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vad 26 16-12-2017
 
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आपदा पर विशेष

उत्तराखण्ड सरकार खुद तो आपदाग्रस्त क्षेत्रों में राहत सामग्री पहुंचाने में नाकाम हो रही है और मदद के लिए जो हाथ आगे बढ़ रहे हैं उन्हें भी सहयोग देने से भी गुरुरेज कर रही है। यही वजह है कि आपदा राहत सामग्री जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने के बजाय नोडल केंद्रों और सड़कों पर सड़ रही हैं। लेकिन सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। फिर भी सरकार आपदा राहत कामों का ढिंढोरा पीटने में लगी हुई है। सरकारी दावों की असलियत यह है कि अधिकांश जगहो पर राहत सामग्री नहीं भेजी जा रही हैं और जहां कहीं कुछ सरकारी मदद पहुंच रही है वहां भी जनता के साथ भद्दा मजाक किया जा रहा है। एक परिवार को राहत सामग्री में दो सौ ग्राम चावल सौ ग्राम दाल और इतना ही तेल दिया जा रहा है। इस राहत रसद का बंटवारा करने में प्रशासन की फजीहत भी हो रही है।

 

गौरतलब है कि राज्य में भारी आपदा होने से लगभग पूरे उत्तराखण्ड के हालात बद से बदतर हो चले हैं। करीब तीन सप्ताह का समय बीत जाने के बावजूद राज्य सरकार राहत के नाम पर कुछ नहीं कर पाई है। ऐसा नहीं है कि खाद्यान की कमी हो रही है। लेकिन शासन-प्रशासन में पीड़ितों तक पहुंचने की इच्छा शक्ति का अभाव दिखाई दे रहा है। बाहरी राज्यों अौर सवंयसेवी संगठनों के द्वारा राज्य में भेजी गई राहत सामग्री को एक हफ्ते तक देहरादून के महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स कॉलेज रायपुर और ट्रांसपोर्ट नगर में बनाये गये नोडल केन्द्रों में ही डम्प कर के रखा गया जिससे अधिकांश सामान खराब तक होने लगालेकिन प्रशासन और सरकार के पास इस सामान को आपदा पीड़ितों तक पुहंचाने का कोई रास्ता तक नहीं दिखाई दिया। 

 

हैरत की बात तो यह है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा दिल्ली से राहत सामग्री के जो १२५ ट्रक भेजे गए उन्हें रिसीव करने वाला कोई नहीं था और वे सभी ट्रक कई दिनों तक ऋषिकेश में ही खड़े रहे। इन ट्रकों में डीजल तक समाप्त हो चुका था। ट्रक ड्राइवरों तक को खाने के लाले पड़ चुके थे। तीन चार दिनों के बाद इस सामान को छोटे-छोटे ट्रकों में भर कर पहाड़ी क्षेत्रों में भिजवाया गया। वैसे इन ट्रकों में राशन के नाम पर बिस्किट और मिनरल वाटर की बोतलें हैं। यह भी कोंग्रेस पार्टी और सरकार के राहत के प्रयास की बानगी भर है। अब भी ऋषिकेश में कई स्थानों पर राहत सामग्री डम्प पड़ी हुई है। इनमें मनेरी भाली कॉलोनी के गोदाम डिग्री कालेज ऋषिकेश मुनि की रेती नगर पंचायत के गोदाम और ऋषिकेश के आनंद उत्सव मण्डप में राहत सामग्री बर्बाद हो रही है। इसी तरह से रानीपोखरी इंटर कॉलेज और भानियावाला में बनाये गये गोदामों में भी राहत सामग्री खराब हो रही है। जबकि आपदा से प्रभावित जिलों उत्तरकाशी रुद्रप्रयाग और चमोली के सैकड़ों गांव में आपदा के बीस दिन गुजर जाने के बाद भुखमरी के हालात पैदा हो चुके हैं। उन गांवों के हालात सबसे अधिक खराब हो चले हैं जहां के स्थानीय निवासियों ने आपदा से त्रस्त तीर्थ यात्रियों को कई दिनों तक अपने द्घरों में खाना खिलाया था। अधिकतर गांवों में लोगों के पास का राशन समाप्त हो चुका है और अब वे भी भुखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं।

