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भारत छह सितंबर 2018 के दिन को लंबे समय तक याद रखेगा। खासकर एलजीबीटीक्यूआई (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, क्वर, इंटरसेक्स) के लोग। इस दिन सिर्फ आधे घंटे की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 को गलत ठहरा दिया। मतलब वयस्क और आपसी सहमति से ऐसे संबंध रखना अब अपराध नहीं होगा। इस फैसले के बाद एलजीबीटीक्यूआई के लोगों में खुशी है। वे जश्न मना रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने 157 साल पुराने कानून को पलट दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारत समलैंगिकता को अपराध से बाहर करने वाले 124 देशों के समूह में शामिल हो गया है। हालांकि अभी भी 72 देशों में यह अपराध है। लेकिन भारत में समलैंगिकता को केवल एक सामान्य मानव स्वभाव माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन पैनल कोड की धारा 377 को उस स्तर तक अंसवैधानिक करार दिया है जहां पर दो वयस्क लोगों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों को आपराधिक कृत्य माना जाता था। अदालत ने ये साफ कर दिया है कि बिना सहमति यानी कि जबरन अप्राकृतिक सेक्स, बच्चों और पशुओं के साथ यौनाचार करने को अभी भी धारा 377 के तहत अपराध माना जाएगा।
इस पर फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि ‘मैं जो हूं वो हूं, इसलिए मैं जैसा हूं मुझे वैसा ही स्वीकार करिए। पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले में अपना फैसला सुनाया है। इस पीठ में जस्टिस मिश्रा के साथ-साथ जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस फली नरीमन, जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा शामिल थे। पांचों जजों ने एकमत से धारा 377 के लगभग डेढ़ सौ सालों से ज्यादा से चले आ रहे कानून को पलट दिया।
जस्टिस नरीमन ने तो अपने फैसले में ये तक कह दिया कि हमारे भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का वर्णन करने का मकसद ही ये रहा है कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आजादी और प्रतिष्ठा एक बहुसंख्यक सरकार की पहुंच से दूर रहे। ये इस तरह से है कि संवैधानिक नैतिकता ये सुनिश्चित करे कि सभी के अधिकारों की रक्षा हो सके जिसमें अलग और एकांत में रहने वाले अल्पसंख्यक भी शामिल हैं। जस्टिस नरीमन ने कहा कि ये मौलिक अधिकार चुनावों के परिणाम से जुड़े हुए नहीं होने चाहिए।
जस्टिस चंद्रचूड़ के मुताबिक, ये इस कदर प्रजातांत्रिक है कि हमारा संविधान अनुकूलता की मांग नहीं करता और न ही संस्कृति की मुख्यधारा पर चिंतन करता है। धारा 377, दो वयस्कों के बीच सहमति के साथ बनाए गए सेक्स संबंधों के लिए उन्हें डराता है और शर्मिंदा करता है। जो लोग सहमति के साथ एनल और ओरल सेक्स करते हैं और स्वास्थ्य संबंधी सलाह चाहते हैं उन पर आपराधिक मामला दायर होने का खतरा बना रहता है। चंद्रचूड़ कहते हैं कि इस वजह से वे लोग स्वास्थ्य के मोर्चे पर कमजोर रहते हैं और उन पर बीमारियों का खतरा बना रहता है। ऐसे में अन्य समुदायों की तुलना में खासकर सेक्सुअल और जेंडर माइनॉरिटीज के बीच स्वास्थ्य समस्याएं ज्यादा उत्पन्न होती हैं।
