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vad 37 05-03-2017
 
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आपदा
 
भिक्षुक नहीं हैं केदारनाथ

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रस्ताव रखा कि वे केदारनाथ मंदिर का भव्य निर्माण करा देंगे। इस पर गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे बोले कि मंदिर बनाने का आह्वान सबसे पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने किया था। केंद्रीय संस्कृति मंत्री चंद्रेश कुमारी कटोच कहती हैं कि मंदिर हम बनाएंगे। पुरातत्व विभाग का कहना है कि हम केदारनाथ मंदिर शैली का अध्ययन कर उसी शैली में मंदिर बनाएंगे। इन्टैक पुरातत्व विभाग को सहयोग करने की बात कर रहा है। उत्तराखण्ड सरकार और उसका निकाय बदरी-केदार मंदिर समिति भी मंदिर बनाने की बात कर रहे हैं। विश्व हिंदू परिषद का इस बारे में अभी फैसला आना बाकी है। ऐसे में यह बात समझ से परे है कि आखिर मंदिर बना कौन रहा है? जब मंदिर को कोई नुकसान ही नहीं हुआ है तो फिर इसके पुनर्निर्माण का भला क्या औचित्य है? क्या वाकई आज केदारनाथ को दुनिया के सामने झोली फैलाने की जरूरत है? शिव बागम्बरधारी हैं श्मशान वासी हैं वे झोला नहीं टांगते। आखिर झोले में रखेंगे भी क्या? पैसे-टके से तो शंकराचार्यों तक को परहेज रहा है। वे पैसे को छूते नहीं हैं। इसलिए कोई भी शिव के बागम्बर को उतारकर उसका झोला बनाने की अनावश्यक चेष्टा न करे। 

 

केदारनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर राजनेताओं और संगठनों की ओर से जो बातें आई हैं उसमें उनके निजी एजेंडे हो सकते हैं। लेकिन इसमें ंबदरी केदार मंदिर समिति को किसी भी स्थिति में नहीं बख्शा जा सकता है। संयुक्त प्रांत में १९३९ के अधिनियम के तहत गठित यह समिति पहले उत्तर प्रदेश और अब उत्तराखण्ड सरकार का संवैधानिक निकाय है। तब से लेकर अब तक इस समिति के पास शायद ही कोई ऐसी उपलब्धि हो जिस पर वह फख्र कर सके। इससे भी अधिक दुखदायी बात और क्या हो सकती है कि समिति की संपत्तियों पर अवैध कब्जे होते गए और वह उदास बैठी रही। बदरी केदार को लाइम लाइट में लाने का श्रेय भी वास्तव में वहां के स्थानीय निवासियों खासकर देवप्रयाग और ऊखीमठ के लोगों को जाता है जिन्होंने देश-विदेश में द्घूम-द्घूमकर श्रद्धालुओं को इन तीर्थ स्थलों का महत्व बताया। उनके इस प्रयास से इन तीर्थ स्थलों पर प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं और समिति को करोड़ों की आय होती है। वर्ष १९३९ से लेकर अब तक की आय का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन अफसोस की बात है कि मंदिर समिति केदारनाथ के पुनर्निर्माण के नाम पर अखबारों में विज्ञापन देकर इस तरह मदद की गुहार लगा रही है जैसे कि केदारनाथ झोला फैलाकर लाचार बैठे हों। 

 

