fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 46 07-05-2017
 
rktk [kcj  
 
आवरण कथा
 
वादों से मुकरे मुख्यमंत्री

उत्तराखण्ड में आपदा के एक माह बाद भी सरकार राहत और पुनर्वास कार्यों में बेहद लापरवाह नजर आ रही है। सुप्रीम कोर्ट में पीड़ितों को तीन माह का मुफ्त राशन देने के उसके हलफनामे की असलियत यह है कि भुखमरी के कगार पर खड़े सैकड़ों गांवों में आज भी अन्न का एक दाना नहीं पहुंच पाया है। कई गांव ऐसे हैं जहां घोडे़-खच्चरों से राशन भेजा जा सकता है। लेकिन सरकार और नौकरशाह देहरादून में हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। सभी लापता लोगों को मुआवजा देने के वादे से भी राज्य सरकार मुकर गई है

 

उत्तराखण्ड में आपदा के एक माह बाद भी राहत और पुनर्वास कार्य जमीन पर नहीं उतर पाए हैं। सरकार की इस नाकामी के चलते सैकड़ों गांव भुखमरी के कगार पर हैं। सरकारी आंकडों के अनुसार ४०७ सड़कें टूटी हुई हैं और ७६० गांवों का राज्य और देश से संपर्क कटा हुआ है। इन गांवों में राशन पहुंचाने के लिए सरकार कोई ठोस कार्यक्रम नहीं बना पाई है। सूबे का कारोबार चौपट हो चुका है। लोगों के आशियाने उजड़ चुके हैं लेकिन उन्हें अब तक कोई राहत नहीं मिली है। रुद्रप्रयाग जिले में सैकड़ों स्कूल भवन बुरी तरह क्ष्तिग्रस्त हैं और जो कुछ बचे हुए हैं उनको राहत शिविर में तब्दील कर दिया गया है। इससे बच्चों की शिक्षा चौपट हो रही।

 

राज्य सरकार की इस नाकामी के चलते केन्द्र सरकार ने राहत और पुनर्वास का काम अपने हाथ में लेने का निर्णय किया है। इसके लिए प्रधानमंत्री ने १४ सदस्यीय विशेष समिति का गठन किया है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री को राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है। उन्हें राहत के नाम पर दी जा रही करोड़ों की धनराशि के बंदरबांट की आशंका है। वरिष्ठ भाजपा नेता पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने तो बाकायदा प्रधानमंत्री से मिलकर राज्य में राहत और पुर्नवास के काम पूरे होने तक राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की मांग की है। 

 

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा आपदा की गंभीरता को समझने में नाकाम रहे हैं। सरकार के दावों और बयानों से खुद उसकी छवि खराब हुई। आपदा के एक माह बाद भी सरकार यह भी नहीं जान पाई है कि मरने वालों की वास्तविक संख्या कितनी है और कितने लोग लापता हैं। मुख्यमंत्री ने आपदा के दस दिन बाद २५ जून को पीड़ितों के परिजनों के जख्मों पर मरहम लगाते हुए घोषणा की थी कि अगर लापता लोग तीस दिन के भीतर नहीं मिलते हैं या उनकी कोई सूचना नहीं मिलती है तो राज्य सरकार उन्हें समान रूप से पांच लाख रुपये का मुआवजा देगी। कैबिनेट ने भी लापता लागों के १५ जुलाई तक न मिल पाने की सूरत में उन्हें मृत मानकर मुआवजा देने की घोषणा की थी। मगर २१ दिन बाद सरकार ने अपने इस फैसले से पलटने में जरा भी वक्त नहीं लगाया। अब राज्य सरकार ने दूसरे प्रदेशों के निवासियों को मुआवजा देने से इंकार कर दिया। वह सिर्फ उत्तराखण्ड के लापता लोगों के परिजनों को ही मुआवजा देगी।

