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अफस्पा से नागालैंड को मिल सकती है राहत

नगालैंड में सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम यानी अफस्पा को हटाने पर सरकार विचार कर रही है। केंद्र सरकार ने 45 दिनों में फैसला लेने की बात कही है। इसके लिए केंद्र ने एक समिति बनाई है। पांच सदस्यों वाली यह समिति इस कानून को लेकर विचार-विमर्श करेगी। ज्ञात हो कि इसी महीने 4-5 दिसंबर को नगालैंड के मोन जिले में सीमा सुरक्षा बलों की गोली से 14 आम नागरिक मारे गए थे। इस घटना के बाद अफस्पा को हटाने की मांग तेज हो गई है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, इसकी अध्यक्षता गृह मंत्रालय के सचिव स्तर के अधिकारी विवेक जोशी कर रहे हैं। इस समिति में नगालैंड के मुख्य सचिव और डीजीपी सदस्य होंगे। इसमें असम रायफल्स के आईजी (उत्तरी) और सीआरपीएफ के एक प्रतिनिधि भी सदस्य होंगे। 45 दिनों के भीतर इन सदस्यों देने को कहा गया है।

देश में युद्ध जैसी स्थिति बनने, अशांत क्षेत्रों में शांति व कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए किसी समय या विशेष क्षेत्र में अफस्पा लगाया जाता है। इसके तहत सुरक्षा बलों को विशेष शक्तियां का अपनी है। 1958 में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अध्यादेश के तौर पर संसद के दोनों सदनों से यह पास हुआ था। इसी वर्ष संसद ने इसे कानून के तौर पर पारित कर दिया। इसके तहत सेना पांच या इससे ज्यादा लोगों को एक जगह इकट्ठा होने से रोक सकती है। इसे यह कानून सेना को चेतावनी देकर गोली मारने का भी अधिकार देता है। यह कानून सेना को बिना वारंट के किसी को भी गिरफ्तार करने की ताकत देता है। इसके तहत सेना किसी के घर में बिना वारंट के घुसकर तलाशी भी ले सकती है।

अफस्पा कानून 1958 – मणिपुर और असम में लागू किया गया था। वर्ष 1972 में असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड में लागू किया गया। वहीं वर्ष 1983 में पंजाब एवं चंडीगढ़, 1990 में जम्मू-कश्मीर में लागू किया गया। हालांकि बाद में समय-समय पर कई इलाकों से इसे हटा भी दिया गया। फिलहाल, ये कानून जम्मू-कश्मीर, नगालैंड, मणिपुर (राजधानी इम्फाल के 7 क्षेत्रों को छोड़कर), असम और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में लागू है। त्रिपुरा, मिजोरम और मेघालय से इसे हटा दिया गया है।

कई बार सुरक्षा बलों पर इस कानून का दुरुपयोग करने का आरोप लग चुका है। ये आरोप फर्जी एनकाउंटर, यौन उत्पीड़न आदि के मामले को लेकर लगे हैं। यह कानून मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है। इस कानून की तुलना अंग्रेजों के समय के ‘रौलट ऐक्ट’ से की जाती है। क्योंकि, इसमें भी किसी को केवल शक के आधार पर गिरफ्तार किया जा सकता है। यही कारण है कि इस कानून को हटाने की मांग तमाम एनजीओ और सामाजिक कार्यकर्ता करते रहते हैं।

बड़ी घटनाएं जिसके बाद अफस्पा हटाने की मांग तेज हुई
नवंबर 2000ः मणिपुर में नवंबर 2000 में असम राइफल्स के जवानों पर 10 निर्दाेष लोगों को मारने का आरोप लगा था। उस दौरान कानून को खत्म करने की मांग को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला अनशन पर बैठी थी। तब अफस्पा कानून को हटाने की मांग तेज हुई। 10 जुलाई 2004 रू आरोप है कि थंगजाम मनोरमा नाम की मणिपुरी महिला को असम राइफल्स ने उसके घर से पकड़ा था। अगली सुबह उसे गोलियों से भून दिया गया। उनका मृत शरीर एक खेत में पाइ गई थी। पोस्टमार्टम में मरने से पहले बलात्कार किए जाने की बात सामने आई थी।

अफस्पा को लेकर प्रदर्शन
मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता शर्मिला इरोम पूर्वाेत्तर राज्यों में लागू सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम (अफस्पा) को हटाने के लिए लगभग 16 वर्षों (4 नवंबर 2000 से 9 अगस्त 2016 तक) तक भूख हड़ताल पर रहीं। जुलाई 2016 को उन्होंने अचानक घोषणा की कि वे शीघ्र ही अपना अनशन समाप्त कर देंगी। उन्होंने अपने इस निर्णय का कारण आम जनता की उनके संघर्ष के प्रति बेरुखी को बताया।

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