पहली बात तो यह है कि १९३९ से आज तक समिति को जो आय हुई वह पैसा कहां गया? दूसरी बात यह है कि जब उत्तराखण्ड सरकार खुद कह चुकी है कि वह विद्वत परिषद और साधु-संतों को साथ लेकर मंदिर का पुनर्निर्माण करेगी तो फिर बदरी-केदार मंदिर समिति को अलग से चिंता करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? समिति राज्य सरकार का संवैधानिक निकाय है इस दृष्टि से उसका अलग से मंदिर पुनर्निर्माण में सहयोग की अपील करना बिल्कुल ही असंवैधानिक है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह धन जुटाने का जरिया भर है। उत्तराखण्ड के ज्ञात इतिहास में ऐसी जरूरत वहां के मंदिरों को कभी नहीं पड़ी। बिड़ला जैसे बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने वहां पर अपने नाम पट्ट लगाने के लिए खजाने खोल देने की बात कही लेकिन उत्तराखण्ड की जनता ने सबके प्रस्ताव खाजिर कर दिये। उत्तराखण्ड के एक संगठन पहाड़ बचाओ अभियान के संयोजक जगदीश भट्ट तो यहां तक कहते हैं कि यदि राज्य सरकार अभियान को यह काम दे दे तो हम अपने बूते मंदिर की मरम्मत कर देंगे। संगठन के पास रुड़की आईआईटी से एमटेक आशुतोष जैसे इंजीनियर हैं जो भूकंपरोधी भवनों के निर्माण के विशेषज्ञ हैं। 

 

केदारनाथ शिव के द्वावश ज्योर्तिलिंगों में से एक है। पुराणों के अनुसार एक समय यहां विष्णु ने शिव की तपस्या की थी। पांडवों को यहां शिव ने भैंसे के रूप में दर्शन दिए थे। उसी भैंसे का पीठ वाला भाग यहां शिव लिंग के रूप में पूजा जाता है। ऐसी मान्यता है कि पांडवों ने ही इस मंदिर का निर्माण किया था। इसी लिए इसे पांडवकालीन शैली का मंदिर भी कहा जाता है। कटारमल का सूर्य मंदिर जागेश्वर मंदिर समूह और कासनी का शिव मंदिर आदि कई मंदिर इसी शैली के हैं। इनकी चौड़ी और बड़ी शिलाएं उन्हें हजारों मीटर की ऊंचाई पर भी भूकंप से सुरक्षित रखती हैं। ये शिलाएं वहां कैसे पहुंची ये आज भी शोध का विषय है। राज्य सरकार को चाहिए कि पांडवकालीन शैली के इस मंदिर के प्राचीन स्वरूप से कोई छेड़छाड़ न की जाए। यदि उसकी मरम्मत की जरूरत है तो इस संबंध में अभी तक केंद्र सरकार के जिन विभागों राज्य सरकारों या जन संगठनों ने दिलचस्पी दिखाई है उनकी एक सामूहिक निर्माण समिति बनाई जाए। यह समिति निर्माण में अपनी राय देने के साथ ही सकारात्मक भूमिका अदा कर सकती है। इससे श्रद्धालुओं को भी सुकून मिलेगा कि निर्माण कार्य सामूहिक रूप से हो रहा है जो उचित ही होगा।

 

 

राजजात पर आपदा की छाया

प्रदेश में पिछले माह में आई प्राकृतिक आपदा का असर लोगों के जनजीवन के साथ-साथ तीर्थाटन और पर्यटन पर भी पड़ा है। यही कारण है कि इस साल चारधाम यात्रा का संपन्न होना संभव नहीं है। बाहर के पर्यटकों में भी भय बैठ गया है। पर्यटक तीर्थाटन से जुड़े कारोबारी खाली बैठे हैं। इस पर माह के अंत में दुनिया की सबसे लंबी दूरी की पैदल नंदा देवी राजजात यात्रा पर सरकार के प्रतिबंध लगाने से लोग नाराज हैं। राज्य सरकार ने इस हिमालयी महाकुंभ को स्थानीय स्तर पर मनाने की अपील की है। नंदा देवी राजजात समिति व हक-हकूकधारी सरकार की इस अपील को धार्मिक परंपराओं के लिए गलत बता रहे हैं।

 