 

उत्तरकाशी जिले के २७६ गांवों में राहत सामग्री नहीं पहुंच पाई है। लगभग सभी सड़कें टूट चुकी हैं और उनमें किसी प्रकार का आवागमन भी नहीं हो सकता। हालांकि हैलीकॉप्टर से राहत सामग्री भेजे जाने की कवायद आरंभ की गई है लेकिन वह भी बड़े कम मात्रा में प्रशासन द्वारा बनाये गये केवल ११ सेक्टरों तक ही सीमित है। यमुनोत्री घाटी की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आ पाया है। गंगोत्री घाटी के कुछ सेक्टरों के केन्द्रों में रसद पहुंची भी तो आपदा पीड़ित गांवों में पहुंचाने के लिये कोई राह नहीं मिल पा रही है। इसी प्रकार डिसारी उपला टकनौर असी गंगा घाटी के दर्जनों गांवों में और यमुना घाटी के खरादी ठकराल व गीठ पट्टी के दर्जनों गांवो में राहत सामग्री नहीं पहुंच पा रही हैं।

 

इसी प्रकार जिले के नौ गांव भंकोली डासडा दंदालका अगोड़ा सैकू गंवाणा नैताला सिरोर हिना मनेरी जामक कामर बयाणा ओथरू ओंगी टिपरी सिंलग जुड़ावभटवाड़ी सैंज जखोल गोरसाली द्वारीपाही रैथलनटीण बंद्राणी क्यार्क पाला बारसू सांलग तिहारभुक्की स्याबा सेरी सौलू भेल कुज्जन पिलंग जैंकाणी जैसे कई दूरस्थ गांवों में राहत सामग्री और रसद की जरूरत है। इन क्षेत्रों में खाद्यान की बेहद कमी हो चली है और भुखमरी के हालात बन चुके हैं। अगर प्रशासन इन क्षेत्रों में रसद के इंतजाम नहीं कर पाता है तो हालात और भी बदतर हो सकते हैं। 

 

रुद्रप्रयाग जिले के हालात बेहद खराब हैं। संपूर्ण केदार घाटी के आपदा ग्रस्त सैकड़ों गांवो में से अभी तक केवल ऊखीमठ तहसील के १०३ गांवों तक ही राहत सामग्री पहुंच पाई है जबकि तहसील के ९७ गांवो में राहत के नाम पर कुछ भी नहीं पहुंचाया जा सका है। इन ९७ गांवों में भी भुखमरी के हालात पैदा हो गए हैं। ऊखीमठ में आपदा राहत के नाम पर मजाक किया जा रहा है। गांवों की जनसंख्या के आंकड़े प्रशासन के पास उपलब्ध तक नहीं हैं जिससे वास्तविक जनसंख्या से कम परिवारों के हिसाब से राहत सामग्री भेजी गई है। कई गांवों का सड़क मार्ग से पूरी तरह संपर्क टूट चुका है जिस कारण वहां केवल हैलीकॉप्टर से ही रसद पहुंचाई जा सकती है। लेकिन जिला प्रशासन अभी तक नाकाम रहा है। जिले की कालीमठ घाटी के कई गांवों में भी हालत खराब हो चले हैं। 

 

अगस्तमुनी चंद्रांपुरी त्रिजुगीनारायण में भी भुखमरी के हालात हैं। कुछ जगहों पर प्रशासन द्वारा खाने के पैकेट भिजवाये गये हैं लेकिन वह नाकाफी हैं। त्रिजुगीनारायण के हालात तो बदतर बताए जा रहे हैं। चमोली जिले में भी हालात सुधरने के नाम नहीं ले रहे हैं। तकरीबन दो सौ गांव सड़क मार्गं से पूरी तरह कट चुके हैं। जोशीमठ विकास खण्ड की उर्गम घाटी के हालात खराब हैं। यहां आपदा के कई दिनों के बाद भी खाद्यान्न नहीं पहुंच पाया है। पिनैलालामबगड़ नीती कैलरपुर माणा गोविंद घाट पाण्डुकेश्वर और पिण्डर घाटी के थराली हरमल चैतिंग रामपुर मोपाटा ओडर लिंगड़ी तथा अरोठागांवो मे रसद का इंतजार है। इसी तरह देवाल घाटी में भी धारकुआं पाटा तोरती भैरिंया बगड़ सेैरीगाड ऋषि बगड पिनांउ बाण गांवों में रसद नहीं पहुंच पाई है।