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अभी तक लापता लोगों की संख्या ५७४८ है जिसमें ९२४ उत्तराखण्ड के निवासी हैं। राज्य सरकार ने केवल उत्तराखण्ड के निवासियों को ही तीस दिन के बाद प्रति व्यक्ति ५ लाख रुपये देने का निर्णय लिया है जबकि अन्य राज्यों के लापता लोगों को कोई भी राशि नहीं दी जाएगी। इस दोहरे रवैये से सरकार की साख पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जहां तक मुआवजा राशि की बात है तो राज्य सरकार के ऊपर प्रति लापता व्यक्ति सिर्फ डेढ़ लाख रुपए का भार पड़ रहा है। शेष धनराशि प्रधानमंत्री राहत कोष और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन की ओर से दी जा रही है। अन्य राज्यों के जो निवासी आपदा में मारे गए और लापता हैं उन्हें आर्थिक मदद देने से बहुगुणा सरकार ने पल्ला झाड़ लिया है। सरकार के इस तरह से पलटने का मुख्य कारण यह है कि लापता लोगों की तादाद लगभग छह हजार पहुंच चुकी है। ऐसे में प्रति व्यक्ति मुआवजे पर ही सरकार को लगभग तीन सौ करोड़ का मुआवजा देना पड़ता। इससे सरकार के हाथ-पांव फूल गए इसलिए उसने अपना निर्णय बदला है। अब सरकार को केवल उत्तराखण्ड के लापता लोगों को कुल ४६ करोड़ की राशि देनी होगी। मुख्यमंत्री ने आपदा के समय जो ढीला-ढाला रवैया अपनाया उससे राज्य की नाकारा नौकरशाही और भी लापरवाह बनी रही। पीड़ितों का हाल लेने के बजाय अधिकांश नौकरशाह सुविधाजनक जगहों पर बैठकर आपदा के आंकड़ों का खेल करते रहे। इसके चलते आपदा प्रबंधन और प्रशासन में कहीं भी कोई तालमेल नहीं दिखाई दिया। मुख्यमंत्री और उनके कई कैबिनेट मंत्री हवाई दौरों में ही मशगूल रहे। न तो मुख्यमंत्री ने आपदा क्षेत्रों में कोई कैम्प करने की जहमत उठाई और न ही किसी उच्चाधिकारी को इसका अहसास हुआ।

 

सरकार का मिशन केदार वैली आज भी जस का तस है। वह सड़कों के टूटने पर गांवों तक पहुंचने के लिए सड़क रोप वे निर्माण और नए पैदल मार्गों का िनर्माण करने के दावे तो कर रही है लेकिन यदि उसकी इच्छा शक्ति लोगों तक राहत पहुंचाने की होती तो जहां पैदल मार्ग आज भी सुरक्षित हैं उन गांवों तक घोड़ों और खच्चरों की मदद से राहत सामग्री पहुंचाई जा सकती थी मगर नहीं पहुंचाई जा सकी। यहां घोड़े खच्चरों से राहत और खाद्यान की ढुलाई की जा सकती है। 

 

आपदा के बाद जगह-जगह फंसे लोगों को बचाने में सरकार का आपदा प्रबंधन तंत्र फेल होने पर उसकी जो किरकिरी हुई उस पर पर्दा डालने के लिए अब मलबे में दबे शवों को निकालकर उनके अंतिम संस्कार की बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं। लेकिन केदारघाटी में अभी भी शव पूरी तरह से नहीं निकाले जा सके। पुलिस-प्रशासन का दावा है कि अभी तक केदारनाथ में ५० और गौरीकुंड एवं जंगल चट्टी में ९३ शवों का दाह संस्कार हुआ है। जबकि प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आपदा के समय अकेले दो सौ शव तो केदारनाथ में ही थे। आपदा के बाद पुलिस ने केदारनाथ में ढाई सौ के करीब शव पड़े होने की बात कही थी। लेकिन महज ५० शवों का दाह संस्कार होने से गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आशंका जताई जा रही है कि प्रशासन द्वारा गुपचुप तरीके से इन शवों को ठिकाने लगा दिया गया है और अब केदार नाथ में कोई भी शव नहीं होने की बात कही जा रही है। 

 

