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vad 41 02-04-2017
 
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आपदा पर विशेष
 
बाढ़ ने खोली भ्रष्टाचार की पोल

पहाड़ों में आई आपदा ने हरिद्वार में बाढ़ नियंत्रण के इंतजामों में हुए भ्रष्टाचार की पोल खोलकर रख दी है

 

हरिद्वार। उत्तराखण्ड के पहाड़ी जिलों में आई आपदा का असर हरिद्वार पर भी पड़ा है। लेकिन शासन-प्रशासन न तो यहां समय पर बाढ़ को रोकने का उपाय कर पाया और न ही आपदा के बाद उसने सक्रिय दिखाई। राज्य सरकार और जिला प्रशासन बाढ़ में फंसे चार हजार से अधिक परिवारों को राहत पहुंचाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। इसके साथ ही उन सरकारी इंतजामों की भी पोल खुल गई जो बाढ़ नियंत्रण के लिए किये जाते रहे हैं।

 

बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में सिंचाई विभाग हरिद्वार द्वारा करोड़ों की लागत से बनाया गया बांध भ्रष्टाचार की बुनियाद पर खड़ा होने के चलते अक्सर मौसम की पहली ही बारिश में ही तहस-नहस होता रहा है। इस बार भी यह बांध लक्सर क्षेत्र में दो जगह से टूट चुका है। सिंचाई विभाग के लिए किसी दुधारू बन चुके गंगदासपुर सोपरी तटबंध पिछले कुछ वर्षों से लगातार क्षतिग्रस्त होते चले आ रहे हैं। जिसके मरम्मत के नाम पर सिंचाई विभाग के मगरमच्छ करोड़ों रुपए डकारते रहे हैं। करोड़ों रुपए की लागत से निर्मित बिशनपुर कुण्डी-गंगदांसपुर-बालावाती तटबंध के निर्माण में भारी भ्रष्टाचार करने वाले भ्रष्ट इंजीनियरों के विरुद्ध कार्रवाई न किया जाना जिला प्रशासन की लापरवाही को उजागर करने के लिए काफी है। जिला प्रशासन की इसी लापरवाही के चलते हरिद्वार के इस बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में प्रत्येक वर्ष करोड़ों का नुकसान होता रहा है।

 

इस वर्ष के जून माह में हुई भारी वर्षों के चलते सोपरी तटबंध के लक्सर में टूटने से हजारों लोग बेघर हो चुके हैं। सैकड़ों की तादाद में पालतू पशुओं की मौत तथा हजारों एकड़ फसल तबाह हो चुकी है। लेकिन बाढ़ नियंत्रण की तैयारियों से बेखबर हरिद्वार का जिला प्रशासन लक्सर क्षेत्र में बाढ़ पीड़ित लोगों तक राहत सामग्री नहीं भिजवा सका है। खानपुर से कांग्रेस विधायक कुंवर प्रणब चैम्पियन और केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत के बीच वाकयुद्ध चल रहा है। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में फंसे ग्रामीण मदद की आस में सरकार का मुंह देख रहे हैं लेकिन राज्य सरकार की उदासीनता बरकरार है। हरिद्वार की प्रभारी मंत्री इंदिरा हृदयेश मात्र एक बार लक्सर का दौरा कर वापस चली गईं। राहत सामग्री के वितरण में अव्यवस्था का आलम यह है कि जिले को प्राप्त राहत सामग्री मेला कंट्रोल रूम के गोदामों में पड़ी सड़ रही है। कुछ नेताओं ने तो बाहरी प्रदेशों से यहां पहुंची राहत सामग्री को झपटकर अपने गोदामों में भर लिया है। संसाधनों के अभाव का रोना रोने वाले हरिद्वार जिला प्रशासन की लापरवाही का ही परिणाम है कि बाढ़ के २५ दिन बाद भी लक्सर क्षेत्र के शेरपुर बेला दाबकी खेड़ारंजीत पुर भिक्कमपुर-बाक्खटरपुर बालावाली गंगदासपुर महाराजपुर सहित दर्जनों गांव के बाढ़ पीड़ित राहत से महरूम हैं।

