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देश-दुनिया 
 
वह मुठभेड़ थी फर्जी

आखिरकार सीबीआई की चार्जशीट को लेकर कायम रहस्य ३ जुलाई को खत्म हो गया। गुजरात हाईकोर्ट के निर्देश पर इशरत जहां एनकाउंटर मामले में दाखिल की गई चार्जशीट में सीबीआई ने साफ कर दिया कि इशरत जहां का एनकाउंटर फर्जी था। इसमें कहा गया है कि इशरत जहां जून २००४ को मुठभेड़ में मारी गई। रिपोर्ट के मुताबिक इशरत को सिर्फ इसलिए मार दिया गया था क्योंकि उसने इंटेलीजेंस ब्यूरो के लोगों को अमजद अली राणा का अपहरण होते हुए देख लिया था। बहरहाल इस चार्जशीट में सीबीआई ने ९ पुलिसकर्मियों को नामजद किया है। लेकिन मुठभेड़ के नौ साल बाद दायर इस आरोप पत्र में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का नाम तक नहीं लिया गया है। जबकि यह मुठभेड़ नरेंद्र मोदी को मारने की भनक पर हुई थी। दरअसल अभी भी माना जा रहा है कि यह एक गंभीर राजनीतिक उठा-पटक है। यह मामला कानूनी होते हुए भी सियासत भरी चाल है।

 

आरोप पत्र में यह दावा किया गया है कि जावेद शेख उर्फ प्रणेश पिल्लई अमजद अली और जीशान जोहर के एनकाउंटर को लेकर अधिकारी एकमत थेलेकिन इशरत जहां को मारने को लेकर मतभेद था। इस संबंध में दर्ज की गई प्राथमिकी पर भी सवाल उठा है। गुजरात पुलिस ने एफआईआर में लश्करे-ए-तैयबा के चार आतंकियों द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या का हवाला दिया है। जबकि सीबीआई ने चार्जशीट में दावा किया है कि एफआईआर एनकाउंटर के पहले ही तैयार कर ली गई थी। इसके मुताबिक इशरत जहां एनकाउंटर गुजरात पुलिस और आईबी का ज्वाइंट ऑपरेशन था।

 

इस आरोप पत्र की सबसे खास बात यह कि गृह मंत्रालय जिसको निर्दोष होने का दावा कर रहा था वह भी इसमें शामिल है। चार्जशीट में गुजरात में आईबी के तत्कालीन ज्वाइंट डायरेक्टर राजेंद्र कुमार समेत आईबी के चार अधिकारियों एनके सिन्हा राजीव वानखेड़े और एक अन्य को भी मुठभेड़ में शामिल माना गया है लेकिन अभी इन्हें आरोपी नहीं बनाया गया है। इन पर सीबीआई की जांच जारी है। 

 

इस मुठभेड़ की जांच को लेकर पहले से केंद्र सरकार की दो एजेंसियां सीबीआई और आईबी आमने -सामने हैं। दोनों के आरोपों के बीच नरेंद्र मोदी बार बार यह बात दोहरा रहे हैं कि सरकार उनको जबरन फंसाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल कर रही है और इस फेर में आईबी का मनोबल तोड़ा जा रहा है। दरअसल आईबी के फीडबैक के आधार पर ही गुजरात पुलिस ने २००४ में इशरत जहां और उसके तीन साथियों का अहमदाबाद के पास एनकाउंटर किया था।

 