 

ऐसा नहीं है कि प्रशसन के पास खद्यान की कोई कमी है चमोली के गोपेश्वर में खाद्यान्न के भण्डार भरे पड़े हैं। कर्णप्रयाग में राहत सामग्री के लिये बड़ा नोडल केन्द्र बनाया गया है जिसमें देश के विभिन्न क्षेत्रों से लाई गई राहत सामग्री पड़ी हुई है। इसके अलावा सरकार के पास गोपेश्वर के गोदामों में समान पड़ा हुआ है। जानकारी के अनुसार जहां आटा ११३ कुंतल आया है वहीं सिर्फ ४ कुंतल ही वितरित किया गया है। इसी तरह १३० कुंतल चावल से केवल ४ कुंतल ही वितरित किया जा सका। पांच कुंतल दाल में से केवल १ कुतंल और तेल के ११ टिनो में से केवल २ टिन ही बांटे गये हैं। इसी प्रकार कई कुंतल चीनी आलू और कम्बल बंटने के इंतजार में हैं। कर्णप्रयाग के नोडल केन्द्र में भी सैकड़ों कुंतल आटा दाल चावल कम्बल टैंट तिरपाल आदि पड़े हुये हैं लेकिन उनका भी पूरा वितरण नहीं हो पाया है।

 

आपदा के बीस दिनों के बाद भी सरकार राहत सामग्री को बांटने की कोई कार्ययोजना तैयार कर सकी है। इसके कारण इसकी दुर्गति हो रही है। कोटद्वार में राहत के लिये दी गई मिनरल वाटर की बोतलों से कर्मचारी स्नान करते पाये गये हैं और सहस्रधारा हैलीपैड में दी गई फ्रूटी की बोतलों को सरकारी अधिकारी और कर्मचारी पीते नजर आये हैं।

 

सरकार और प्रशासन राहत सामग्री को लेकर कितना संजीदा है इसका पता भी सहस्रधारा हैलीपैड में ही दिखाई दिया जहां खुले में पड़ा राहत का सामान सड़ता रहा लेकिन उसका कोई रखवाला नहीं बनाया जा सका। हालत को और भी बदतर करने में स्वयं राज्य सरकार के मंत्रियों का भी हाथ रहा है। कृषि मंत्री हरक सिंह रावत हैलीपैड से नैशनल मीडिया के पत्रकारों को अपने साथ आपदा क्षेत्र के हवाई दौरों पर तो ले गये लेकिन हैलीकॉप्टर का बजन बढ़ने पर वे मीडिया को उतारने की बजाय राहत सामग्री उतार कर चलत बने।

 

सरकार के बड़े-बड़े दावों के अनुसार राहत सामग्री लाने वाले लोगों के लिए कई सूचना तंत्र भी बनाए गए हैं। लेकिन राजस्थान के भीलवाड़ा से एक ट्रक भर के राहत सामगी लाने वाले दो युवक देहरादून में कई स्थानों पर ट्रक द्घुमाते रहे लेकिन उनसे देर रात तक राहत सामग्री रिसीव करने को कोई तैयार नहीं हुआ जबकि वे सभी नोडल केन्द्रों पर भी गये। हर जगह उनको निराशा ही हाथ लगी। जानकारी के मुताबिक कई जगह पर उनसे कहा गया कि अब सामान नहीं ले सकते और कुछ जगहों पर बताया गया कि सामान रखने की जगह नहीं है। थक हार कर वे स्पोर्ट्स कालेज गए तो उनसे देर रात तक सड़क पर ही अपना ट्रक खड़ा करना पड़ा और रात भर भारी बारिश से पेरशान रहे। कुछ संगठन और उत्साहित लोग आपदाग्रस्त क्षेत्रों में जाना चाहते हैं लेकिन शासन-प्रशासन से उन्हें सहयोग नहीं मिल पा रहा है। उनके द्वारा लाई गई राहत सामग्री रास्तों में बर्बाद हो रही हैं।


 
         
 
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  • जीवन सिंह टनवाल

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