जजों का मानना है कि इस समुदाय को भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 (कानून की नजर में समानता का अधिकार), 15 भेदभाव निषेध), 19 (बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी) और 21 (जीवन का अधिकार) के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों से इन्हें वंचित रखा गया। यह समुदाय एक साफ-सुथरे और अच्छे जीवन की उम्मीद रखते हैं और वो एक अपराधी की तरह गिरफ्तार होने की छाया से भी दूर रहना चाहते हैं।
जजों ने इसकी सुनवाई के दौरान इंडियन सायकेट्री सोसायटी (आईपीएस) के द्वारा जारी किए गए बयान का भी अध्ययन किया। आईपीएस के बयान में कहा गया था कि ‘इंडियन सायकेट्री सोसायटी इस बात को सामने रखना चाहती है कि हमें इस बात का कोई सुबूत नहीं मिला है जिससे कि ये सबित हो सके कि समलैंगिकता एक मानसिक रोग या बीमारी है।’
वर्तमान में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, विश्व स्वास्थ्य संगठन के पदचिह्नों पर चलते हुए बीमारियों के वर्गीकरण में समलैंगिकता को एफ-66 के अंतर्गत मानसिक रोगों की श्रेणी में रखती है। एफ-66 रोगों के अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण-10 की श्रेणी में आता है। वर्गीकरण के मुताबिक एक रोगी जिसकी पहचान एलजीबीटीक्यूआई समुदाय से होती है, वो पहचान के संकट से गुजर रहे हैं ऐसे में उस रोगी को इलाज की जरूरत है।
1990 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने वर्गीकरण में सुधार किया था और उसके अंतर्गत समलैंगिकता को मानसिक बीमारियों की उस श्रेणी से निकाल दिया था जिसके लिए जांच की आवश्यकता होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उस समय कहा कि केवल अलग सेक्सुअल ओरियंटेशन को गड़बड़ी की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। लेकिन इसके बाद भी समलैंगिकता आज भी एफ-66 के अंर्तगत शामिल है।
डब्लूएचओ का कहना है कि समलैंगिकता को अभी भी सायकेट्री डायग्नोसिस की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है लेकिन केवल तब-जब संबंधित व्यक्ति इसको लेकर परेशान हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन में किसी ने स्पष्ट किया कि क्यों समलैंगिकता को आईसीडी-10 की सूची में शामिल किया गया है। उस व्यक्ति ने जो कारण बताए हैं उसमें से एक कारण ये गिनाया है कि विश्व के कुछ हिस्सों में समलैंगिक संबंधों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है और ये कड़ी सजा, सजा ए मौत की है। ऐसे मामलों में रोग को मानसिक बीमारी की तरह मानकर उसका इलाज किया जाता है जिससे कि उन लोगों को उससे मदद भी मिलती है।
इस दृष्टिकोण के अंतर्गत भारत में कन्वर्जन थेरेपी को मंजूरी मिली हुई है। इस थेरेपी के सहारे क्वीयर को हेट्रोसेक्सुअल्स में बदलने के लिए इलेक्ट्रो कंवल्सिव थेरेपी या हारमोन थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। वैसे आईसीडी-11 के लिए पुनर्मूल्यांकन 2022 में निर्धारित किया गया है। इसमें सिफारिश की गई है कि इस सूची से समलैंगिकता को पूरी तरह से हटा ही दिया जाए। देश के सर्वोच्च न्यायालय के जजों ने धारा 377 और धारा 375 की भाषा में जबरदस्त अंतर की भी समीक्षा की। धारा 375 महिलाओं के बलात्कार से संबंधित है जिसके अंतर्गत वेजाइनल, एनल और ओरल पेनीट्रेशन किया जाता है। ये कानूनी रूप से अरक्षणीय है।
