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आपदा पर विशेष

आपदाग्रस्त क्षेत्रों में तबाह हुए सैकड़ों गांवों में राहत पहुंचाना तो दूर शासन-प्रशासन पीड़ितों से संपर्क तक नहीं कर पाया है। ऐसे में लोग भूख से जूझ रहे हैं। लेकिन आपदा राहत सामग्री सड़कों और नोडल केंद्रों पर पड़ी सड़ रही हैं। यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जिन ट्रकों को दिल्ली से हरी झंडी दिखाई थी वे भी कई दिनों तक ऋषिकेश में ही खड़े रहे


 

भारत-नेपाल सीमा पर बसे धारचूला शहर और उसके आस-पास के इलाकों के लोग अक्सर आसमान को निहारते रहते हैं। जब भी कोई आसमान में उड़ता हैलीकॉप्टर उधर से गुजरता है तो लोग उसे देखकर यह पहचानने की कोशिश करते हैं कि यह भारत का है या नेपाल का हैलीकॉप्टर लाल रंग का हुआ तो नेपाल का और खाकी रंग का दिखाई दिया तो भारत का। लाल रंग के हैलीकॉप्टर को देखकर भारत के लोग नेपाल सरकार की सराहना करना नहीं अघाते हैं। कहते हैं कि पड़ोसी देश ने अपने आपदा पीड़ितों को न केवल सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया बल्कि उनके लिए राहत सामग्री की भी कमी नहीं आने दी। नेपाल सरकार प्रभावितों के एक-एक घर तक पहुंचने में कामयाब है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ जैसे ही खाकी रंग का हैलीकॉप्टर आसमान में उड़ता दिखाई देता है अपने बिछुड़े हुए परिजनों की चिंता चेहरों पर स्पष्ट दिखाई देता है। उम्मीद जगती है कि शायद इस हैलीकॉप्टर से आपदा में फंसे उनके सुरक्षित पहुंचेंगे। लेकिन जब किसी के आने की सूचना नहीं मिलती तो निराशा हाथ लगती हैं और मुरझा जाते हैं।

 

स्थानीय लोगों के अनुसार धारचूला के अलावा मुन्स्यारी बलुवाकोट जौलजीबी मदकोट और बरम क्षेत्र के करीब ३००० लोग अभी भी उच्च हिमालयी क्षेत्र के जौहर दारमा एवं व्यास घाटियों और छिपलाकेदार में फंसे हुए हैं। यहां फंसे हुए लोग प्रवास माइग्रेसन और कीड़ा जड़ी (यारसागंबू) एकत्रित करने के उदेश्य से वहां पहुंचे थे। धारचूला और मुनस्यारी क्षेत्र का शायद कोई गांव बचा हो जहां के लोग उच्च हिमालयी क्षेत्र में न फंसे हों। जब से कीड़ा जड़ी को इस क्षेत्र के लोगों ने आजीविका के नए साधन के रूप में स्वीकार किया है तब से प्रति वर्ष मई-जून के महीने में लोग इसकी खोज में हिमालय के बुग्यालों में निकल जाते हैं। धारचूला के कांग्रेस विधायक हरीश धामी भी हजारों लोगों के इस तरह फंसे होने के कारण न केवल व्यथित हैं बल्कि उन्हें बचाकर लाने के लिए सरकार की लापरवाही के खिलाफ धरने पर बैठ गए हैं। धारचूला स्थित तहसील परिसर में एक जुलाई से धरने पर बैठे धामी का आरोप है कि हिमालयी क्षेत्र में फंसे उनके क्षेत्र के लोगों को निकालने में सरकार ही नहीं बल्कि पायलट भी सौतेला व्यवहार कर रहे हैं। वीआईपी और विद्युत कंपनियों के अलावा टूरिस्टों को निकालने पर ही पूरा जोर है जबकि आम आदमी की उपेक्षा की जा रही है। 

 

