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आपदा पर विशेष
 
मुआवजे के दोहरे मापदंड

उत्तराखण्ड की विजय बहुगुणा सरकार ने आपदा पीड़ितों को मुआवजे के जो मापदंड तय किये हैं उससे हजारों लोग अपने हक से वंचित रह जायेंगे। पर्वतीय क्षेत्रों में सिर्फ पिता को ही मुआवजे का हकदार माना गया है जबकि सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार बेटों के अलग-अलग चूल्हे जलते रहे हैं। इसी तरह जिमीघाट से लेकर धारचूला दारमा और जौलजीबी तक सैकड़ों परिवारों को इसलिए आवासीय मुआवजा नहीं मिलेगा क्योंकि उनके आशियाने वन विभाग की भूमि पर थे

 

अंततः वही हुआ जिसका डर था। ६ एवं ७ जुलाई को प्रदेश के आपदा मंत्री यशपाल आर्य ने जौलजीबी मदकोट बलुवाकोट और धारचूला के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर लोगों को राहत राशि बांटी। सभी आपदा प्रभावितों को राहत राशि के चेक दिए जाने का दावा किया गया। लेकिन अभी भी बहुत से लोग इससे वंचित हैं। शासन-प्रशासन और प्रदेश सरकार ने क्षेत्र के सैकड़ों लोगों को आपदा प्रभावित तो माना लेकिन मुआवजा राशि का पात्र नहीं। कारण ये लोग वन विभाग की जमीन पर बसे थे।

 

जिमीघाट से लेकर धारचूला और दारमा से लेकर जौलजीबी तक सैकड़ों परिवार ऐसे हैं जो गौरी नदी और काली नदी के किनारे बसे थे। नदियों के किनारे बसे लोगों के आवासीय भवन ज्यादातर बेनाप वन विभाग की जमीन पर ही बने हैं। इनमें से अधिकतर घर आपदा की भेंट चढ़ गए। सरकारी नियमों के तहत ऐसे परिवारों को राज्य सरकार की राहत नहीं मिल सकती है। प्रदेश के आपदा मंत्री यशपाल आर्य ने ऐसे आपदा पीड़ितों को मुआवजे का पात्र मानने से भी इंकार कर दिया जिनके आवास वन विभाग की जमीन पर बने थे। सरकार से २ लाख रुपये की मुआवजा राशि के लिए ६ एवं ७ जुलाई तक टकटकी लगाए बैठे सैकड़ों आपदा पीड़ितों की उम्मीदें लहूलुहान हो चुकी हैं।

 

२८ जून को दि संडे पोस्ट ने इन आपदा पीड़ितों से बात की थी। टीम ने जब जौलजीबी के आपदा पीड़ितों से यह कहा कि उनके मकान तो फॉरेस्ट लैण्ड पर बने हैं तो इस पर पीड़ितों ने आग्रह किया कि कृपया इस मामले को अपने समाचार पत्र में तब तक प्रकाशित न करें जब तक कि हमें आवसीय क्षति का मुआवजा नहीं मिल जाता। तब से जौलजीबी के साथ ही बरम बंगापानी मदकोट बलुवाकोट नई बस्ती कलिका गोठी और धारचूला के सैकड़ों परिवार इस उम्मीद में थे कि उन्हें मुआवजा राशि मिलेगी। इनमें से कुछ को तो राशि मिल गई लेकिन कुछ लोग अभी भी ऐसे हैं जो आपदा मंत्री का मुंह ताकते रह गए। जौलजीबी निवासी बहादुर सिंह के अनुसार हमारे साथ तो पहले से ही प्रकृति ने खिलवाड़ किया था। कई सालों की मेहनत से एक दुमंजिला मकान बनवाया था। जिस पर काली नदी के तेज बहाव ने पानी फेर दिया। मकान तो ध्वस्त हुआ लेकिन यह उम्मीद भी गई कि सरकार कुछ रुपये दे देगी जिससे नई छत का आसरा हो जाएगा। 

 