मगर एनकाउंटर के कुछ दिनों बाद ही इसकी वैधता को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। कई जांच दलों से गुजर कर मामला कोर्ट में पहुंचा। यहां गुजरात पुलिस ने कहा कि आईबी के मौजूदा स्पेशल डायरेक्टर राजेंद्र कुमार की टीम से मिली लीड को फॉलो करते हुए यह ऑपरेशन किया गया। इसके बावजूद मामले की जांच कर रही सीबीआई राजेंद्र कुमार को शिकंजे में लेने की कोशिश करती रही। अपने अधिकारी को जांच के दायरे में आता देखकर गृह मंत्रालय भी बचाव की मुद्रा में आ गया। गृह मंत्रालय ने ३० सितंबर २००९ में गुजरात हाई कोर्ट को सौंपे अपने दूसरे हलफनामे में इशरत और उसके साथियों के आतंकी होने के पुख्ता सुबूत नहीं होने का दावा किया था। इसके बाद ही अदालत ने इसकी सीबीआई जांच का आदेश दिया। सीबीआई इस मामले में राजेंद्र कुमार को आरोपी बनाने में कामयाब रही जो १९७९ बैच के आईएसएस अधिकारी हैं। उस समय वे अहमदाबाद में इंटेलीजेंस ब्यूरो में संयुक्त निदेशक के पद पर तैनात थे। ६ अगस्त २००९ में अपने पहले हलफनामे में गृह मंत्रालय ने इशरत और उसके साथियों को लश्करे-तैयबा का आतंकी बताते हुए मुठभेड़ की सीबीआई जांच का विरोध किया था लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम के दबाव में दो महीने के भीतर ही हलफनामा बदल दिया गया। इस बीच सीबीआई ने इस मामले की जांच कर रहे अपने अधिकारियों को और सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की। सीबीआई के मुताबिक मामले की जांच कर रहे एक अधिकारी को जान से मारने की धमकी मिली है। इसकी पुष्टि सीबीआई के डायरेक्टर रंजीत सिन्हा ने की। बहरहाल दो एजेंसियों के बीच तनातनी के दौरान दायर आरोप पत्र के बाद बीजेपी की प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कहा कि आईबी प्रधानमंत्री और गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करता है तो क्या इस एनकाउंटर के बारे में प्रधानमंत्री को पता था? उन्होंने सीबीआई पर निशाना साधते हुए कहा कि एनकाउंटर में मारे गए लोगों के किनसे ताल्लुकात थे इस पर चुप्पी क्यों है। उन्होंने पूछा क्या यह सच नहीं है कि ये लश्कर के आतंकी थे?

 

मची खलबली

एक नाम जो कुछ दिन पहले तक दुनिया के लिए अजनबी था लेकिन महाशक्ति अमेरिका की पोल खोलने के कारण बेहद चर्चित हुआ। वह नाम है एडवर्ड स्नोडेन। उन्तीस वर्षीय स्नोडेन ने अपनी जिंदगी पर खतरा मोल लेते हुए अमेरिका के उस सच को सामने लाने का साहस किया जिसे सब जानते-समझते और चुपचाप बर्दाश्त करते हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के लिए तकनीकी सहायक के रूप में कार्य कर चुके स्नोडेन ने खुलासा किया कि आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर किस तरह अमेरिका के लोगों की निजी जिंदगी में तांक-झांक करता आ रहा है। इतना ही नहीं वह निजता के अधिकार का भी हनन कर रहा है। विकिलिक्स के बाद एडवर्ड स्नोडेन के ये खुलासे अब अमेरिका को मुश्किल में डालने और उसकी छवि को दागदार बनाने वाले हैं। दरअसल एडवर्ड स्नोडेन मीडिया को यह जानकारी देने के बाद हांगकांग चले गये थे। वहां से २३ जून को मास्को के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचे। अब वे कानूनी तौर पर एक 'तटस्थ क्षेत्र' में रह रहे हैं। वे इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि उन्हें कब इक्वाडोर में राजनीतिक शरण दी जाएगी। स्नोडेन ने हांगकांग का चयन इसलिए किया क्योंकि वहां बोलने की आजादी और राजनीतिक समझ काफी मजबूत है। स्नोडेन के मुताबिक हांगकांग ऐसा देश है जो अमेरिकी सरकार के हुक्म की नाफरमानी कर सकता है। इसके बाद अमेरिका न्याय विभाग ने स्नोडेन के खिलाफ देशद्रोह का आपराधिक मुकदमा दर्ज किया। साथ ही खुफिया निगरानी अभियान का ब्योरा सार्वजनिक करने का आरोप भी लगाया है। इसके पहले स्नोडेन का अमेरिकी पासपोर्ट रद्द कर दिया गया। अगर उन पर अमेरिका में मुकदमा चलाया जाएगा तो उन्हें मौत की सजा भी सुनाई जा सकती है।