कुमाऊं क्षेत्र में आपदा पीड़ितों के मामले में प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही लगातार सामने आ रही है। धारचूला के उप जिलाधिकारी प्रमोद कुमार ज्यादातर हैलीकॉप्टर पर ही देखे जा रहे हैं। जबकि जिलाधिकारी नीरज खेरवाला भी इस मामले में लापरवाही बरत रहे हैं। इसकी बानगी उस समय देखने को मिली जब २८ जून को जिलाधिकारी के मुन्स्यारी में बैठक में जाने के लिए हैलीकॉप्टर का दुरुपयोग किया गया। भाकपा (माले) नेता जगत मर्तोलिया के अनुसार पिथौरागढ़ से मुन्स्यारी की सड़क खुली हुई है। जिलाधिकारी को चाहिए था कि वह मीटिंग में सड़क मार्ग से जाते। लेकिन उन्होंने ऐसा न करके एक हैलीकॉप्टर को एक दिन इंगेज कर दिया। जबकि उस दिन इस हैलीकॉप्टर से कई लोगों को सुरक्षित निकाला जा सकता था। इसी तरह पटवारी से लेकर कानूनगो तहसीलदार आदि भी आपदा प्रभावितों के लिए कहीं भी सक्रिय नहीं दिखाई देते। केंद्रीय मंत्री एवं सांसद हरीश रावत के साथ सांसद प्रदीप टम्टा और विधायक मयूख महर ने जब बलुवाकोट-जौलजीबी से लेकर धारचूला तक दौरा किया तो कहीं भी कोई अधिकारी नहीं दिखाई दिया। पइया पौड़ी निवासी राम किशन ने बताया कि कई दिनों के बाद भी जब दारमा घाटी में फंसे लोगों को लेने हैलीकॉप्टर नहीं पहुंचा तो खुमुती के दो लोग पैदल ही निकल पड़े। जो दुर्घटना का शिकार हो गए। जब वे तीजम गाड पार कर रहे थे तो बह गए। लोगों की मानें तो अकेले पिथौरागढ़ जिले में आपदा की मार और प्रशासन की लापरवाही से अब तक दो दर्जन से अधिक लोग मारे जा चुके हैं।

 

जौलीजीबी में भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय झूला पुल काली नदी के कहर के आगे नहीं टिक सका। फलस्वरूप वह पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है। इसी के साथ यहां प्रत्येक वर्ष नवंबर माह में लगने वाला मेला स्थल और पांच भवन भी बह गए। ९ जुलाई से स्कूल खुलने हैं। तब इस पुल के न होने से नेपाल के सैकड़ों बच्चे पढ़ाई से महरूम रह जायेंगे। पुल के बह जाने से भारत-नेपाल आवागमन के लिए सरकार ने कोई अस्थाई व्यवस्था नहीं की है। इसके चलते दोनों देशों के लोग काली नदी में ट्यूब के सहारे जान जोखिम में डालकर नदी पार कर रहे हैं। बलुवाकोट गांव में काली नदी का रुख एक बड़े बोल्डर की वजह से बदल गया। जिसके कारण करीब २० मकान दुकानें और होटल बह गए। जिन लोगों के मकान बहे हैं उन्होंने अनुसूचित जाति/ जनजाति (आश्रम पद्धति) विद्यालय में शरण ले रखी है। लेकिन अब स्कूल खुलने को हैं इसलिए उन पर विद्यालय भवन से हटने का दबाव शुरू हो गया है। बलुवाकोट के ग्राम प्रधान हरीराम आर्य पीड़ितों की इस पीड़ा से चिंतित हैं। वे कहते हैं कि सरकार से उन्होंने मांग की है कि जब तक उनके लिए स्थाई घर नहीं बन जाते तब तक अस्थाई निवास की व्यवस्था की जाए। छारछम निवासी आरके भारती के अनुसार बलुवाकोट के आपदा पीड़ितों को तत्कालिक मदद के रूप में १० दिन बाद प्रत्येक परिवार को ५४०० रुपए मिले हैं। 

 