 

बाढ़ से बचाव कार्यों की बात करें तो हरिद्वार के प्रशासन के पास कोई योजना नहीं है। आपदा प्रबंधन को लेकर भी हरिद्वार में कोई ठोस पहल नहीं की गई है। दिलचस्प यह है कि आपदा प्रबंधन अधिकारी ही बाढ़ नियंत्रण की योजनाएं बना रहे हैं। जबकि इस पद पर ३ वर्षीय प्रशिक्षण प्राप्त अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान है। सिंचाई खण्ड हरिद्वार में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि भ्रष्ट इंजीनियरों के भ्रष्टाचार से निर्मित लक्सर क्षेत्र के गंगदासपुर तथा सोपरी में निर्मित तटबंध में गुणवत्ता का कहीं नामो निशान ही नजर नहीं आता। सिंचाई विभाग के इंजीनियरों के लिए कामधेनु साबित हो रहे इस तटबंध की मरम्मत के नाम पर पिछले चार वर्षों में ही करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं। हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि सैकड़ों पालतु पशु हजारों मकान और सैकड़ों इंसानों की मौत का जिम्मेदार बने यह तटबंध ऊपर से सरकारी दरियादिली का आलम देखिए कि इन तटबंधों में भारी भ्रष्टाचार के आरोपी इंजीनियरिंग आज प्रोन्नति पाकर उच्च पदों पर तैनात हैं। २००९ में लक्सर क्षेत्र बाढ़ में पूरा ही डूब गया था। उस दौरान गंगदासपुर तटबंध टूटने से भारी तबाही हुई थी। तत्कालीन जिलाधिकारी हरिद्वार डॉ ़ आर मीनाक्षी सुन्दरम ने तब इस तटबंध के निर्माण में लापरवाही के लिए जिम्मेदार तत्कालीन अधिशासी अभियंता डीडी डालाकोटी -सिंचाई विभाग हरिद्वार को दोषी ठहराते हुए उनके विरुद्ध कार्यवाही के लिए शासन को लिखा था। लेकिन भाजपा सरकार में तत्कालीन सिंचाई मंत्री मातवर सिंह कण्डारी का वरदहस्त प्राप्त होने के कारण डालाकोटी के विरुद्ध कार्यवाही न हो सकी। परिणमास्वरूप जिम्मेदारी तय न होने के चलते करोड़ों की लागत से बने तटबंध टूट रहे हैं। गंगा और अन्य बरसाती नदियों ने हरिद्वार में जमकर तबाही मचाई है। अभी तक गंगा नदी से लगभग ४० शव बरामद किए जा चुके हैं। हरिद्वार प्रशासन का मानना है कि इनमें से तीन में बाढ़ के शिकार हुए। समूचे हरिद्वार जनपद में ४१ मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं। सैकड़ों की संख्या में मवेशी मरे। बांधों और मोटर मार्गों को भी भारी नुकसान हुआ है।

 

बात अपनी अपनी

गगदासपुर बांध ऊपर से थोड़ा क्षतिग्रसत हुआ है। जहां तक गुणवत्ता का सवाल है तो यह मेरे से पूर्व के अधिकारी द्वारा निर्मित किराया गया था। इस संबंध में मेरा कुछ भी कहना उचित नहीं होगा।

पुरुषोत्तम अधिशासी अभियंता सिंचाई खण्ड हरिद्वार

हरिद्वार का चार्ज लेते ही मेरा सामना आपदा से हुआ है। इसके बावजूद हरिद्वार की जाबांज पुलिस ने बाढ़ में फंसे सैकड़ों लोगों को बचाया है। जिसके चलते मानव हानि कम हर्इु।

राजीव स्वरूप एसएसपी हरिद्वार

 

