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vad 14 23-09-2017
 
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आवरण कथा
 
डगमगाती नैया

सियासत में सरगोशियों की अहम भूमिका होती है जो अक्सर परिघटना को जन्म देती हैं। सूबे की मौजूदा सरगोशियां मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की रवानगी को लेकर हैं। आपदा में जिस तरह से इन्होंने संवेदनहीनता और काहिली दिखाई है उससे प्रदेश की जनता विधायक से लेकर पार्टी आलाकमान तक खफा है जिसकी परिणति नेतृत्व परिवर्तन के रूप में जल्द ही सामने आ सकती है

 

उत्तराखण्ड में आई प्राकृतिक आपदा ने राज्य की विजय बहुगुणा सरकार के लचर आपदा प्रबंधन तंत्र की जिस कदर पोल खोली उसे देख कांग्रेस आलाकमान बेचैन है। आपदा के बाद जहां केंद्रीय मंत्री हरीश रावत दुर्गम रास्तों से होकर पीड़ितों का हाल-चाल लेने गये वहीं पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक सबसे पहले केदारनाथ पहुंचे। इसके साथ ही वे आपदाग्रस्त क्षेत्रों में पैदल चलकर भी लोगों से मिले। लेकिन मुख्यमंत्री बहुगुणा आपदाग्रस्त क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण करते रह गए और नदी-घाटियों के बीच जहां-तहां फंसे तीर्थ यात्री एवं स्थानीय लोग भूख-प्यास से दम तोड़ते रहे। नौकरशाहों पर मुख्यमंत्री की पकड़ न होने के चलते आपदा से तबाह गांवों में शासन-प्रशासन के नुमाइंदे के तौर पर २० दिनों तक कोई पटवारी भी नहीं पहुंचा। नतीजा यह हुआ कि विपक्ष के साथ खुद कांग्रेस विधायकों को भी अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलना पड़ा। कांग्रेस आलाकमान इन सबको गंभीरता से लेकर मुख्यमंत्री बहुगुणा को चलता करने के मूड में बताई जाती है। सूत्रों के मुताबिक अब तक बहुगुणा की विदाई भी हो जाती लेकिन इस बीच भाजपा नेताओं ने मुख्यमंत्री के खिलाफ जो तीखे तेवर दिखाए उससे कांग्रेस जनता में यह संदेश नहीं देना चाहती थी कि उसने ऐसा विपक्ष की मांग पर किया। अब कांग्रेस जल्दी ही बहुगुणा को हटाने के मूड में है। फिलहाल उसके सामने प्रदेश का नया सूबेदार तय करने की भी चुनौती है। बताया जाता है कि इसके लिए विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल कैबिनेट मंत्री इंदिरा हृदयेश और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य के नाम उभर कर सामने आए हैं। खास बात यह है कि केंद्रीय मंत्री हरीश रावत एक बार फिर मुख्यमंत्री की दौड़ में पिछड़ते जा रहे हैं।

 

कांग्रेस आलाकमान इस बार भी रावत को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं हैं। बताया जाता है कि अतीत में उनका जितेन्द्र प्रसाद से जो साथ रहा उसे १० जनपथ आज तक नहीं भुला पाया है। इसके साथ ही पिछले वर्ष जब विजय बहुगुणा का नाम मुख्यमंत्री के तौर आगे आया उस वक्त भी रावत समर्थकों की खुली बगावत से कांग्रेस आलाकमान आज तक पीड़ित है। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक १० जनपथ के विरुद्ध जिस किसी भी नेता ने जाने की कोशिश की उसे बेशक पार्टी से बाहर न निकाला गया हो लेकिन ऐन वक्त पर उसके पर कतर दिये जाते हैं। उस पर कभी यकीन नहीं किया जाता है।

 

