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देश-दुनिया 
 
जातीय राजनीति पर अंकुश

भारतीय राजनीति में कई गहरे दाग हैं जिनमें राजनीति का अपराधीकरण और जातिगत राजनीति प्रमुख है। बीते सप्ताह न्यायालय ने तवज्जो देते हुए जातिगत रैली मामले में हस्तक्षेप किया है। इस हस्तक्षेप को कुछ लोग भले ही न्यायपालिका का विधायिका के क्षेत्र में अतिक्रमण मान रहे हैं मगर यह देश और जनहित में है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश में हो रही ताबड़तोड़ जातिगत रैलियों पर रोक लगी है जिसके सहारे समाज बांटकर वोट बटोरने का गंदा खेल खेला जाता रहा है।

 

राजनीति को अपराधियों से मुक्त करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों विधायकों को संरक्षण देने वाले कानूनी प्रावधान धारा ८(४ को भी निरस्त कर दिया है। अब अपराधी छवि के राजनेता जेल या हिरासत के दौरान चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। साथ ही एक अन्य फैसले के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राजनीतिक दलों द्वारा प्रदेश में आयोजित होने वाली जातिगत सम्मेलनों पर रोक लगा कर प्रदेश के सभी मुख्य दलों (सपा बसपा और भाजपा कांग्रेस को नोटिस जारी कर दिए है।

 

गौरतलब है कि २०१४ में होने वाले आम चुनावों की तैयारियों में जुटी प्रदेश की स्थानीय पार्टियां सपा-बसपा जाति आधारित सम्मेलन का आयोजन करने में जुटी हुई हैं। बहुजन समाज पार्टी प्रदेश में अभी तक भाईचारा सम्मेलन के नाम से २१ ब्राह्मण और १७ दलित उम्मीदवारों के इलाकों में सम्मेलन कर चुकी है। मायावती की मौजूदगी में लखनऊ में हुए सम्मेलन से यह दौर थमा। वहीं सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी लखनऊ में अति-पिछड़ा सम्मेलन कर चुकी है जिसमें १७ जातियों को दलितों के समान अधिकार देने की पैरवी की गई थी। इसके अलावा सपा ने परशुराम जयंती पर मुख्यालय पर ब्राह्मण जुटाए थे फिर ब्राह्मण सम्मेलन किया था। 

 

प्रदेश में पिछड़ा वर्ग सम्मेलन भी किए जा रहे हैं। भाजपा भी पिछड़ा सम्मेलन कर चुकी है। यही नहीं प्रदेश में वैश्य सम्मेलन और कुशवाहा सम्मेलन भी हो चुके हैं। कायस्थ सभा ब्राह्मण सभा पिछड़ों का त्रिवेणी संघ यादव सभा कुर्मियों का जातीय संगठन जाटव समाज जैसी अनेक सभाएं आजादी के पहले ही स्थापित हो चुकी थीं जिनमें से कई आज भी सक्रिय हैं।

 

आजादी के बाद चुनावी राजनीति में लगभग एक दशक तक जाति का प्रश्न काफी जटिल रहा है क्योंकि सभी को राजनीति से बड़ी आशाएं थी। उच्च वर्ग और मध्य वर्ग को छोड़ दे तो कई जातियों में नेतृत्व क्षमता एवं सत्ता की आकांक्षा विकसित नहीं हुई थीं। साठ के दशक के बाद सत्ता से अनेक जातियों का मोहभंग हुआ जिसने सत्ता में हिस्सेदारी के लिए उनमें जातिगत राजनीति को बढ़ावा दिया। 

 

मंडल आयोग के लागू होने एवं राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव लालू प्रसाद शरद यादव ने ८० के दशक में पिछड़ी जातियों को सत्ता से जोड़ने के क्रम में जातिगत गोलबंदियां कीं। लेकिन इसका आयोजन खुद नहीं कराते थे। मंडल की चुनौती का सामना करने के लिए भाजपा ने भी लोधी निषाद जैसी पिछड़ी जातियों और आदिवासियों को राम के मिथक से जोड़ते हुए उनकी अस्मिता की राजनीति की। कल्याण सिंह विनय कटियार जैसे नेता उसी दौर की उपज हैं।