कूड़े के आगे लाचार पालिका

पौड़ी। राज्य के सबसे पुराने निकायों में से एक गढ़वाल मण्डल मुख्यालय जैसे शहर की नगर पालिका पौड़ी का बुरा हाल है। साठ साल पुरानी यह पालिका आज तक अपने शहर के कूड़े के निस्तारण का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं कर पाई है। कभी इधर तो कभी उधर दबे पांव कूड़ा गाड़ियों से डाल कर काम चलाती आ रही है।

 

मंडल मुख्यालय पौड़ी में नगर पालिका प्रशासन के लिए कूड़ा निस्तारण बड़ा सिरदर्द बन गया है। नगर से पंद्रह किलोमीटर की परिधि के अंदर पालिका प्रशासन को एक अदद कूड़ा डंपिंग जोन नहीं मिल पा रहा है। जैसे-जैसे जनसंख्या में इजाफा हुआ कॉलोनियां बनीं और बसीं। आस-पास के गांवों का भी विस्तार हुआ वैसे-वैसे कूड़े का निस्तारण भी कठिन होता चला गया। पालिका और स्थानीय प्रशासन ने कभी इसे गंभीरता से नहीं लिया। कूड़ा प्रबंधन और निस्तारण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए। पालिका के जिम्मेदार लोग और यहां तक की जनप्रतिनिधि नहीं चेते। बस वही पुराना रवैया ओने-कोने में कूड़े का निस्तारण कर पल्ला झाड़ लेना जारी रहा नतीजा आज सामने है। स्थिति अब नियंत्रण से बाहर हो चुकी है। कचरा निस्तारित न होने से शहर में हालात दिन व दिन बदतर हो रहे हैं। करीब साठ वर्ष पुरानी पौड़ी की नगर पालिका अभी तक अपने शहर के कचरा निस्तारण की व्यवस्था नहीं कर पाई है। करीब आठ वर्षों से अपनाया जा रहा निस्तारण का गुपचुप फॉर्मूला भी अब जवाब दे गया है। ट्रीटमेंट प्लांट को लेकर विरोध के स्वर उठने लगे हैं।

 

पर्यटन नगरी कहे जाने वाले पौड़ी शहर के जिलाधिकारी कार्यालय के पास कई दिनों से बिखरा कूड़ा लोगों का सिरदर्द बना हुआ है। बस स्टेशन के ही नजारे को लें तो कचरे से उठ रही बदबू भयंकर बीमारी का आमंत्रण देती है। यही हाल बस स्टेशन से सिर्फ दो सौ मीटर दूर कोटद्वार रोड का है। सड़कों के किनारे और आवासीय बस्तियों के बीच लगे कचरे के ढेर आवारा पशुओं का ठिकाना बने क्षेत्रों में हैं। सफाई व्यवस्था के लिए जिम्मेदार नगर पालिका एवं जिला प्रशासन की चुप्पी से लगता है कि इस अव्यवस्था को मौन स्वीकूति दे दी है। जिला प्रशासन ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं। पालिका की कास्तानियों से आजिज आई जनता भी उसके खिलाफ लामबन्द हो चली है। लोगों के जबर्दस्त विरोध के चलते कूड़ा निस्तारण की समस्या पालिका के लिए नासूर बनती जा रही है। कहने को मण्डल मुख्यालय को पर्यटन नगरी के रूप में विकसित कस्बे के दावे हो रहे हैं लेकिन शहर आज जिस समस्या से जूझ रहा है उसका सर्वमान्य हल निकाला जाना नितांत जरूरी है। मेन बाजार के एक दुकानदार राकेश नेगी कहते हैं कि कूड़ा की समस्या नगर पालिका जैसी ही पुरानी है। चुनाव के समय उम्मीदवार इसी समस्या को मुद्दा बनाते हैं। लोग मतदान कर अपना प्रतिनिधि चुनते हैं लेकिन चुनाव जीतते ही जनप्रतिनिधि वादे से मुकर जाते हैं। जगह- जगह से कूड़ा निस्तारण को लेकर लोगों का विरोध झेल रही पालिका के सामने फिर नई समस्या खड़ी हो गई है। आखिर पौड़ी शहर का कूड़ा कहां डाला जाए। 

 