इसके विपरीत जो १० जनपथ का विश्वस्त रहा उसे ऊंचे ओहदों पर भी बिठाया गया। प्रणब मुखर्जी १० जनपथ के विश्वसनीय न होने के बावजूद इसलिए राष्ट्रपति बन गए कि कांग्रेस आलाकमान चाहता था कि प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की सूची से वे हमेशा के लिए अलग हो जाएं और दूसरे प्रणब दा को राष्ट्रपति पद के लिए अन्य दलों का समर्थन भी हासिल था। हरीश रावत को भी मजबूरी में केंद्रीय मंत्री अवश्य बनाया गया लेकिन १० जनपथ उन्हें राज्य की सूबेदारी देने का शायद ही मन बनाए। हालांकि रावत आज भी विजय बहुगुणा की तुलना में जनता में बेहद लोकप्रिय हैं और इस बार आपदा के दौरान जहां बहुगुणा ने हवाई दौरों के जरिये अपनी सरकार की किरकिरी कराई वहीं रावत ने दुर्गम रास्तों को पार कर लोगों के बीच पहुंचकर उनका दिल जीता। फिर भी अतीत की कुछ भूलें उनके रास्ते का रोड़ा बनी हुई हैं।

 

बहुगुणा के सम्मुख विपरीत स्थितियां पैदा होने की मुख्य वजह यह है कि राज्य में जब पिछले वर्ष अगस्त २०१२ में आपदा आई थी तो तब भी बहुगुणा ने पीड़ितों के बीच पहुंचने के बजाए उन्हें भजन-कीर्तन की जो सलाह दी उससे उनकी छवि जनता की नजरों में गिर गई थी। इस बार की आपदा ने तो उन्हें खलनायक ही बना दिया। १६ जून से प्रदेश में प्रकृति ने कहर बरपाना शुरू कर दिया था। लेकिन बहुगुणा प्रदेश को देखने के बजाए दिल्ली जा पहुंचे। इतना ही नहीं उन्होंने अपने विदेश दौरे के कार्यक्रम को रद्द करने की द्घोषणा भी तब की जब मीडिया और शोशल मीडिया के जरिये जनता ने उन्हें कोसना शुरू किया। आपदाग्रस्त क्षेत्रों में राहत सामग्री पहुंचाने के बजाए सरकारी तंत्र जिस प्रकार देहरादून में मजे में रहा उसे देखते हुए कांग्रेस विधायकों को भी मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोलना पड़ा। बदरीनाथ के विधायक राजेन्द्र भंडारी को मुख्यमंत्री ने यह कहकर नाराज किया कि आपदा पीड़ित सिर्फ आप ही नहीं बल्कि बहुत से लोग हैं। इस पर भंडारी ने मुख्यमंत्री से सवाल किया कि आप मेरे क्षेत्र की जनता को धमका रहे हैं? भंडारी और जनता के आक्रोश को देखते हुए मुख्यमंत्री ने वहां से खिसक लेने में ही भलाई समझी। इसी तरह केदारनाथ की विधायक शैलारानी रावत ने भी खुलेआम आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री आपदा पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने के बजाय नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि मुख्यमंत्री केदारनाथ क्षेत्र के लोगों के साथ सौतेला व्यवहार कर रहे हैं। यहां के स्थानीय लोगों का राहत से महरूम किया जा रहा है। धारचूला के विधायक हरीश धामी ने भी अपने क्षेत्र के आपदा पीड़ितों को राहत सामग्री न पहुंचाने के लिए बहुगुणा को दोषी करार दिया। धामी धारचूला स्थित तहसील परिसर में अपनी ही सरकार के विरुद्ध धरने पर बैठ गए थे। उनका आरोप था कि हैलीकॉप्टर से केवल पर्यटकों को ही निकाला जा रहा था जबकि स्थानीय लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। धामी के मुताबिक उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में विजय बहुगुणा का विरोध किया था। इसके चलते ही उनके विधानसभा क्षेत्र में राहत कार्यों में ढील दी गई।

 