बलुवाकोट के मामले में तो सरकार १० दिन बाद हरकत में आ गई और उन्हें तात्कालिक सहायता राशि दे दी। लेकिन घट्टाबगड़ नूमती मोरी छोरीबगड़मदकोट उमरगाड़ा लेजम कैलाधुमर चीनीधार बसंत घोट सहित पिथौरागढ़ जिले के ऐसे ५८ गांव हैं जहां आपदा के करीब तीन सप्ताह बाद भी तत्कालिक सहायता राशि प्रदान नहीं की गई है। यही नहीं जिले के दूर-दराज के गांवों में राहत साम्रगी तक नहीं बांटी गई है। लोगों के आगे भुखमरी की नौबत आ गई है। सोबला और न्यू सोबला गांव के करीब ४० परिवार पूरी तरह तबाह हो गए हैं। सोबला गांव नक्शे से गायब हो गया है। गांव के सभी लोग केवल घरविहीन ही नहीं राशन विहीन भी हैं। आपदा के करीब तीन सप्ताह बाद भी सरकार ने यहां के पीड़ितों की सुध नहीं ली। एक जुलाई को सोबला न्यू सोबला के अलावा कचौति खेम तीग्रम के १४२ आपदा पीड़ितों को हैलीकॉप्टर के जरिए धारचूला लाया गया। धारचूला के राजकीय इंटर कॉलेज में शरण लिए हुए इन सैकड़ों पीड़ितों का दर्द सरकार ने अनसुना कर दिया। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आपदा पीड़ित १४२ लोगों को सरकार द्वारा महज दो गैस सिलेण्डर दिए गए हैं। सोबला के आपदा पीड़ित नरेश राम ने बताया कि दो गैस सिलेंडर देकर हम सभी से कह दिया गया कि खाना बनाओ और खाओ। हमारे पास न कपड़े हैं और न खाने-पीने का सामान। यहां तक कि बच्चों को पीने के लिए दूध तक मयस्सर नहीं हो रहा है। इसी तरह बालिंग के १५ परिवार वन विभाग के गेस्ट हाउस में शरण लिए हुए हैं। जिनके लिए खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। मुन्स्यारी के गौरीछाल गांव के ४० से अधिक परिवार गांव में ही कैद होकर रह गए हैं। इनमें मनकोट के १८ और चरूणी के २५ परिवार शामिल हैं। इन गांवों के लिए आवाजाही के एकमात्र साधन गरारी और झूलापुल को गोरी नदी बहा ले गई। इन गांवों में राशन का संकट उत्पन्न हो गया है। इसी तरह नागलिंग गांव में भी सैकड़ों ग्रामीणों तक रसद नहीं पहुंची है। रालम गांव में दर्जनों बच्चे बीमार हो गए हैं। ग्रामीणों को डर है कि कहीं यहां महामारी न फैल जाए। टनकपुर-तवाघाट नेशनल हाइवे बलुवाकोट से लेकर तवाघाट तक बूरी तरह तबाह हो चुका है। ऐलागाड और तवाघाट का मोटर पुल बह चुका है। धारचूला से १४ किलोमीटर दूर तवाघाट तक सड़क का नक्शा ही गायब है। फिलहाल सड़क खोलने के लिए ग्रीफ (जनरल रोड इंजीनियर फोर्स) तत्परता से लगी हुई है। लेकिन काफी जद्दोजहद के बाद मदकोट और धारचूला क्षेत्र में करीब २३ जगह से कटी रोड को महज ४ जगह पर ही खोला जा सका है। लोग कई-कई मील पैदल सफर करके गंतव्य स्थलों तक पहुंच रहे हैं। हालांकि इस क्षेत्र में राहत सामग्री पहुंचाने वालों की कमी नहीं है। नैनीताल की विधायक सरिता आर्य खुद १० ट्रकों में राहत सामग्री लेकर धारचूला गईं। लेकिन सड़क मार्ग तक ही ले जा सकीं। सड़कें टूटी होने के कारण आपदा प्रभावितों तक सामग्री नहीं पहुंच रही है। 

साथ में सुरेन्द्र सिंह बिष्ट

 

बात अपनी-अपनी

सीमांत क्षेत्र में अभी भी बहुत लोग फंसे हुए हैं। जिन्हें निकालना सरकार की प्राथमिकता है। कुछ जगह से खबर आ रही है कि स्थानीय लोगों को हैलीकॉप्टर के जरिए नहीं निकाला जा रहा है। इस कारण ये लोग पैदल सफर करके जान जोखिम में डालने को मजबूर हो रहे हैं। हमारा प्रयास है कि एक-एक व्यक्ति को निकाला जायेगा।

प्रदीप टम्टा सांसद अल्मोड़ा-पिथौरागढ़

 

मेरे अलावा राज्य के कई विधायकों ने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का विरोध किया था। इसके चलते हमारे क्षेत्रों में आपदा पीड़ितों की अनदेखी की जा रही है। सरकार का सारा ध्यान यात्रियों को सुरक्षित निकालने पर ही केंद्रित है। आपदा पीड़ितों को राशन तो दूर अभी तक तात्कालिक सहायता तक नहीं दी गई है। यहां तक कि हैलीकॉप्टर संचालन में भी दोगलापन किया जा रहा है। सिर्फ वीआईपी और बाहरी लोगों को ही हैलीकॉटर के जरिए निकाला जा रहा है जबकि स्थानीय लोगों को यह कहकर कि वे प्रतिकूल परिस्थतियों से जूझने में सक्षम हैं मौत के साए में ही छोड़ा जा रहा है।

हरीश धामी विधायक धारचूला

 

हम प्रत्येक आपदा पीड़ित तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। चोट लगने के बाद भी मैं लगातार क्षेत्र में द्घूम रहा हूं। जहां कहीं से भी किसी के फंसे होने की खबर आती है तो उसको हैलीकॉप्टर से वहीं से उठा लिया जाता है। आपदा पीड़ितों तक राहत सामग्री भी पहुंचाई जा रही है।

ललित फर्सवाण विधायक कपकोट

 

