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आवरण कथा
 
अपने चाहिए मुआवजा नहीं

आपदा में लापता लोगों के परिजन आज भी अपनों की तलाश कर रहे हैं। कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है कि उनके अपने अब नहीं रहे। परिजनों को उनके वापस आने की उम्मीद है। एक माह बाद भी देश के विभिन्न हिस्सों से लोग अपनों को ढूंढ़ने देहरादून और केदारघाटी में आ रहे हैं। इस बीच उत्तराखण्ड सरकार ने राज्य के लापता लोगों को मृत मानकर मुआवजा देने का काम कर शुरू दिया है। आपदा के एक माह बाद भी जो लोग घर नहीं लौटे सरकार ने उन्हें मृत मानकर उनके परिजनों को मुआवजा देने की घोषणा की थी। १६ जुलाई से प्रदेश सरकार इस पर आगे बढ़ी लेकिन उसके सामने नई चुनौतियां आने लगी हैं। राज्य के भी कई लोग लापता हुए अपने परिजनों को मृत मानने को तैयार नहीं हैं। वे मुआवजा लेने इंकार कर रहे। वे चाहते हैं कि सरकार उनके लापता परिजनों को ढूंढ़ने में मदद करे।

 

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक १५ जुलाई तक लापता लोगों की संख्या ५७४८ है। सरकार ने आपदा के कुछ दिन बाद घोषणा की थी कि जिन लोगों का एक माह यानी १६ जुलाई तक पता नहीं चलता उन्हें मृत मानकर उनके परिजनों को मुआवजा राशि दी जाएगी। हर मृतक और लापता व्यक्ति के परिजन को प्रधानमंत्री राहत कोष से दो लाख और राष्ट्रीय आपदा निधि से डेढ़ लाख रुपए दिये जाएंगे। इसके अलावा उत्तराखंड सरकार प्रदेश के पीड़ितों को अलग से डेढ़ लाख रुपए देगी। दूसरे राज्यों से उत्तराखण्ड पहुंचे यात्रियों को मुआवजा देने की अपनी पूर्व घोषणा से उत्तराखण्ड सरकार पीछे हट गई है। नए आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के सबसे अधिक २०९८ मध्य प्रदेश के १०३५ और उत्तराखंड के ९२४ लोग आपदा के शिकार हुए हैं। इसके अलावा गुजरात राजस्थान बिहार आदि राज्यों के लोग भी लापता हैं। जिनका अब तक कोई पता नहीं चल पाया है। संबंधित राज्यों से इनकी सूची आनी अभी बाकी है। राज्यों से प्राप्त होने वाली सूचियों के आधार पर ही लापता लोगों को प्रधानमंत्री राहत कोष राष्ट्रीय आपदा या अपने- अपने प्रदेश की सरकारों से मुआवजा मिलेगा। मुआवजे की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत लापता लोगों के परिजनों को एक हलफनामा देना होगा कि उनके परिजन किस तारीख को उत्तराखएड आए थे और उनसे कब अंतिम बार उनसे बात हुई थी। अंतिम बार बात होने के समय वह उत्तराखण्ड में किस स्थान पर थे। अपने हलफनामे में उन्हें यह भी स्पष्ट करना होगा कि वह घर वापस नहीं लौटे हैं। हलफनामे के साथ लापता लोगों के परिजनों को एक बॉन्ड भी भरकर देना होगा। बॉन्ड में उन्हें लिखना होगा कि अगर उनके परिजन लौट आते हैं तो वे राहत राशि लौटा देंगे। इसी आधार पर उन्हें मुआवजा दिया जायेगा। इसी हलफनामे और बॉन्ड के आधार पर सरकार ने बीमा कंपनियों से कहा है कि वे प्रभावित लोगों का बीमा क्लेम शीद्घ्र दें। 

 

भारतीय दंड संहिता के मुताबिक कोई लापता व्यक्ति ७ वर्षों तक घर वापस नहीं आता या फिर उसके जिंदा होने की कोई पुष्टि नहीं मिलती तभी उसे मृत माना या घोषित किया जाता है। उत्तराखण्ड की आपदा को विशेष स्थिति मानकर सरकार ने आपदा की तिथि से एक महीने तक लापता रहने वाले लोगों को मृत मानते हुए मुआवजा राशि देने का फैसला किया है। क्योंकि कानूनन सरकार इतनी जल्दी उन्हें मृतक प्रमाण पत्र नहीं दे सकती है। इसलिए लापता लोगों को स्थाई लापता मानकर उनके परिजनों को राहत देने का विशेष प्रावधान किया है। इससे पहले तमिलनाडु में आई सुनामी में भी इस तरह का प्रावधान किया गया था। 

 

विभिन्न राज्यों से आई सूची के आधार पर लापता लोगों को मृत मानकर उनके परिजनों को मुआवजा देने की प्रक्रिया बेशक अमल में लाई जा रही होलेकिन लापता लोगों के परिजनों के लिए इस सच्चाई को स्वीकार करना बहुत मुश्किल हो रहा है। अब भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने परिजनों के इंतजार में हैं। ये लोग उन्हें मृत मानने के लिए तैयार नहीं हैं। अब उनके सब्र का बांध टूट रहा है। देहरादून और केदारघाटी के विभिन्न कस्बों में बाहरी राज्यों के लोग अपनों की तलाश में हैं। यही स्थिति केदारघाटी एवं उत्तराखण्ड के उन अन्य इलाकों के लोगों की भी है जिनके परिजन आपदा के बाद घर नहीं लौटे। ऐसे ही कुछ लोगों से जब 'दि संडे पोस्ट' ने बात की तो उन्होंने कहा कि हमें पैसा नहीं चाहिए। सरकार हमारे लोगों की तलाश करे या फिर उनके मृत शरीर हमें वापस करे। 