जनप्रतिनिधियों के साथ ही राज्य के आम लोग इस बात से खफा हैं कि सरकार के मंत्री विधायक और मुख्यमंत्री के परिजन तक सर्वेक्षण के नाम पर हैलीकॉप्टरों से सैर-सपाटे करते रहे। कई बार तो उनके लिए आपदा सामग्री और प्रभावितों की उपेक्षा की गई। मीडिया को मैनेज करने के चक्कर में इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के कर्मचारियों को जिस कदर सैर-सपाटे कराए गए उसे देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे तक नाराज दिखे। जब वे उत्तराखण्ड के दौरे पर गए तो उन्होंने एक हैलीकॉप्टर के पायलट को तलब किया और उससे पूछा कि एक पत्रकार में कितना वजन होता है पायलट ने कहा कि यही कोई ६०-७० किलोग्राम। इस पर शिंदे ने कहा कि अगर पत्रकार के बजाए इतने ही वजन की राहत सामग्री ले जाई जाए तो कई लोगों की जिंदगी नहीं बचेगी?

 

बहुगुणा सरकार का संवेदनहीन रवैया यहीं तक सीमित नहीं रहा। मृतकों के आंकड़ों को सरकार छुपाती रही। अभी पिछले दिनों तक जहां बहुगुणा मृतकों के आंकड़े को एक हजार से ज्यादा नहीं बता रहे थे वहीं संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ की सर्वे टीम ने यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि मृतकों का आंकड़ा ११ हजार के पार है। विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने अवश्य बेहिचक स्वीकार किया कि मृतकों की संख्या १० हजार से अधिक हो सकती है। बिहार के पूर्व मंत्री अश्विनी चौबे ने तो २० जून को ही यह कहकर कांग्रेस सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया था कि मरने वालों की संख्या २०-२५ हजार है। इसी वक्त बहुगुणा कह रहे थे कि आपदा में मरने वाले डेढ़ सौ लोग हैं। मुख्यमंत्री बहुगुणा की संवेदनहीनता का एक प्रमाण यह भी है कि गत वर्ष उत्तरकाशी में आई आपदा के बावजूद भागीरथी नदी के किनारे बाढ़ रोकने के उपाय नहीं किये गये।

 