अफसोस की बात है कि राज्य सरकार ने शवों को सड़ने दिया और करीब दस दिन बाद उनके अंतिम संस्कार के लिए टीम केदारनाथ और रामबाड़ा में भेजी। तब तक शवों की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि महामारी का खतरा मंडराने लगा। जैसे-तैसे शवों का दाह संस्कार किया गया। सरकार के नाकारापन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो सरकार हिंदू वैदिक रीति-रिवाज से दाह संस्कार करने की बात कह रही थी उसके लिए राज्य में पुरोहितों का भी अकाल पड़ गया। इसके कारण शवों का अंतिम संस्कार स्वयं पुलिस उपाधीक्षक मिश्रा के द्वारा वेद मंत्रों के साथ किया गया। शवों के अंतिम सस्कार के लिए लकड़ियों की भी पूरी व्यवस्था नहीं हो पाई। केदारनाथ में अधजले शव छोड़ दिए गए। इसके अलावा सैकड़ों डीएनए सैम्पल किटों और राहत सामग्री को भी खुले में खराब होने के लिए छोड़ दिया। अगर शवों का अंतिम संस्कार ठीक से हो जाता तो वहां चील-गिद्ध और कुत्ते क्यों मंडराते? 

 

बहुगुणा सरकार विपक्ष पर आपदा में राजनीति करने का आरोप तो लगाती है लेकिन खुद राजनीति करने से बाज नहीं आई। आपदा में मारे गये लोगों के शवों को ढूंढने के लिये गुजरात से एकता गु्रप अपनी सेवायें देने आया था। राज्य सरकार ने दिखावे के लिए गु्रप का स्वागत भी किया लेकिन दो सप्ताह तक उसे केदारनाथ जाने की इजाजत नहीं दी। ग्रुप दो सप्ताह तक देहरादून में ही विधायक हॉस्टल में रुका रहा। इस बीच ग्रुप के सदस्यों ने सरकार से कई बार केदारनाथ जाने की गुजारिश की लेकिन सरकार मौसम खराब होने का बहाना बनाती रही। और हारकर एकता ग्रुप वापस चला गया। यह एकता ग्रुप वही है जिसने गुजरात में आये भूकम्प में और कई अन्य सुनामी आपदाओं सी सुनामी के प्रभावित क्षेत्रों में जाकर शवों का बेहतर तरीके से ढूंढ़ने का काम किया। ग्रुप के पास इसके लिए सभी साजो-सामान भी हैं। लेकिन सरकार नरेन्द्र मोदी फैक्टर से डर गई।

 

इस फैक्टर से राज्य सरकार इतनी डरी हुई है कि नौ जुलाई को गुजरात सरकार ने केदारघाटी के आपदाग्रस्त क्षेत्रों के लिए राहत सामग्री के किट भेजे जिनमें सभी जरूरी समान और दवाइयां भी थीं। लेकिन प्रशासन ने उन्हें प्रभावितों तक पहुंचाने के बजाए कई दिन तक देहरादून में ही डंप रखने में दिलचस्पी दिखाई। केदारघाटी के कुछ युवकों ने जब रेलवे स्टेशन में डम्प राह सामग्री को लेकर हंगामा किया तब जाकर प्रशासन ने इसे वहां से उठवाया।

 

राज्य सरकार आपदा के समय भी झूठ का सहारा लेने में पीछे नहीं रही। सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे में सरकार ने आपदाग्रस्त क्षेत्रों में तीन माह राशन देने की बात कही लेकिन हकीकत यह है कि एक माह का भी राशन आपदाग्रस्त क्षेत्रों में नहीं पहुंच पाया है। मुफ्त राशन पहुंचाने के अपने ही फैसले पर सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य कैबिनेट में इस फैसले को १ जुलाई से लागू किया मगर शासनादेश जारी करने में सरकार को पूरे पांच दिन लगे। राज्य सरकार ने हलफनामे में सभी आपदा प्रभावित क्षेत्रों को तीन माह का राशन देने की बात कही है जबकि हकीकत में केवल उन्हीं गांवों को राशन देने का आदेश जारी हुआ है जो सड़क मार्ग पर नहीं हैं। और वहां जहां सरकार पहुंच नहीं पा रही है। सरकार के इस दोहरे रवैये से प्रशासनिक क्षमता की पोल भी खुल गई है।

 