धारचूला और मदकोट के आपदा पीड़ित राजनीति के शिकार हो गए हैं। कांग्रेस के ही दो दल बने हुए हैं जिनके बीच आपदा पीड़ित पिस रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को चाहिए कि वह गुटबाजी को छोड़कर पीड़ितों तक राहत सामग्री पहुंचाये। अभी भी क्षेत्र के दर्जन भर गांव ऐसे हैं जहां राहत सामग्री नहीं पहुंची है। लोगों के सामने भूखों मरने की नौबत आ गई है।

प्रकाश पंत पूर्व मंत्री

 

रहनुमा तो बहुत हैं मगर

पिथौरागढ़। एड़ी चोटी का जोर लगाने के बाद भी सरकार व प्रशासन आपदा पीड़ितों तक राहत सामग्री पहुंचाने में विफल रहे हैं। धारचूला-मुन्स्यारी के आपदाग्रस्त क्षेत्र के लोगों का कहना है कि सरकार उनके साथ उपेक्षा का व्यवहार कर रही है। आपदा के कई हफ्ते बाद मुख्यमंत्री ने यहां का दौरा किया। आपदा के एक हफ्ते बाद मल्ला जौहार क्षेत्र में हैलीकॉप्टरों के न पहुंचने से सैकड़ों लोग फंसे रहे। बदरी-केदार के शोर में यहां के आपदा पीड़ितों का दर्द दबकर रह गया। नमक तेल टैंट रोटी के लिए लोग रोते रहे। आपदा का जख्म झेल रहे लोगों के लिए मददगारों की कमी नहीं रही। लोगों ने जी भरकर जिला मुख्यालय में आपदा सामग्री पहुंचाई लेकिन इनका मुख्यालय में डंप लगा रहा। असली आपदा पीड़ितों तक राहत सामग्री नहीं पहुंच पाई। गौरीछाल और चल में ५५० परिवारों के समक्ष आज भी राशन तेल व जरूरी सामानों का संकट बना हुआ है। सीमांत क्षेत्र के विकास के लिए मुख्यमंत्री ने आपदा प्रभावित क्षेत्र का देर से ही हवाई सर्वेक्षण किया और २५ करोड़ रुपए की घोषणा की लेकिन लोग नेताओं की घोषणाओं पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। 

 

क्षेत्र में जो भी राहत सामग्री पहुंची वह सड़क मार्गों तक ही पहुंच पाई। इधर सेराघाट सेरा लोदी दानिबगड़ आलम दामरमा उमगाड़ा खर्तोली सीलिंग बंगापानी मुवानी- दवानी क्षेत्र में आपदा प्रभावित फंसे रहे। उनकी सुध लेने में प्रशासन ने कई दिन लगा दिए। अब भूखप्यास व बीमारियों का डर सता रहा है। सब्जियों व खाद्य साम्रगियों के दाम आसामान छू रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता ललित मोहन कापड़ी कहते हैं कि जरूरत मंदों तक राहत पहुंचाने की कोई कार्ययोजना प्रशासन के पास नहीं है। इस आपदा में लोगों की दानवीरता देखते बन रही है। लेकिन आपदा राहत सामग्री का माल कहां जा रहा है इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है।' 

 

सीमांत क्षेत्र में रिकॉर्ड सामग्री इकट्ठा हो रही है। लेकिन बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि इसे आपदा ग्रस्त क्षेत्रों तक पहुंचाया कैसे जाए? क्षेत्र में कई किलोमीटर तक सड़क ध्वस्त हो चुकी हैं। पैदल मार्ग क्षतिग्रस्त हैं। इधर आपदा राहत समित ने लाखों की धन राशि जुटाई है। राहत सामग्री जमा करने के लिए गांधी चौक रामलीला मैदान में राहत केन्द्र बनाए हैं। इसके अलावा भाजपा कांगे्रस के आनुवंशिक संगठनों द्वारा भी राहत सामग्री इकट्ठा की जा रही है। आइस संस्था भी राहत सामग्री पहुंचाने में मदद कर रही है। जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार डा.ॅ राम सिंह द्वारा ५० हजार की धन राशि आपदा प्रभावितों को प्रदान की गई है। जिसमें २५ हजार की धन राशि कुमाऊं व २५ हजार की धन राशि गढ़वाल मंडल के लिए भेजी जा रही है। हर कोई इस मुसीबत की घड़ी में रहनुमा बन दिल खोलकर मदद कर रहा है लेकिन बिड़म्बना यह है कि उनकी यह मदद आपदा प्रभावितों तक नहीं पहुंच पा रही है। 

-दिनेश पंत 

 

 

 
         
 
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