 

अस्सी के दशक में उत्तर प्रदेश में बसपा की राजनीति की शुरुआत करते हुए कांशीराम 'जाति को जाति से काटो' जैसे विचार के साथ आगे बढ़े। छत्रपति शाहू जी महाराज ने 'जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी' जैसे नारों के साथ पिछड़ों को ताकतवर बनाने का जो नारा चलाया था कांशीराम ने उसे दलितों और पिछड़ों तक पहुंचाया। लेकिन मायावती नए जातिगत समीकरणों के इस्तेमाल की रणनीति पर चलती रही हैं।

 

कोर्ट के जातिगत सम्मेलनों पर रोक के बाद प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस ने मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है। प्रदेश की दो स्थानीय पार्टियां सपा-बसपा जिनका पूरा राजनैतिक जनाधार ही जातिगत है। कोर्ट के फैसले पर दोनों पार्टियां कुछ अलग राग अलापते नजर आयीं। समाजवादी पार्टी ने अपने आप को धर्मनिरपेक्षता की चादर पहनाकर सेक्युलर पार्टियों की जमात में शामिल कर लिया। सपा के वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने कहा कि हम इस फैसले का स्वागत करते हैं। सपा ने कभी जाति धर्म की राजनीति नहीं की। सपा धर्मनिरपेक्षता को मानती है और यहां सभी धर्म और जाति के लोगों को बराबर सम्मान मिलता है। वहीं बसपा ने इस फैसले पर कड़ा एतराज जताया। बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि जातिगत विषमताओं के बीच हमने हमेशा ही सबको जोड़ने का काम किया है न कि तोड़ने का। हमारी सर्वसमाज रैलियां होती रहेंगी कोर्ट को चाहिए कि वह बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद जैसे धार्मिक संगठनों पर रोक लगाए।

मो हसीन रहमानी

 

मजबूत हुई जम्हूरियत

हिमालय की गोद में बसे छोटे से देश भूटान में पांच साल पहले राजशाही की एकछत्र ताकत को खत्म कर लोकतंत्र को पनपने का मौका मिला। इसके बाद लोकतंत्र कितना मजबूत हुआ और विस्तार पाया इसका आकलन १३ जुलाई को हुए दूसरे दौर के आम चुनाव से लगाया जा सकता है। इसमें भूटान के मुख्य विपक्षी दल पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को मिली धमाकेदार जीत चौंकाने वाली है। पिछले चुनाव में महज दो सीटें जीतने वाली इस पार्टी ने ३२ सीटें जीतकर ४७ सदस्यीय नेशनल एसेम्बली में तीन चौथाई बहुमत हासिल किया। 

 

कभी वैरागी कहे जाने वाले भूटान में १४ जुलाई को आए चुनाव परिणाम कई मायनों में अप्रत्याशित रहे। भूटान की राजनीति की समझ रखने वाले सभी विश्लेषक यह मानकर चल रहे थे कि द्रुक फुएनसम त्शोंगपा यानी डीपीटी फिर से सत्ता में वापसी करेगी। इसका कारण बीते मई महीने में प्रथम चरण का चुनाव रहा। जिसमें डीपीटी को ४४ . ५२ फीसदी और पीडीपी को ३२ .५३ फीसदी मत मिले थे। भूटान के संसदीय चुनाव दो चरण में होते हैं। पहले चरण में यह निर्धारित होता है कि सत्ता के लिए किन दो राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला होगा। दूसरे चरण में नेशनल एसेंबली को ४७ सीटों के लिए चुनाव होता है। 

 