पर्वतीय क्षेत्रों में भी कुछ परिवारों के सम्मुख मुआवजा राशि प्राप्त करने में दिक्कतें आ रही हैं। ये वे परिवार हैं जहां एक ही मकान में पिता और उसके पुत्रों के अलग-अलग चूल्हे जलते हैं। चूल्हे ही नहीं बल्कि उनके राशन कार्ड और भाग दो रजिस्टर में भी नाम अलग-अलग होते हैं। लेकिन पिता के जीवित होने और घर का मुखिया होने के कारण इन स्थितियों में केवल पिता को ही मुआवजे का हकदार बनाया गया है। अगर किसी व्यक्ति के दो या तीन पुत्र हैं या वह नाती-पोते वाला है तो उसको घर के नुकसान के तौर पर महज दो लाख की राशि से ही संतुष्ट होना होगा। चूल्हे के हिसाब से हकदारी का मामला यहां काफी पेचीदा हो गया है। छारछुम निवासी कालू राम भारती कहते हैं कि सरकार को अब चूल्हे के हिसाब से हकदारी मामले में बदलाव लाना पड़ेगा। नहीं तो यहां के हजारों लोग मुआवजे से वंचित रह जाएंगे। 

 

मुआवजा वितरण के अलावा आपदा पीड़ितों को राशन सामग्री बांटने में भी लापरवाहियां सामने आ रही हैं। बताया जाता है कि अभी भी दारमा व्यास घाटी के साकुरी जुम्मा खैला गुजर्वा खेत जामु पांगु और पांगला ऐसे गांव हैं जहां आपदा पीड़ितों तक राहत सामग्री नहीं पहुंच पाई है। इन गांवों में खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो गया है। खाद्यान्न संकट की यह स्थिति तवाघाट और पांगला के बीच धौली गंगा पर बने पुल के टूटने से पैदा हुई है। कलिका निवासी राजेन्द्र सिंह कुटियाल के अनुसार घाटी के इन गांवों में सरकार की तरफ से राशन का एक दाना भी नहीं भेजा गया है। तवाघाट का मोटर पुल बहे एक माह से ऊपर हो चुका है लेकिन अभी तक नदी पार करने के लिए सरकार की ओर से कोई भी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है। इसके चलते लोग जान जोखिम में डालकर नदी पार कर रहे हैं। एक स्थानीय व्यक्ति ने लोगों को नदी पार कराने के लिए गरारा लगाया है। ड्रम को काटकर रास्सियों के सहारे बनाए हुए इस गरारे से नदी पार कराने की एवज में पचास रुपया प्रति व्यक्ति लिया जा रहा है। नदी पर अभी तक सरकारी गरारे नहीं लगने से लोगों में रोष व्याप्त है। नदी पर पुल टूटने से चौंदास के १५ गांवों के लोग अपने घरों में कैद होकर रह गए है।

 

दारमा-व्यास घाटियों में अभी तक १५०० लोगों के फंसे होने की सूचनाएं हैं। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि अभी भी सरकार उच्च हिमालयी क्षेत्र में फंसे लोगों को निकालने में सक्षम नहीं हैं। दारमा सेवा समिति के उपाध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह ग्वाल के अनुसार सरकार की व्यवस्था से तंग आकर बोलिंग निवासी जंगपान सिंह बग्याल ने आत्मदाह कर लिया। बग्याल की सोबला में सस्ते गल्ले की दुकान और गोदाम था। जब १७ जून को आपदा ने पूरे सोबला गांव को तबाह किया तब वह अपने गांव बोलिंग में थे। बग्याल सोबला स्थित अपनी दुकान और गोदाम का हाल जानने को बेताब थे। उन्होंने कई बार प्रशासनिक अधिकारियों से कहा कि उन्हें हैलीकॉप्टर से सोबला तक पहुंचा दें। लेकिन प्रशासन ने उसकी एक न सुनी। इसके चलते गत ८ जुलाई को उन्होंने अपने ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आत्मदाह कर लिया। इसके बाद धारचूला के उप जिलाधिकारी प्रमोद कुमार ने बताया कि जंगपान सिंह बग्याल ने आत्महत्या नहीं की बल्कि जब वह रात को सोया हुआ था लैम्प उसके ऊपर गिर गया। लैम्प का तेल बिखरने से वह लपटों की चपेट में आ गया और उसकी मौत हो गई। एसडीएम के इस बयान से लोगों में शासन-प्रशासन के प्रति गहरा आक्रोश है।

