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vad 23 25-11-2017
 
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आपदा विशेष
 
अपने ही गांवों में शरणार्थी

केदारघाटी और अलकनंदा और में तबाही से उजड़े गांव देश से कट चुके हैं। सड़कें टूट गई हैं। नतीजतन उन तक राहत सामग्री नहीं पहुंच पा रही है। अपने रिश्तेदारों के घरों में शरणार्थियों की तरह जीने के लिए मजबूर सैकड़ों लोगों के सामने भुखमरी की गंभीर समस्या पैदा हो गई है। शासन-प्रशासन की ओर से अब तक उनकी सुध न लिये जाने पर वे बेहद खफा हैं

 

उत्तराखण्ड में आई भीषण तबाही के बाद सेना ने एक लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला। लेकिन उसके इस अभियान में स्थानीय प्रशासन दिखाई नहीं दिया। हालत यह है कि आपदा के लगभग तीन हफ्ते बाद भी देश-दुनिया से कटे सैकड़ों गांवों में प्रशासन के नुमाइंदे के तौर पर कोई पटवारी तक नहीं पहुंच पाया। ऐसे में इन गांवों के लोग किस तरह रह रहे हैं किसी को नहीं पता। बावजूद इसके सरकार दावा है कि गांवों में राहत कार्य जारी है।

 

राहत कार्यों में सबसे ज्यादा परेशानी उन क्षेत्रों को लेकर हो रही है जहां की सड़कें और पुल बह गए हैं। रुद्रप्रयाग से आगे ८० किलोमीटर के केदार घाटी में चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। इस रास्ते पर पड़ने वाले दर्जनों बाजार कभी गुलजार थे। आज ज्यादातर बाजार बंद पड़े हैं। हर जगह लोगों में भय है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी (एनडीएमए की मानें तो जल सैलाब में करीब २२०० घर १५४ पुल और १५२० सड़कें बह गई हैं।

 

रुद्रप्रयाग से तकरीबन २० किलोमीटर आगे और अगस्तमुनी से थोड़ा पहले तिलवाड़ा कस्बा भी ऐसा ही इलाका है। यहां सड़क मार्ग से नहीं पहुंचा जा सकता। २० किलोमीटर की दूरी में कई किलोमीटर सड़क टूट चुकी है। इसलिए वहां पहुंचने के लिए थकान भरे द्घुमावदार और खतरनाक पहाड़ी रास्तों से जाना पड़ता है। इस प्राकूतिक आपदा के कारण तिलवाड़ा में भी साफ पानी खाद्य सामग्री की भारी कमी है। यहां दर्जन से ज्यादा घर दुकान और होटल बर्बाद हो गए हैं। जिनके घर दुकान बर्बाद हुए हैं वह सड़कों पर आ गए हैं। सभी मदद की आस लगाए बैठे हैं। तिलवाड़ा के पहाड़ी रास्ते में जयपाल सिंह रावत से मुलाकात हुई। उनके अनुसार तिलवाड़ा में डायरिया जैसी बीमारियां फैलने लगी है। वहां महामारी का खतरा उत्पन्न हो गया है। कई लोग भूखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं। लोगों का रोजगार छिन गया है। यहां तक राहत कार्य के सरकारी दावों को स्थानीय लोग नकार रहे हैं। 

 

तिलवाड़ा में कई होटल हैं। यात्रा सीजन के समय यहां के होटल तीर्थ यात्रियों से भरे रहते थे। १६ जून को होटलों का कोई कमरा खाली नहीं था और आज राजकीय इंटर कॉलेज का एक हिस्सा ध्वस्त हो गया है।

 

अवतार सिंह कहते हैं स्थानीय लोगों का वर्तमान के साथ भविष्य भी खत्म हो गया है। सरकार के राहत और मुआवजा पर लोगों का भविष्य टिका हैं। लोगों ने होटल और दुकानें बैंक से कर्ज लेकर बनाए थे। होटल और दुकानें छह गई लेकिन कर्ज पर ब्याज जारी है। बैंक इस पर क्या रुख अपनाता है इस पर भी यहां के लोगों का भविष्य टिका है। यहां पानी के सारे नल टूट चुके हैं। पहले नदी का पानी पीते थे लेकिन अब नदी का पानी पीने लायक नहीं है। अब स्थानीय तीन किलोमीटर दूर पानी लेने जाते हैं।

तिलवाड़ा से तकरीबन चार किलोमीटर आगे रामपुर गांव है। टूटी सड़कों से ऊपर पहाड़ों पर चढ़कर गांव जा सकते हैं। यह पगडंडी भी ऐसी कि थोड़ा सा पांव इधर-उधर हुआ और सीधे खाई में। फिर भी गांव और उसके आगे के लोग इसी पगडंडी का इस्तेमाल कर हैं। घर में कुछ नहीं बचा पहले ही आपदा में कई परिवारों ने अपनों को खोया है। अब उन्हें अपने जान का कोई खतरा महसूस नहीं हो रहा। यहां की विमला देवी ने बताया कि उन्हें १० किग्रा आटा एक किग्रा चावल और एक पैकेट बिस्किट मिला है। राशन देने के बाद लेने वाले का नाम नोट किया जा रहा है। हमें बताया गया कि यह एक माह का राशन है। इतने राशन से पूरे महीने का खान-पान कैसे चलेगा।

 

रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी तक दो दर्जन से अधिक जगहों पर नेशनल हाइवेमंदाकिनी में समा गया है। जिसके चलते क्षेत्र में खाद्यान्न संकट गहरा गया है। इसके अलावा लोग अंधेरे में ही जीवन जीने को विवश हैं। रुद्रप्रयाग से ८ किमी दूरी पर तिलवाड़ा में शिशुपाल जगवाण व महावीर जगवाण की दुकान मंदाकिनी के तेज बहाव में बह गई है जिससे इन्हें लाखों का नुकसान हुआ। आज वे सड़क पर आ गए हैं। तिलवाड़ा से सटे सुमाड़ी बाजार में दो दर्जन से अधिक मकान मंदाकिनी में समा गए हैं। लोगों ने रात्रि में किसी तरह से मकान छोड़ कर जाने बचाई। सरकार ने दो सप्ताह बाद भी इन लोगों की सुध नहीं ली है। अगस्तमुनि निवासी रणबीर सजवाण का कहना है कि नेशनल हाइवे के जगह-जगह पर टूटने से लोगों का संपर्क देश-दुनिया से कट चुका है। अभी तक हमारी समस्याओं को सुनने के लिए कोई नेता यहां नहीं पहुंचा। वहीं अगस्तमुनि से २ किलो मीटर दूरी पर चंद्रापुरी गांव बाढ़ से आधा तबाह हो गया है। यहां भी लोग पडोसियों तथा रिश्तेदारों के घरों में शरण लिए हुए हैं। गांव के आकाश लिंगवाल ने बताया कि यहां ८० से अधिक मकान आपदा से जमींदोज हो गए हैं। लोग किस तरह जी रहे हैं इस ओर शासन-प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है। 

 

चंद्रापुरी से आगे कालीमठ घाटी के दर्जनों गांवों में खाने के लाले पड़ गये हैं। सरकार का इन लोगों की ओर भी अभी तक कोई ध्यान नहीं है। लोगों का कहना है कि यहां सरकार नाम की कोई चीज रही होती तो आज दो सप्ताह बाद भी उन्हें मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसना न पड़ता। अलकनंदा घाटी में भी प्रकूति ने भारी तबाही मचाई है। 

 

गोविंदघाट के लोग अपना सब कुछ गवां बैठे हैं। आज ये लोग शरणार्थियों सा जीवन जी रहे हैं। ५० से अधिक लोग मवेशियों को लावारिस छोड़कर जाने को तैयार नहीं हैं। अपने नौनिहालों के भविष्य की चिंता उन्हें अलग से सताये जा रही है। बच्चों के स्कूल भी जुलाई में खुल गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि बच्चों को क्या खिलाकर स्कूल भेजें और स्कूल भी तो मटियामेट हो चुके हैं। 

 

गोविंदघाट के साथ ही भ्यूंडार घाटी के ९९ परिवारों के घर बाढ़ व भूस्खलन से तबाह हो गये। भ्यूंडार घाटी के लोगों का मुख्य व्यवसाय पर्यटन से ही जुड़ा हुआ था। ये लोग प्रकूति के प्रलय से बेघर हो गये हैं। इनका अपना सब कुछ छिन गया है। भगवान का शुक्र है कि यहां किसी भी तरह की जन हानि नहीं हुई है। यहां के ४५० लोगों को आर्मी व डेक्कन कंपनी के साथ ही जेपी कंपनी के हवाई जहाज से जोशीमठ में शिफ्ट किया गया है। इस तबाही में ये लोग अपना सब कुछ गवां चुके हैं। इन लोगों को अब जोशीमठ में पर्यटन विभाग के गेस्ट हाऊस में ठहराया गया है। जहां वे चार कमरों में ही अपना वक्त गुजार रहे हैं साथ ही अपना भोजन भी स्वयं ही बना कर खा रहे हैं। अब तक दर्जन भर से अधिक नेता इनके हाल पूछने आ गये हैं। लेकिन अभी तक किसी भी नेता ने इनके भविष्य को लेकर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया है। लोगों का कहना है कि सरकार उनके पुनर्वास और बच्चों की निःशुल्क पढ़ाई की व्यवस्था करे। यदि यदि सरकार ने वक्त पर नौनिहालों की सुध नहीं ली तो वे समाज की मुख्य धारा से कट जायेंगे।

 

 

बात अपनी-अपनी

आपदा से हमारे दोनों गांव भ्यूंडार और पुलना पूरी तरह तबाह हो गये हैं। अब हमारा वहां रहना सुरक्षित नहीं है। सरकार को चाहिए कि वे दोनों गांवों का जल्द से जल्द पुनर्वास करे।

देवेंद्र चौहान प्रधान भ्यूंडार

 

दुःख की इस घड़़ी में हमें इस बात की भी चिंता है कि आखिर हमारे नौनिहालों का भविष्य क्या होगा? स्कूल खुल चुके हैं। सरकार अविलंब बच्चों के लिए स्कूलों की व्यवस्था करे।

दिनेश झिंक्वाण प्रभावित भ्यूंडार घाटी

 

 
         
 
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अमर सिंह नाम है उस शख्स का जो कुछ हलकों के शीर्ष पंक्ति पर व्याप्त हैं। आप इन्हें पॉलीटिकल मैनेजर या नेशनल लाइजनर कहकर इनको नापसंदगी के ?ksjss में डाल सकते हैं। लेकिन इनका एक दूसरा

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