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आपदा पर विशेष
 
यूं भी लुटे लोग

बदरीनाथ और गोविंदघाट में फंसे तीर्थ यात्रियों को सेना हैलीकॉप्टर से जोशीमठ तो ले आयी लेकिन यहां से आगे प्रशासन की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं थी। इससे जोशीमठ में हजारों यात्री जमा हो गए। शासन से दबाव आने पर स्थानीय प्रशासन ने जैसे-तैसे कुछ रोडवेज बसों और लोकल टैक्सियों से यात्रियों को निःशुल्क चमोली भेजने की व्यवस्था की। लेकिन उन्होंने यात्रियों से दोगुना किराया वसूला। प्रशासन को इसकी जानकारी दी गई इसके बावजूद वह मौन बना रहा

 

सीमांत चमोली जिले में आपदा के चलते अधिकतर गाड़ियां लिंक मोटर मार्गों पर फंस गयी। इसका फायदा उठाकर नेशनल हाइवे के जीप चालकों ने तीर्थ यात्रियों और स्थानीय लोगों को जमकर लूटा। यह सब प्रशासन के नाक के नीचे चलता रहा लेकिन प्रशासन इस पर अंकुश लगाने के बजाय मूकदर्शक बन जाना उचित समझा। 

 

चमोली से जोशीमठ तक बीआरओ नेशनल हाइवे १८ जून को खोला गया था। १७ व १८ जून को गोविंदघाट में आर्मी व आईटीबीपी ने रेस्क्यू अभियान चलाकर लोगों को निकालने का काम शुरू किया। आर्मी के साथ निजी कंपनी के हैलीकॉप्टरों द्वारा भी यात्रियों को निकालने का कार्य किया गया इससे जोशीमठ तीर्थ यात्रियों एवं स्थानीय लोगों से खचाखच भर गया। यहां पर आर्मी की मदद से नगर पालिका ने प्रभावितों के लिए भोजन की व्यवस्था की। किन्तु जब यहां से तीर्थ यात्रियों को अपने घर जाने की बारी आई तो उनके लिए प्रशासन द्वारा कोई व्यवस्था नहीं की जा सकी। लाचार प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। ऐसे में आर्मी ने अपने गाड़ियों से कुछ लोगों को चमोली तक छोड़ा। यहां हजारों की संख्या में यात्रियों के होने पर जोशीमठ के जीप चालकों ने दोगुना किराया वसूल कर लोगों को चमोली छोड़ा। जब जोशीमठ में भी जीपों की कमी पड़ी तो तब प्रशासन की नींद खुली और चमोली के साथ ही अन्य लिंक मार्गों की जीपों को जोशीमठ भेजा गया। जहां जीप चालकों ने यात्रियों व स्थानीय लोगों ने दोगुना किराया वसूला। चमोली से जोशीमठ ४८ किमी है जिसका किराया ८० रुपये है। जीप चालकों का कहना था कि उन्हे एक ओर खाली जाना पड़ रहा है जिस कारण वे दोगुना किराया ले रहे हैं। वहीं प्रशासन ने ये सब जानने के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाये जिसका परिणाम यह हुआ कि लोग अपनी मजबूरी के कारण लुटने को विवश हुए। चमोली व लिंक मार्गों की जीपों को जोशीमठ भेजने से स्थानीय लोगों को पैदल चलने को विवश होना पड़ा। सड़कों पर बड़ी संख्या में यात्रियों के फंसे होने से जब प्रशासन ने द्घुटने टेक दिए तब जाकर राज्य सरकार की नींद खुली और बागेश्वर एवं रानीखेत से जीप और रोडवेज की बसें मंगायी गयीं। देहरादून से भी रोडवेज की बसें मंगवानी। जिन्होंने २२ जून के बाद काम करना शुरू किया। सरकार ने इन गाडियों के साथ अन्य गाड़ियों को भी जनता की सेवा में निःशुल्क लगाया। किन्तु प्रशासन की नाक के नीचे रोडवेज की बसें व जीप चालक स्थानीय लोगों से किराया वसूलते रहे।

 

