक हफ्ते बाद सेप्टिसेमिया के कारण उनकी मौत हो गई थी। उनके पति ने अस्पताल पर आरोप लगाया कि अस्पताल ने उनकी पत्नी की गर्भपात की दरख्वास्त पर कोई सुनवाई नहीं की। मामले में जांच हुई, तो सामने आया कि उन्हें गर्भपात की इजाजत इसलिए नहीं दी गई, क्योंकि उनकी जान को खतरा नहीं था। लेकिन जब तक डाॅक्टरों को ये बात समझ में आई कि उनकी जान को वाकई खतरा है, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सविता के पति का कहना है कि अगर गर्भपात समय रहते करवा लिया गया होता, तो उनकी पत्नी की जान बच सकती थी।
इस हादसे के बाद भारत के साथ-साथ दुनिया भर में आयरलैंड के गर्भपात-विरोधी कानून को लेकर बहस छिड़ गई थी।इस कानून के पक्ष में हुई वोटिंग पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताते हुए कहा है कि इससे गर्भपात के चलन में तेजी आ सकती है। हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि ये विधेयक अब भी कमजोर है क्योंकि इसमें बलात्कार के कारण हुए गर्भ के मुद्दे को संबोधित नहीं किया गया है। साथ ही इस विधेयक में उस स्थिति में भी गर्भपात की इजाजत नहीं दी गई है, जिसमें कि गर्भाशय के बाहर भी बचने की संभावना नहीं होती।
गर्भपात का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस कानून के पारित हो जाने से आयरलैंड में पहली बार ऐसा होगा कि लोग जानबूझ कर गर्भ में बच्चा गिरवाने की कोशिश करेंगे। कार्यकर्ताओं के लिए ये केवल एक धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानवाधिकारों से जुड़ा मुद्दा भी है, क्योंकि उन्हें लगता है कि गर्भवती मां के साथ-साथ उनके गर्भ में पल रहे बच्चे का भी समान अधिकार होता है। हालांकि गर्भपात का समर्थन करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह विधेयक अब भी इस बात को नजरअंदाज करता है कि हर दिन 11 महिलाएं गर्भपात के लिए आयरलैंड छोड़कर ब्रिटेन जाती हैं।
वर्ष 1992 में एक 14 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार किया गया था, जिसके बाद वो गर्भवती हो गई थी। वह गर्भपात करवाना चाहती थी लेकिन उसे आयरलैंड छोड़ कर ब्रिटेन जाने की इजाजत नहीं दी गई थी। तनाव में आकर बच्ची ने आत्महत्या करने की कोशिश की, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर गर्भ से महिला की जान को खतरा हो, तो उसे गर्भपात करवाने का संवैधानिक अधिकार दिया जाएगा। हालांकि स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को इस आदेश में संबोधित नहीं किया गया था। तब से आत्महत्या के खतरे को गर्भपात के लिए एक वैध कारण माना जाता है। लेकिन अब अगर डाॅक्टर को लगता है कि गर्भपात न करवाने से महिला के स्वास्थ्य को खघ्तरा है, तो वे कानूनी कार्रवाई के डर के बिना ही ये फैसला ले सकेंगे कि गर्भपात किया जाए या नहीं।

You may also like

MERA DDDD DDD DD