‘प्रकृति के नियम के खिलाफ जाकर शारीरिक संभोग करने वाले’ विचार का मूल्यांकन करते हुए इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट और देश के कई हाईकोर्टों ने इस पर सहमति जताई है। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने माना है कि इस विषय में उनके द्वारा दिया गया विवरण स्प्ष्ट नहीं है और ये कोर्ट के हालिया दिए गए फैसले के खांचे में फिट नहीं बैठता है। यहां पर उनका संदर्भ खास करके 2014 के एनएएलएसए केस से था जहां पर कोर्ट ट्रांसजेंडर्स की पहचान के बारे में विचार कर रहा था। इसके अलावा 2017 के राइट टू प्राइवेसी के जजमेंट और अन्य फैसलों के संदर्भ में भी ये बात कही गयी है।
बीमारी है यह
वर्ष 1861 में लॉर्ड मैकाले ने इंडियन पैनल कोड ड्राफ्ट करते समय धारा 377 के तहत समलैंगिक रिश्तों को अपराध की कैटेगरी में रखा था। एलजीबीटी समुदाय के लिए आईपीसी की धारा 377 गैर जमानती अपराध थी। इस धारा के तहत 10 साल या फिर उम्र कैद की सजा का प्रावधान था। वर्ष 1960 में ब्रिटेन ने समलैंगिकता वाले विक्टोरियन कानून को रद्द कर दिया। अमेरिका में भी कई राज्यों में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से निकाल कर इनके विवाह को कई प्रांतों में कानूनी मान्यता दी। जहां दुनिया के कई देशों में समलैंगिक सेक्स को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया तो वहीं ईरान-इराक, सऊदी अरब, सूडान, सोमालिया, नाइजीरिया और यमन जैसे देशों में समलैंगिक रिश्तों पर आज भी मौत की सजा का प्रावधान है। पहली बार वर्ष 1994 में धारा 377 को कोर्ट में चुनौती दी गई थी। उसके बाद इस पर कानूनी लड़ाई।
‘यह अधूरी जीत है’
हमसफर ट्रस्ट के सह-संस्थापक और धारा 377 की लड़ाई लड़ने वाले अशोक राव कवि से बातचीत
सुप्रीम कोर्ट ने धारा वयस्क और आपसी सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध से बाहर कर दिया है। क्या यह आपकी पूरी जीत है?
नहीं, यह जीत अधूरी है। कानूनी लड़ाई अभी आगे और चलेगी। अब शादी, विरासत, यौन शिक्षा, समलैंगिकों के मानसिक और यौन स्वास्थ्य के लिए लड़ना है। स्कूलों में सेक्स एजुकेशन है ही नहीं। जो बच्चे स्त्रैण हैं, उनको स्कूल में परेशान किया जाता है। गांवों में रहने वाले ऐसे बच्चे तो मुंबई जैसे महानगरों में भाग जाते हैं। इसलिए कई मसले हैं। लड़ाई लंबी है। इसे लड़ना है। हां, सुप्रीम कोर्ट ने हमारे चेहरे पर खुशी जरूर दी है।
अगली लड़ाई आज से शुरू हो गई या अभी होगी?
धारा 377 के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने में हमारी सारी ऊर्जा और संसाधन खर्च हो गए। सुप्रीम कोर्ट से मिली जीत के बाद सब जश्न मना रहे हैं। आगे की लड़ाई के लिए हमें फिर से बैठकर रणनीति तैयार करनी होगी।
अब यह अपराध नहीं रहा तो क्या आगे की लड़ाई आसान होगी?
आगे का रास्ता आसान नहीं है। यहां शादियों में धर्म की भूमिका बहुत बड़ी है, क्योंकि शादी धर्मों के अपने कानूनों के अनुसार होती है। जिसके मुताबिक शादी तो सिर्फ एक आदमी और एक औरत के बीच हो सकती है।
चर्च और कुरान दोनों समलैंगिक विवाह को पाप मानते हैं, तो क्या अब किसी ‘स्पेशल मैरिज ऐक्ट’ की भी आप लोग मांग करेंगे? 
सिर्फ शादी क्यों बच्चों का भी अधिकार लेना है। मुस्लिम शरिया गोद लेने को मान्यता ही नहीं देता है। मान लीजिए कि किसी मुस्लिम समलैंगिक जोड़े ने किसी बच्चे को गोद लेना चाहा तो शरिया कानून के तहत उस बच्चे की कोई पहचान नहीं होगी। इसलिए मैंने कहा लड़ाई उतनी आसान नहीं है।

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