नंदा देवी राजजात समिति का कहना है कि इस धार्मिक आयोजन में सरकार मदद नहीं करना चाहती है तो न करे। हम अपने स्तर से पौराणिक परंपराओं के अनुसार इस यात्रा का आयोजन भव्य तरीके से करेंगे। इससे सरकार और राजजात समिति के बीच ठन गई है। सरकार इसके लिए अपनी मजबूरी गिना रही है तो समिति अपनी परंपरा के नाम पर झुकने को तैयार नहीं है। यात्रा स्थानीय स्तर पर हो इसके लिए सरकार ने विज्ञापन भी निकाले हैं। सरकार के मुताबिक इस यात्रा की तैयारियों में १०० करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। इस अपील के बाद यात्रा मार्ग पर शायद ही कोई विकास कार्य हो। गौरतलब है कि प्रत्येक १२ वर्ष बाद चमोली जिले में नौटी से शीला समुद्र तक २८० किलोमीटर लंबी पैदल दूरी की अनोखी यात्रा आयोजित होती है। इस यात्रा को नंदा देवी राजजात यात्रा के नाम से जाना जाता है। इस साल २९ अगस्त से १७ सितंबर तक इस यात्रा का आयोजन होना है। यात्रा के लिए १९ पड़ाव हैं लेकिन उत्तराखण्ड में आई विनाशकारी प्राकूतिक आपदा को देखते हुए प्रदेश सरकार ने इस यात्रा को कार्य रूप देने की अपील की है। साथ ही सरकार ने देश-विदेश से इस यात्रा में शामिल होने के लिए आने वाले लोगों से भी यहां न आने की अपील की गई है। मगर सरकार के इस फैसले पर नंदा देवी राजजात यात्रा से जुड़े हक हकूकधारी व समिति भड़क गई हैं। जिस यात्रा के नाम पर भारी भरकम राशि को सरकार खर्च कर चुकी है अब उसी यात्रा से हाथ खड़े किए जाने के बाद सरकार पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। भारी भरकम राशि खर्च करने के बाद सरकार द्वारा इस यात्रा को सूक्ष्म रूप से मनाए जाने की बात किसी को हजम नहीं हो रही है।

 

बात अपनी अपनी

हम मानते हैं कि आपदा से उत्तराखण्ड में व्यापक नुकसान हुआ है। लेकिन नंदा देवी राजजात यात्रा की अपनी धार्मिक परंपराएं हैं। अगर इन परंपराओं को खंडित किया गया तो दैवीय प्रकोप से उत्तराखण्ड को कोई नहीं बचा सकता है। सरकार द्वारा इस यात्रा को सूक्ष्म रूप से मनाने की अपील को हम खारिज करते हैं। यदि सरकार इस यात्रा में मदद नहीं करती है तो हम अपने संसाधनों से नंदा देवी राजजात यात्रा का आयोजन करेंगे।

भुवन नौटियाल महामंत्री श्री नंदा देवी राजजात समिति

 

हम पहले भी इस यात्रा को लेकर सरकार पर आश्रित नहीं थे। वर्षों से नंदा देवी राजजात यात्रा बिना सरकारी मदद के संचालित होती रही। सरकार द्वारा इस यात्रा को सूक्ष्म रूप से आयोजित करने की अपील का हम विरोध करते हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार ही इस यात्रा का आयोजन किया जाएगा।

मंशाराम गौड़ पुजारी कुरुड़ मंदिर

 

 

जाएं तो जाएं कहां

एक ओर अपनों को खोने का दर्द तो दूसरी ओर जीवन भर की कमाई गंवाने की कसक। अब सिर छुपाने व पेट की आग को शांत न कर पाने की बेवसी। राहत शिविरों में रह रहे आपदा पीड़ितों के चेहरों में यह साफ देखी जा सकती है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों तक न तो नेता पहुंच पा रहे हैं न ही अधिकारी। आपदा के २३ दिन बाद भी लोग फंसे हैं। आपदा ग्रस्त क्षेत्रों की दस हजार से उपर की आबादी पर अब भुखमरी का संकट मंडराने लगा है। मौसम खराब होने और लगातार बारिश होने के चलते दुर्गम क्षेत्रों तक हैलीकॉप्टर उड़ान नहीं भर पा रहे हैं। हालांकि प्रशासन के मुताबिक उच्च हिमालयी क्षेत्रों में फंसे हुए ९०० लोगों को निकाल लिया गया है। अभी भी करीब ५०० लोग फंसे पड़े हैं। 

 