२४ जून को जब चमोली से ऋषिकेश के लिए रोडवेज की बस संख्या नं यूके ०७ पीए ०३८४ में यात्री गोविंदघाट एवं हेमकुंड़ साहिब से अपनी जान बचाकर घर लौट रहे थे तो रास्ते में कंडक्टर ने उनसे पैसे मांग लिये। कंडक्टर को जब इस बारे में कहा गया कि गाड़ी निःशुल्क है फिर आप किराया क्यों ले रहे हैं तो उसका कहना था कि उसे स्थानीय लोगों से किराया लेने के निर्देश हैं। यात्रियों के विरोध करने पर कंडक्टर चिल्लाने लगा कि गाड़ी में जिस स्थानीय के पास किराया नहीं हैं वे गाडी से उतर जाएं। इसके लिए कंडक्टर ने चमोली से दो किलोमीटर की दूरी पर दो बार गाड़ी रोकी और चिल्लाने लगा कि किराया देना ही पडेग़ा। जब यात्रियों ने इस संबंध में एसडीएम चमोली अवधेश कुमार से जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि सभी लोगों के लिए निःशुल्क व्यवस्था है। जब यात्रियों ने कंडक्टर की एसडीएम से बात कराने चाही तो वह और भी गुस्सा हो गया कि आप चाहे राष्ट्रपति से बात करें किराया सबको देना ही पडेग़ा। किराया नहीं देना है तो उतर जाओ। कंडक्टर की बदसलूकी से सभी तीर्थयात्री व स्थानीय लोग चुप हो गये थे। लोग इसलिए चुप हुए कि वे किसी तरह से बचकर निकले हैं। कोई भी उस से सच्चाई पर बहस नहीं करना चाहता था। इस तरह कंडक्टर द्वारा सभी स्थानीय लोगों से किराया वसूला गया। जो लोग देहरादून से अपने घरों का हाल जानने के लिए आए थे उन्हें भी उन लोगों को गाड़ियां न मिलने पर बसों में ठूंस-ठूंस कर भरा गया उसके बाद उनसे किराया वसूला गया।

 

गाडी व जीप चालकों की मनमानी यहीं पर खत्म नहीं होती। २७ जून को जीपों की संख्या अधिक होने पर कुमाऊं की जीप संख्या नं यूके ०४ टीए १३१० को यह कह कर छोड़ दिया गया कि अब यहां गाडियों की जरूरत नहीं है। उसे से कहा गया कि कर्णप्रयाग तक प्रभावितों को भी लेकर जाएं। किंतु जीप चालक ने कुछ लोगों को बैठाकर जीप जोशीमठ से निकाली और सेलंग पेट्रोल पंप पर डीजल भराने से पहले प्रशासन द्वारा दिया गया डीजल बेचने की कोशिश की। जब टंकी के बहाने निकालने के लिए पाइप नहीं मिला तो उसने गाड़ी के पिछले हिस्से से नट खोलकर २० लीटर डीजल निकाला। उसके बाद जो लोग उस में बैठे थे उनसे किराया वसूला। इस गाड़ी में दो स्कूली बच्चे भी बैठे थे जो छुट्टियों में रोजगार के लिए बद्रीनाथ गये थे। प्रदीप नेगी जाखणी व धीरज नेगी बंगाली गांव ब्लॉक घाट कुबेर मिष्ठान भंडार में काम करते थे। आपदा से मार्ग टूटने पर ये वहीं फंसे थे। ये बद्रीनाथ से पैदल चलकर जोशीमठ पहुंचे थे। दूसरे दिन उन्हें घर जाना था इसलिए वे इस जीप में बैठे थे। उनका कहना है कि उनसे जीप चालक द्वारा किराया वसूला गया। घाट ब्लाक के रहने वाले सुभाष बिष्ट जोशीमठ में काम करता है। आपदा से घर के हाल जानने के लिए वह भी इस जीप में नंदप्रयाग तक पहुंचा तो जीप चालक ने उससे १०० रुपये किराया वसूल लिया। उन्होंने जब चालक से जीप पर निःशुल्क बोर्ड लगे होने की बात की तो चालक ने उनकी कुछ नहीं सुनी। इस तरह कई लोग थे जो किसी तरह गोविंदघाट से अपनी जान बचाकर पहुंचे। कुछ लोगों के पास किराया नहीं था। वे जोशीमठ से अपने रिश्तेदारों से पैसे लेकर घर पहुंचे।

 