 

एडवर्ड स्नोडेन देशप्रेमी हैं या देशद्रोही यह विश्व मंच पर चर्चा का विषय है। लेकिन यह लगने लगा है कि इस प्रकरण से अमेरिका का असली चेहरा दुनिया के सामने आ गया है। इसकी पुष्टि इस बात से की जा सकती है कि पिछले दिनों अमेरिकी अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्त्ता जॉन पाकिंस ने अपनी आत्मकथा 'कंफेसन ऑफ एन इकोनॉमिक हिट मैन' में अमेरिकी पूंजीवदी नीतियों का खुलासा करते हुए लिखा था कि अपनी विलासिता की पूर्ति के लिए विश्व के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाने के लिए अमेरिका ने तमाम नैतिकता को ताक पर रखते हुए कहीं गृह युद्ध कराए तो कहीं तानाशाही कायम करने में मदद की। इतना ही नहीं कहीं आक्रमण करवाए तो कहीं विकास के नाम पर भारी कर्ज तले रौंदा गया और बदले में मनचाहा दोहन वहां की प्राकृतिक संपदा का किया। ३० जून को खबर आई कि यूरोपीय संसद के प्रमुख ने अमेरिका से उस रिपोर्ट पर पूरी सफाई मांगी है जिसके अनुसार अमेरिका में यूरोपीय संघ के कुछ प्रमुख परिसरों की जासूसी कराई गई है। इस रिपोर्ट में वर्ष २०१० के एक गोपनीय दस्तावेज का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया है कि अमेरिका ने न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन में मौजूद यूरोपीय संघ के कार्यालयों की जासूसी कराई। इस दस्तावेज के मुताबिक अमेरिका ने यूरोपीय संघ को निशाना बनाया था। हालांकि यह साफ नहीं हुआ कि अमेरिकी जासूसों को कौन सी सूचनाएं हाथ लगी हैं। इससे पहले एक नई बात यह सामने आई कि एडवर्ड के पिता लोनी स्नोडेन ने दो टीवी चैनलों में साक्षात्कार दिया। जिसमें उन्होंने कहा कि एडवर्ड इस शर्त पर अमेरिका लौट सकता है कि उसे अदालत के फैसले से पहले गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि स्नोडेन किसी खास वजह के बिना ऐसी हरकत नहीं कर सकता। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि स्नोडेन कांड को इतना ज्यादा तूल नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि अमेरिका को चीन और रूस से मिलकर कई कार्य सम्पन्न करने हैं। इसके बावजूद यह मामला इतना पेंचीदा और रबर की तरह बढ़ता जा रहा है कि कई देशों के बीच मनमुटाव भी उभर कर सामने आए हैं। हांगकांग से मास्को के लिए जब स्नोडेन रवाना हुए तो अमेरिका ने रूस से कहा कि वह स्नोडेन को अमेरिका के हवाले कर दे। जबकि रूस और अमेरिका के बीच प्रत्यपर्ण संधि प्रतिपादित नहीं है। फिर भी रूस के मानवाधिकार कार्यकर्त्ता स्नोडेन के बचाव में उतर आए हैं। उनके मुताबिक स्नोडेन 'स्वतंत्रता सेनानी' है। इस सिलसिले में मानवाधिकार परिषद के सदस्यों ने एडवर्ड स्नोडेन को अपने देश में राजनीतिक शरण प्रदान करने के लिए सरकार से अपील करने का फैसला किया है। 

 
         
 
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  • दाताराम चमोली

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