आपदा प्रभावित लोग जैसे-तैसे दिन काट रहे हैं। शासन- प्रशासन की बदइंतजामी से लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। आपदा के बाद आपदा प्रबंधन तंत्र लापता है। सोबला खिम कंज्योति न्यू सुबागांव धैली में समा गए हैं। २० लापता लोग कहां गए उनका अभी तक पता नहीं है। अकेले २८० ग्रामीण राजकीय इंटर कालेज धारचूला में शरण लिए हुए हैं। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में विद्युत आपूर्ति बहाल न होने से पीड़ितों को धारचूला में प्रदर्शन करना पड़ा। मदकोट में मुख्य विकास अधिकारी डॉ ़ राघव लंगर को आपदा पीड़ितों ने घेर लिया। लोगों को गुस्सा था राहत कार्यों में ढिलाई बरती जा रही है। शासन-प्रशासन की उपेक्षा के चलते क्षेत्रीय विधायक हरीश धामी को अनशन पर बैठना पड़ा। तब प्रशासनिक अमला सक्रिय हुआ। जिलाधिकारी डॉ ़ नीरज खैरवाल धारचूला तो कुमाऊं कमिश्नर आरके सुधांशु जिला मुख्यालय में राहत कार्यों को गति देने के लिए हैं। हालांकि राहत एवं बचाव कार्यों के लिए जिला प्रशासन ने १५ स्थानों पर राहत शिविर खोलकर प्रभारी नियुक्त किए हैं। कुमाऊं कमिश्नर आरके सुधांशु का कहना है मुन्स्यारी के मिलम रिलकोट बुर्फू मर्तोली एवं धारचूला के दारमा व्यास घाटी व गौरीछाल क्षेत्रों में हैलीकॉप्टर से खाद्यान्न पहुंचाने के साथ ही मजदूरों घोड़े खच्चरों के माध्यम से राशन पहुंचाया जा रहा है। फंसे लोगों को निकालने के लिए एनडीआरएफ के ४२ जवान दारमा वैली में मौजूद हैं। सड़क कनेक्टिविटी पर जोर दिया जा रहा है। मदकोट की ४५ वर्षीया रूकमणी देवी कहती हैं सरकारी राहत शिविर में गैर आपदा प्रभावित लोग लाभ ले रहे हैं। गोलमा के रहने वाले नरेन्द्र राम हो या फिर ५० देवीबगड़ के रहने वाले प्रहलाद सिंह कहते हैं कि सरकारी राहत का तो उन्हें आज भी इंतजार है। भाजपा के वरिष्ठ नेता विशन सिंह चुफाल कहते हैं सरकार की आपदा से निपटने की तैयारियां शून्य हैं। इसी वजह से आपदा पीड़ितों तक राहत सामग्री नहीं पहुंच पा रही है। 

 

आपदा से हुए नुकसान का प्रशासन स्तर पर हुए प्रारम्भिक सर्वे कहते हैं कि जनपद की ४९९३ हेक्टेयर भूमि नदियों में समा गई। ४०० मकान पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त हो गए। २०६ गांव आपदा से बुरी तरह प्रभावित रहे। १७४७ पशु मारे गए। ७७ मोटर मार्ग बंद पड़े हैं। ३२ पैदल मार्ग बंद हैं। चार मोटर पुल सहित २२ पुलियाएं गायब हैं। प्रशासन का दावा है कि ४६३ परिवारों को १८ लाख ९५ हजार २०० रुपए की राहत १५ लाख २४ हजार अनुग्रह अनुदान व १ करोड़ ३० लाख २६ हजार ८०० रुपए का गृह अनुदान अभी तक बांटा गया है। दूसरी और जनपद में पहले जहां ७१ गांवों को पुनर्वासित होना था वहीं अब आपदा के बाद यह संख्या २७७ से ऊपर पहुंच गई है। एक ओर आपदा क्षेत्रों में राहत नहीं बंट पा रही है वहीं दूसरी ओर प्रशासन राहत शिविरों को खोल देने को अपनी उपलब्धि बता रहा है और इन्हीं राहत शिविरों में रहने वाले आपदा प्रभावित प्रशासन के इंतजामों से खुश नहीं है।

 
         
 
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  • दिनेश पंत

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