हलफनामे के अनुसार सरकार ने आपदा पीड़ित प्रत्येक परिवार जिसमें पांच सदस्य हैं को १५ किलो चावल १५ किलो आटा ५ किलो दाल ३ किलो चीनी एक लीटर खाने का तेल मसाले नमक माचिस और १० लीटर केरोसीन तेल देने की बात कही है। जबकि केदारघाटी के अंतर्गत गुप्तकाशी के गांवों में लोगों को केवल दस किलो चावल और १० किलो आटा ही बांटा गया है। इसके अलावा उत्तरकाशी जिले के अधिकांश आपदाग्रस्त क्षेत्रों में भी राहत के नाम पर कम राशन दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं। 

 

बरसात का मौसम अभी पूरे तीन माह और रहेगा। लेकिन वह गांवों में सम्पर्क मार्ग या पैदल मार्गों का निर्माण करने में कोताही बरत रही है। इससे आने वाले दिनों में हालात और भी बदतर होने वाले हैं। खुद सरकारी आंकड़ों के अनुसार अभी भी राज्य की ४०७ सड़कें पूरी तरह से बंद पड़ी हैं और ७६० गांवों का सम्पर्क पूरी तरह कटा हुआ है। इन गांवो में सरकार राशन पहुंचाने के लिये कोई ठोस कार्यक्रम नहीं बना पा रही है और प्रशासन के पास भी कोई योजना नहीं है।

 

प्रदेश में भाजपा की निशंक सरकार के द्वारा गठित हिमनद प्राधिकरण के औचित्य पर सवाल खड़े करने वाले मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा उत्तराखण्ड आपदा विकास प्राधिकरण आज खुद कटघरे में है। जल्दबाजी में इसका गठन करके प्रचारित किया गया कि इससे आपदा से निपटने और राहत कार्य में सहायता मिलेगी। जबकि राज्य में पूर्व से ही अलग आपदा प्रबंधन विभाग और आपदा मंत्रालय बना हुआ है। राज्य में आई हर आपदा से निपटने में यह कभी सफल नहीं हो पाया है। एक तरह से राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग सफेद हाथी ही साबित हुआ है। ठीक उसी तरह से बहुगुणा के द्वारा गठित राज्य आपदा प्रबंधन विकास प्राधिकरण के गठन के बाद से ही इस प्राधिकरण में कोई नियुक्ति तक नहीं हो पाई है। जबकि राज्य के कई बड़े नौकरशाह इसमें नियुक्ति पाने के लिए जी जान से लगे हुए हैं। इसमें अभी तक केवल कैबिनेट स्तर की नियुक्ति के अलावा कुछ नहीं हो पाया है। कांगे्रस में कुछ ही समय पूर्व शामिल हुए लेफ्टिनेंट जनरल बधानी को इसका उपाध्यक्ष बनाया गया है। उन्हें कैबिनेट मंत्री स्तर का दर्जा दिया गया है। सरकार इस प्राधिकरण में अभी तक किसी भी विशेषज्ञ की नियुक्ति नहीं कर पाई है। इसके अलावा आपदा राहत और बचाव के मामले भी सरकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं। बचाव कार्य के दौरान सेना द्वारा सुरक्षित निकाले गए कई लोगों की सूची सरकार के पास मौजूद नहीं हैं। रेस्क्यू कर बचाए गए लोग कहां गए किस हालत में हैं इसका भी अभी तक कोई पता नहीं चल पा रहा है। जिन लोगों को सेना ने बचाया था उनके परिजन उन्हें अभी ढूंढ़ रहे हैं। राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी हैं। लेकिन बावजूद आपदाग्रस्त क्षेत्रों में जाकर वस्तुस्थिति जानने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। आपदा का सर्वे करने उनसे पहले तो प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी पहुंचे। मुख्यमंत्री जी प्रधानमंत्री के बाद ही राज्य के हालात जानने के लिये हवाई दौरों पर निकले थे।ेंें

कृष्ण कुमार

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 63%
uk & 13%
 
 
fiNyk vad

श्री बदरीनाथ&केदारनाथ मंदिर समिति ने अगले माह से शुरू होने वाली यात्रा की व्यवस्थाओं में कई बदलाव किए हैं। समिति एवं प्रशासन यात्रा की तैयारियों में जुटे हुए हैं। इस बार श्रद्धालुओं

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1607049
ckj