यशपाल बेनाम अध्यक्ष नगर पालिका पौड़ी के मुताबिक ट्रेनिंग ग्राउंड के लिए थली गांव व केवर्स गांव में जमीन उपलब्ध हो गयी है। ट्रेचिंग ग्राउंड में अभी बाउंड्री वाल बनाई जाएगी उसके बाद ही शहर का सारा कूड़ा जल्द ही निस्तारण किया जाएगा।

 

नहीं मिला शहीद का दर्जा

नई दिल्ली। उत्तराखण्ड में आई आपदा के दौरान रेस्क्यू ऑपरेशन में सेना और आईटीबीपी के जवान जी-जान से लगे थे। खतरनाक भौगोलिक परिस्थितियों और खराब मौसम में जवानों ने अपनी जान की परवाह किए बगैर विभिन्न क्षेत्रों में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बचाया। इस दौरान वायुसेना का एक हैलीकॉप्टर गौरीकुंड में क्रैश हो गया। जिसमें सेना और आईटीबीपी के जवान शहीद हो गए। लेकिन इस दुर्द्घघटना के बाद इन बहादुरों की मौत को अलग-अलग दर्जा मिला। मारे गए एयर फोर्स के जवान शहीद कहलाए जबकि आईटीबीपी के जवानों की गिनती सामन्य मौत के तौर पर की गई। 

 

२६ जून को हुए इस हैलीकॉप्टर दुर्द्घघटना में कुल २० जवान सवार थे। इनमें चार वायुसेना के जबकि १६ आईटीबीपी के थे। आईटीबीपी के ९ सदस्य नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ में डेप्यूटेशन पर थे। सरकारी नियमों के मुताबिक एयरफोर्स के जवानों को शहीद का दर्जा मिला लेकिन आईटीबीपी के सदस्यों को यह दर्जा नहीं मिला। एक ही दुर्द्घघटना में मरने वाले जवानों से दोहरा मापदंड अपनाना न्याय संगत नहीं है। जोशीमठ में तैनात आईटीबीपी के एक अधिकारी कहते हैं इस तरह के दोहरे मापदंड से हमारे जवानों का मनोबल गिरता है। ऐसा किसी नियम के तहत नहीं हो रहा है तो सरकार को नियमों में बदलाव कर सभी जवानों के लिए एक समान नियम बनाना चाहिए। यदि आईटीबीपी के जवानों को शहीद का दर्जा मिलता तो उनके परिवार वालों को सरकार की ओर से थोड़ी-बहुत सुविधाएं मिल जातीं। सैनिकों के शहीद से संबंधित नियम के मुताबिक शहीद जवान या अधिकारी के पुत्रों को नौकरी में आरक्षण मिलता है। इसके अलावा ट्रेन और एयर टिकट में भी उन्हें छूट मिलती है। गौरीकुंड में शहीद हुए आईटीबीपी के जवानों के परिवार वालों को ये सुविधाएं नहीं मिल पाएंगी। अखिल भारतीय केंद्रीय अर्द्धसैनिक पूर्व कर्मचारी कल्याण संघ के सचिव पीएस नायर कहते हैं केंद्र सरकार खुलेआम भेदभाव कर रही है। केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के जवान सीमा की रक्षा और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर आतंकवाद और नक्सलवाद से जूझ रहे हैं लेकिन उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया जा रहा है। अर्द्धसैनिक बलों के पूर्व जवानों और कर्मचारियों के हितों के लिए लड़ रहे नायर का कहना है कि सरकार ने सीआरपीएफ बीएसएफ आईटीबीपीएसएसबी सीआईएसएफ के जवानों को लंबी लड़ाई के बाद पूर्व केंद्रीय सशस्त्र पुलिस फोर्सकर्मी का दर्जा तो दिया लेकिन इस पर कई राज्य सरकारें अमल नहीं कर रही हैं। हर साल सैनिकों से ज्यादा अर्द्धसैनिक बलों के जवान शहीद हो रहे हैं लेकिन सरकर उन्हें उचित सम्मान नहीं दे पा रही है। 

 

 
         
 
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