 

केदारघाटी के ही देवग्राम गांव की सविता कहती हैं 'मेरे पति के साथ ही गांव के कई लोग केदारनाथ के लिए खच्चर ले जाने का काम करते थे। सब साथ रहते थे। उनमें से कुछ वापस आ गए हैं। लेकिन मेरे पति नहीं लौंटे हैं और न ही उनका मृत शरीर ही हमें मिला है।' इस विभीषिका के बाद से सविता गुमसुम रह रही हैं। गांव और परिवार के लोग उन्हें एक विधवा की तरह रहने को कहते हैं। लेकिन सविता यह मानने को तैयार नहीं हैं कि उनके पति की मौत हो गई है। केदारघाटी में उत्तर प्रदेश के राजेश अपने मां और बाप को तलाश रहे हैं। वह पिछले दस दिनों से यहां हैं। वह कभी गुप्तकाशी तो कभी ऊखीमठ के एसडीएम एवं तहसील ऑफिस का चक्कर काट रहे हैं। 

उनसे जब बात की गई तो उन्होंने कहा 'मेरे माता-पिता करीब ४० लोगों के साथ केदारनाथ आए थे। १६ जून को वे केदारनाथ का दर्शन कर गौरीकुंड लौट आए थे। उनके साथ गया एक व्यक्ति जीवित लौट आया है। उसने बताया कि तबाही के दिन वे लोग गौरीकुंड में थे। जब पानी का तेज बहाव आया तो सब लोग ऊपर गौरीगांव की ओर भागे थे। गांव पहुंचने वाले लोग जीवित हैं। लेकिन सरकार उन्हें निकालकर नहीं लाई है। वे आगे कहते हैं सरकार कह दे कि वह मेरे माता-पिता को ढूंढ़ नहीं सकती तो उन्हें हम खुद ढूंढ़ निकालेंगे सरकार चाहे तो खोजने में मेरी मदद कर सकती है। मुआवजा लेकर मैं क्या करूंगा। 

 

बिहार से अपने परिवार को ढूंढ़ने देहरादून आए सच्चिदानंद ने बताया कि सरकार की ओर से उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही है। वह लापता लोगों को मृत मान चुकी है जबकि वहां फंसे लोगों के अनुसार वहां कई लोगों को जिंदा देखा गया है। आपदा के बाद जिंदा देखे गए कई लोग अभी तक वापस नहीं आए हैं। यदि आपदा के बाद भी वे जिंदा थे तो कहां गए। हमारे परिवार के १२ लोग यहां आए थे। सभी १८ जून को जिंदा देखे गए थे। लेकिन अभी तक वापस नहीं लौटे हैं। यहां की सरकार लापता लोगों को ढूंढ़ने का सिर्फ बहाना बना रही है कर कुछ नहीं रही है। हमें मुआवजा नहीं चाहिए। सरकार हमें हमारे लोगों को ढूंढ़कर दे। 

 

सरकार ने हालांकि ५७४८ लोगों का लापता होने की सूची जारी की है। अभी इस सूची को अंतिम और वास्तविक नहीं माना जा सकता क्योंकि अभी सिर्फ तीन राज्यों आंध्र प्रदेश जम्मू कश्मीर और पांडिचेरी की सरकारों ने ही अपने यहां से लापता लोगों की सूची सत्यापित की है। अन्य राज्यों में लापता लोगों की सूची के सत्यापन का काम अभी चल रहा है।

 

देहरादून के मिसिंग सेल में अभी भी लापता लोगों के नाम आ रहे हैं। १४ जुलाई को गुजरात से कुछ और लापता लोगों के नाम भेजे गए हैं। उत्तर प्रदेश के बिजनौर से भी दो और लोगों के गुमशुदा होने की सूचना दी गई है। स्थानीय स्तर पर और अन्य जगहों पर भी कई ऐसे लापता लोगों के होने की संभावनाएं जताई जा रही हैं जिनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट ही नहीं लिखाई गई होगी। इसमें भिखारी साधु घोड़े और खच्चरवाले हो सकते हैं। इसके बाद लापता लोगों के बारे में प्रदेश सरकार ने १५ जून को अपनी नई नीति का एलान किया। पूर्व घोषणा के अनुसार १५ जुलाई तक न मिलने वाले सभी लोगों को आपदा में मृत माना जाना था। लेकिन अब ऐसा नहीं किया जाएगा। शासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि अब लापता लोगों को मृत नहीं माना जाएगा। सरकार इनकी तलाश जारी रखेगी। लापता लोगों की सूची में शामिल लोगों के परिजनों को मुआवजा नहीं आर्थिक सहायता दी जाएगी। जो बच्चे आपदा में परिजनों के लापता होने से अनाथ हुए हैं उन बच्चों का ज्वाइंट एकाउंट खोलकर यह राशि फिक्स डिपॉजिट के रूप में डाली जाएगी। वहीं उत्तराखण्ड के अनाथ होने वाले बच्चों के पालन-पोषण और पढ़ाई का खर्च सरकार करेगी।

 
         
 
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