 

आपदा पीड़ितों के प्रति प्रशासनिक अफसरों की लापरवाही के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। धारचूला क्षेत्र के आपदा नोडल अधिकारी एवं कुमाऊं मंडल विकास निगम के एमडी दीपक रावत ने तो संवेदनहीनता की सीमाएं ही पार कर गए। वरिष्ठ पत्रकार जगत मर्तोलिया कहते हैं कि आपदा प्रभावित क्षेत्रों में कोई भी मंत्री या अधिकारी नीली और लाल बत्ती लगाकर नहीं पहुंचे लेकिन दीपक रावत अपने साथ नीली बत्ती और एमडी केएमवीएन का बोर्ड लेकर आए। जिन्हें वह एक स्कारापियो गाड़ी में लगाकर सड़क पर घूमते नजर आ रहे हैं। वे धारचूला में पर्यटक आवास गृह में रुके हुए हैं जहां से निकल कर हैलीपैड पर जाना उनकी दिनचर्या में शामिल है। हैलीपेड जाकर वह एक कमरे में बैठ जाते हैं। वे न तो किसी से मिलते हैं और न ही किसी आपदा प्रभावित व्यक्ति का दुख-दर्द बांटते हैं। जबकि हैलीपैड से महज १०० मीटर की दूरी पर ही सोबला सहित कई गांवों के करीब १५० पीड़ित विस्थापित हैं। जहां उन्हें राशन-पानी की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। दीपक रावत का चरित्र उत्तराखण्ड की नौकरशाही का चरित्र बन गया है। कोई भी अफसर लोगों का दुख-दर्द महसूस नहीं कर रहा है।

 

नई बस्ती के दर्जनों आपदा प्रभावितों के रहने की अस्थाई व्यवस्था तो कर दी गई है लेकिन उनके लिए चिकित्सा सुविधा नहीं हैं। कई परिवारों के बच्चे बीमार हैं। यही नहीं बल्कि जहां पीड़ितों के टेंट लगाए गए हैं वह स्थान भी आपदा की दृष्टि से संवेदनशील है। बलुवाकोट निवासी शांति देवी पैतोला अपने पति कल्याण पैतोला और दो लड़कियों के साथ गोठ (पशुओं के लिए बने घर) में आश्रय लिए हुए हैं। यह गोठ भी उन्होंने कई वर्ष पूर्व सरकारी मदद से बनवाई थी। इनका घर काली नदी की जद में है। शांति देवी का घर ही नहीं बल्कि न्यूज एजेंसी चलाने वाले चन्द्र सिंह ग्वाल डिगर सिंह और शकील अहमद का मकान भी खतरे की चपेट में है। बलुवाकोट में काली नदी ने कटान के बाद इनके घर की तरफ रुख कर लिया है।        

 

आकाश नागर साथ में सुरेन्द्र सिंह बिष्ट

 

बात अपनी अपनी

जिनके घर आपदा में टूटे हैं उन्हें मुआवजा राशि दी जा रही है। अभी आपदा मंत्री के द्वारा तत्काल राहत राशि दी गई है। अभी प्रशासनिक अधिकारियों की रिपोर्ट आनी बाकी है। इसके आधार पर और भी लोगों को धनराशि दी जायेगी।

हरीश धामी विधायक धारचूला

राहत राशि बांटने में लोगों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। यह राशि उन आपदा पीड़ितों को ही दी जा रही है जो कांग्रेस के समर्थक हैं। जबकि भाजपा समर्थित पीड़ितों को इससे महरूम किया जा रहा है।

विशन सिंह चुफाल पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भाजपा

जिनके घर टूटे हैं उन्हें मुआवजा राशि दे दी गई है। १ करोड़ ३० लाख रुपया इस एवज में दिया जा चुका है। इसके अलावा ३३ लाख रुपया आपदा पीड़ितों को राहत आदि में बांटा जा चुका है। अब तक ४७० से अधिक परिवारों को धन राशि दी जा चुकी है। अगर कोई छूट गया है तो उसको पटवारी की रिपोर्ट पर मुआवजा दिया जायेगा।

नीरज खैरवाल जिलाधिकारी पिथौरागढ़

 
         
 
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