घाटी में खाद्य संकट

सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नीती घाटी के दर्जन भर गांवों में खाद्यान संकट गहराने लगा है। १६ एवं १७ जून को लगातार मूसलाधार बारिश से इन गांवों के संपर्क मार्ग कई स्थानों पर टूट गये हैं। टूटे मार्गों पर पैदल चलना भी खतरनाक है। इन हालात में यदि जल्द ही इन्हें राहत सामाग्री नहीं पहुंचायी गयी तो इलाके में भुखमरी शुरू हो जाएगी। 

 

भारत-तिब्बत (चीन सीमा से सटे गांवों कैलाशपुर मेहर गांव फरकिया बाम्पा गमशाली नीती सहित दर्जन भर गांवों में विगत १६ एवं १७ को हुई अतिवृष्टि के कारण जगह-जगह पर सड़क और पैदल मार्ग टूट चुका है। इन दर्जन भर गांवों के ग्रामीणों के पास अब खाद्यान सहित अन्य दैनिक चीजों की किल्लतें होने लगी हैं। मलारी के पास कैलाशपुर नामक गांव के नीचे मुख्य सड़क मार्ग पर स्थित पुल पूर्ण रुप से क्षतिग्रस्त हो गया है। जहां अब पैदल चलना भी जोखिम भरा है। करीब तीन हफ्ते से इन गांवों में राशन की सप्लाई नहीं हो पाई है। उत्तराखण्ड में जून के महीने में कभी इतनी ज्यादा बारिश नहीं होती थीइसलिए ग्रामीणों ने खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामानों का स्टॉक नहीं रखा था। जिसके कारण कैलाशपुर गांव के ४६ मेहर गांव के ४० फरकिया के ५७ बाम्पा के ६२ गमशाली के ९५ और नीति गांव के ६० परिवारों पर अब खाद्यान का गहरा संकट छा गया है। सड़क टूटने के कारण मलारी से नीती तक का देश से संपर्क कट चुका है। 

 

नीती के क्षेत्र पंचायत सदस्य ललित सिंह पाल ने बताया कि 'गांव वालों का जो राशन बचा था वो अब समाप्त हो गया है। अतिवृष्टि से क्षेत्र में भारी तबाही मची है। जिसके चलते ग्रामीणों को पशुधन की क्षति हुई है। गांव वालों के गाय द्घोड़े खच्चर इस अतिवृष्टि में बह गये हैं। १९ दिन हो गये हैं। अब तक कोई मदद नहीं मिली है।' मलारी से नीती तक करीब ८००मी० सड़क मार्ग टूटी है। इन इलाकों में गैस की किल्लत सबसे ज्यादा है। पशु चारा नहीं होने के कारण लगभग ४०० बकरियां मर चुकी हैं। भापकुण्ड पुल से ऊपर वाहनों की आवाजाही ठप है। इन इलाके में भोटिया जनजाति के लोग रहते हैं। इन गरीब भोटिया जनजाति परिवारों का जनजीवन और आर्थिकी बुरी तरह चरमरा गयी है। 

 

बुंराश से लेकर रियोल बगड़ गुरुकुटी गांव तक सड़क मार्ग जगह-जगह पर क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इस संदर्भ में ३० जून को नीती गांव की प्रधान लक्ष्मी देवीगांव के अन्य लोगों के साथ जिलाधिकारी चमोली से मिलने जोशीमठ स्थित सेना के हैलीपैड गयी। लेकिन सेना के प्रवेश निषेध होने के कारण वे लोग जिलाधिकारी तक नहीं पहुंच पाए। डीएम एस ए मुरूगेशन से उन्हें सिर्फ मौखिक आश्वासन मिला। फिलहाल तहसीलदार जोशीमठ ने उन इलाकों की जांच एवं स्थलीय निरीक्षण करवाने के लिये राजस्व निरीक्षक मलारी को निर्देश दे दिये हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की रिपोर्ट आने तक पूरी नीती घाटी में भुखमरी के हालात पैदा हो जायेंगे। यदि प्रशासन समय रहते चोपरों के माध्यम से थोड़ा बहुत राहत और कैरोसीन तेल आदि भेज दिया जाता तो कुछ राहत मिल जाती। फिलहाल नीती घाटी के ग्रामीणों की आस पटवारी की रिपोर्ट पर टिकी है।  

 
         
 
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