हर देश की तरह भूटान में भी देश की बदहाल अर्थव्यवस्था और पड़ोसी देश भारत के साथ संबध के मुद्दे चुनावी फिजा में डुबोए गए थे। पीडीपी शुरू से ही भूटान का भारत के साथ खराब हो रहे संबंधों के लिए डीपीटी सरकार की आलोचना करती रही। दरअसल भूटान कई दशकों से विदेश और व्यापार नीति के लिए भारत पर भरोसा करता रहा है। भारत ने हाल ही में भूटान को दी जाने वाली तेल और गैस सब्सिडी में कमी की थी। भारत के इस कदम के बाद भूटान में यह अनुमान लगाया जाने लगा कि भारत ने यह कदम चीन से भूटान की बढ़ती नजदीकियों के मद्देनजर उठाया है।  

 

भूटान की राजनीतिक जमात भारत की इस मजबूरी को समझती है। तभी तो चुनाव प्रचार के दौरान न तो डीपीटी ने और न ही पीडीपी ने सब्सिडी बंद होने का ठीकरा भारत के सिर फोड़ा। यह अफवाह जरूर उड़ी कि चीन से भूटान की बढ़ती नजदीकियों की वजह से भारत ने सब्सिडी बंद की है। लेकिन भूटानी सरकार और विपक्ष ने इसे खारिज कर दिया था। जब प्रचार-अभियान के दौरान थिंपू के विश्व संबंधों की बात उठी मुख्य फोकस भारत पर था। यह उम्मीद के मुताबिक ही था। क्योंकि भारत अर्से से भूटान की नीति का निर्धारण करने वाली मुख्य विदेशी ताकत रही है। भूटान का करीब ६० फीसदी निर्यात भारत के बाजारों में पहुंचता है और उसके कुल आयात का ७५ फीसदी अकेले भारत से जाता है। ईंधन और संभावित तौर पर पनबिजली से भी सब्सिडी खत्म करने के नई दिल्ली के हालिया फैसले से यह चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ। 

 

इस अप्रत्याशित चुनाव नतीजों को राजनीतिक विश्लेषक लोकतंत्र की मजबूती मानते हैं। पांच साल पहले जब भूटान नरेश ने वहां लोकतंत्र की नींव रखी तो अनेक आशंकाएं जतायी जा रही थीं। कहा जा रहा था कि नरेश कभी भी इसे फलने-फूलने का मौका नहीं देंगे। लेकिन ताजा चुनावों से यह साबित हो गया है कि लोकतंत्र उम्र के साथ नहीं बल्कि राजनीतिक दलों और लोगों की समझ के साथ सुदृढ़ होता है। इस चुनाव में सभी दल मुद्दों के साथ मैदान में उतरे तो लोगों ने भी उन्हें उसी हिसाब से जांचा-परखा। जहां नरेश के बोलने भर से कानून बन जाया करते थे वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था की ऐसी समझ हैरत में डालने वाली है।

 

बदलाव का दौर

भूटान में सदियों से चली आ रही राजशाही से देश को लोकतंत्र की तरफ ले जाने की शुरुआत तत्कालीन राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने शुरू की। अब उनके ३३ साल के बेटे और वर्तमान राजा जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक इसे आगे बढ़ा रहे हैं। बदलाव के दौर में राजा अभी भी देश के संवैधानिक प्रमुख हैं। लेकिन उन्हें ६५ साल की उम्र में रिटायर होना है और उन्हें संसद के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास कर भी हटाया जा सकता है। बदलाओं के बावजूद देश में शाही परिवार काफी लोकप्रिय है। लंबे समय तक अलग-थलग रहे देश ने वर्ष १९७१ में संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता ली और खुद को अंतरराष्ट्रीय संबंध के लिए खोलना शुरू किया। इस सदी की शुरुआत में देश ने टीवी और इंटरनेट को भी अपने घर में जगह दे दी। करीब सात लाख की आबादी और ३८३९४ वर्ग किमी क्षेत्रफल के भूभाग वाला देश भारत और चीन के बीच घिरा है।

हरिनाथ कुमार

 

 
         
 
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