बहरहाल अब कांग्रेस बहुगुणा को विराम देने के मूड में है। पार्टी बखूबी जान चुकी है कि बहुगुणा में इंसानी जज्बात न के बराबर है। वे कोर्ट-कचहरी तो चला सकते हैं लेकिन राज्य नहीं। फिलहाल कांग्रेस सुप्रीमो को नए मुखिया के रूप में एक ऐसे नेता की तलाश है जो राज्य की जनता की भावनाओं को बखूबी समझ सके। सूत्रों के मुताबिक गत दिनों १० जनपथ ने बहुगुणा को उत्तराखण्ड की गद्दी से उतारने का पूरा मन बना लिया था। लेकिन ऐन वक्त पर भाजपा नेता सुषमा स्वराज के एक ट्वीट ने उन्हें जीवन दान दे दिया। उस वक्त उन्हें हटाए जाने का संदेश यह जा सकता था कि कांग्रेस भाजपा के सामने झुक गई। बहुगुणा के हटने की स्थिति में राज्य के नए सूबेदार के तौर पर विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल का नाम सबसे ऊपर है। कुंजवाल ने भ्रष्टाचार और आपदा के मामले में अपनी ही सरकार के मुखिया को जिस तरह से द्घेरा वह काबिले तारीफ है। इसके अलावा वे हरीश रावत के समर्थक माने जाते हैं। रावत को मुख्यमंत्री बनाने के लिए ना-नुकर कर रही है कांग्रेस कुंजवाल को आगे कर एक तीर से दो निशाने साध सकती है। पहला यह कि कुंजवाल का नाम आने के बाद हरीश रावत विरोधी तेवर नहीं अपना पाएंगे। दूसरा यह कि विधानसभा अध्यक्ष रहते हुए कुंजवाल की जो भ्रष्टाचार विरोधी छवि बनी है वह कांग्रेस कैश करने के मूड में है। कांग्रेस आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर भी मुख्यमंत्री बदलना चाह रही है। विजय बहुगुणा के रहते कांग्रेस की जो भ्रष्ट छवि समाने आई है उसको कुछ हद तक खत्म करने के लिए कुंजवाल ही पार्टी को नया चेहरा दिख रहे हैं। इसके अलावा कैबिनेट मंत्री इंदिरा हृदयेश का नाम भी मुख्यमंत्री की दौड़ में आ रहा है। इंदिरा हृदयेश को मुख्यमंत्री बनाने का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि दिल्ली के बाद किसी दूसरे प्रदेश की कमान महिला को सौंपी जाएगी। चार माह बाद होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव की दृष्टि से कांग्रेस यह भी संदेश दे पाएगी कि वह महिलाओं को प्राथमिकता देने में आगे हैं। इसी के साथ हृदयेश को नौकरशाही से सख्त लहजे में काम कराने में भी महारत हासिल है। यह जगजाहिर है कि उत्तराखण्ड के नौकरशाह इतना मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से खौफ नहीं खाते जितना कि इंदिरा हृदयेश से। मुख्यमंत्री की दौड़ में कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य का नाम भी प्रमुखता से लिया जा रहा है। आर्य की खूबी यह है कि वे बेशक बहुगुणा गुट के माने जाते हैं लेकिन उनके संबंध सभी गुटों के नेताओं से सामान्य रहते हैं। उनकी छवि अड़ियल की भी नहीं है। आर्य की खामियां यह है कि उनके कार्यकाल में आपदा प्रबंधन तंत्र बुरी तरह असफल रहा। फिर भी उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के पीछे कांग्रेस की एक सोच यह हो सकती है कि वह दलित हैं। एक दलित को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी पूरे देश में यह संदेश देना चाहेगी कि बसपा ही नहीं कांग्रेस भी दलितों को राजनीति की मुख्यधारा में लाना चाहती है। २०१४ के लोकसभा चुनाव में दलित वोटों को आकर्षित करने के लिए पार्टी आर्य पर भी दांव खेल सकती है। कुल मिलाकर विजय बहुगुणा का जाना तय माना जा रहा है। इस बीच प्रदेश और प्रवास में यह भी चर्चाएं रही कि मुख्यमंत्री ने ५० करोड़ रुपए में मीडिया मैनेज करने का ठेका दे दिया है। इसमें कितनी सच्चाई है यह तो बहुगुणा ही बता सकते हैं। लेकिन यह तो कटु सत्य है कि मीडिया को मैनेज करने की बहुगुणा के कार्यकाल में हर हथकंडे अपनाए गए। जब यह बात हर आदमी की जुबान से निकलने लगी तो सरकार ने डैमेज कंट्रोल के तौर पर सूचना महानिदेशक विनोद शर्मा और सूचना सचिव एमएच खान का स्थानांतरण कर दिया मगर लोगों के दिलों में जो बात बैठ गई उसका बहुगुणा सरकार के पास कोई उपाय नहीं है।

 

बहुगुणा चाहते तो प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ ़ रमेश पोखरियाल निशंक की तरह आपदा पीड़ितों के पहुंचने में देर नहीं लगाते। लेकिन वे न जाने क्यों संवेदनहीन बने रहे। गौरतलब है कि १८ अगस्त २०१० की सुमगढ़ की दर्दनाक घटना जिसमें १८ छात्र आपदा की भेंट चढ़ गए थे। तराई में भी बाढ़ ने भीषण तबाही मचाई थी। तब निशंक नाव और ट्यूब के जरिये पीड़ितों तक पहुंचे थें इस बार भी वे  केदारनाथ पहुंचने वाले पहले राजनेता है।


 
         
 
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उत्तरकाशी जिले में बाड़ाहाट नगर के निकट माण्डौं गांव में स्थित शांति साधना कुटीर बारही शक्तिपीठ में गोबर से तैयार गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया गया। गंगा जल से भरे सूक्ष्म जल कुंड में

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